चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१
अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१
पादयत्यतिकालं धारयति, भय-शोक-मोह-दैन्यातिप्रलापाञ्जनयति,
प्राणांश्चोपरुणद्धि ।
प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा-
धरणीधारणं, ज्वलनोज्ज्वलनं, आदित्य-चन्द्र-नक्षत्र-ग्रह गणानां सन्तान-
गति-विधानं सृष्टिश्च मेघानां, अपां च विसर्गः, प्रवर्त्तनं स्रोतसां,
पुष्पफलानां चाभिनिर्वर्त्तनम्, उद्भेदनं चौद्भिदानां, ऋतूनां प्रविभागः,
विभागो धातूनां धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः, शस्या-
भिवर्धनमविक्लदोपशोषणेऽवैकारिक-विकाराइचेति ।
प्रकुपितस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा-
उत्त्रोडनं सागराणां, उद्वर्त्तनं सरसां, प्रतिसरणमापगानाम्, आकम्पनं च
भूमेः, आधमनमम्बुदानां, शिखरिशिखरावमथनं, उन्मथनमाकहानां,
नीहार-निर्ह्राद-पांसु-सिकता-मत्स्य-भेकारग क्षार रुधिराश्माशनि-विसर्गः
व्यापादनं च षण्णामृतूनां, शस्यानामसंघातः, भूतानां चापसर्गः, भावानां
चाभावकरणं, चतुर्युगान्तकरणां मेघ-सूर्यानलानिलानां विसर्गः ।
स हि भगवान् प्रभवश्चाव्ययश्च, भूतानां भावाभावकरः, सुखा-
सुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमो, नियन्ता, प्रजापतिः, अदितिः, विश्वकर्मा,
विश्वरूपः, सर्वगः, सर्वतन्त्राणां विधाता, भावानामणुर्विभुर्विष्णुः,
क्रान्ता लोकानां, वायुरेव भगवानिति ॥८॥
बडिश के सत्य एवं ऋषियों के अनुमोदित उस बचन को सुन कर राजर्षि
वार्योविद ने कहा-आपने जो कुछ कहा है वह सब ठीक ही है, अर्थात् इन नियमों
के प्रतिकूल एक भी उदाहरण नहीं है । "अपवाद"का अर्थ निन्दा भी होता है ।
अभिप्राय यह है कि सब ऋषियों का इस विषय में एक ही मत है । कुपित तथा
शान्त हुये शरीर में संचार करने वाले एवं शरीर से बाहर संचार करने वाले
वायु के शरीर में तथा शरीर से बाहर जो कर्म हैं उनके अवयवों को प्रत्यक्षादि
प्रमाणों से सिद्ध कर तथा वायु को नमस्कार कर यथाशक्ति कहूँगा । वायु
शरीररूपी यन्त्रों को धारण करने वाला है । 'तन्त्र' शब्द से शरीरस्थ
धातुओं के जो अपने-अपने नियम हैं उनसे अभिप्राय है । यन्त्र से अभिप्राय
जिसके द्वारा शरीरस्थ धातुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना आदि
व्यापार होता है । अर्थात् तन्त्र (नियम) एवं यन्त्र दोनों को धारण करनेवाला है।
वायु प्राणादि पांच रूपों वाला है। सम्पूर्ण उच्च या नीच विविध प्रकार
की चेष्टाओं का प्रवर्त्तक है, मनका नियामक तथा नेता (लेजाने बाला) है ( वायु
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मनको अनिष्ट विषय से लौटा कर इष्ट विषय में लगाता है) यही वायु
सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों में प्रेरणा करता है।
सम्पूर्ण शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों का वहन करने वाला भी वायु ही
है। वायु ही शरीरस्थ धातुओं को यथानियम अपने २ स्थलों पर स्थापित
करता है। शरीर को जोड़ने वाला भी यही वायु है, वाणी को प्रवृत्त करने
वाला, स्पर्श तथा शब्द की प्रकृति (कारण) श्रोत्रेन्द्रिय एवं स्पर्शनेन्द्रिय का
मूल कारण वायु ही है।
यह वायु हर्ष तथा उत्साह की योनि है (अभिव्यक्ति का कारण है। अग्नि
का प्रेरक शरीरस्थ दोषों का शोषण करनेवाला। मलों को बाहर निकालने वाला,
स्थूल एवं सूक्ष्म स्रोतों को भेदन करने वाला, शरीरोत्पत्ति के समय गर्भ की आकृ-
तियों को बनाने वाला भी वायु ही है। यह वायु आयु के अनुवर्तन-परिपालन
का कारणभूत होता है। उपर्युक्त सभी कर्म शान्तवायु के कहे गये हैं। शरीर में
कुपित हुआ वायु तो शरीर को नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित करता है, जिस
से बलवर्णादि क्षीण होता है, मनको दुःखित करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को नष्ट
करता है, गर्भ को नाश करता है, अथवा जितने काल तक गर्भ को गर्भाशय में
रहना चाहिये उससे अधिक काल तक गर्भाशय में ठहराता है। भय, शोक, मोह,
दीनता, अतिप्रलाप इनको उत्पन्न करता है और मृत्यु काभी कारण होता है।
प्रकृतिस्थ वायु के लोक में संचरण करने से ये कर्म होते हैं, जैसे—पृथ्वी का
धारण करना, अग्नि को जलाना, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहों को बराबर
नियमपूर्वक गति में रखना, बादलों को बनाना, जलों का छोड़ना, स्रोतो को बहाना
फल-फूलों को उत्पन्न करना, वृक्षादि को पृथ्वी से बाहर निकालना(अंकुरित करना),
ऋतुओं का विभाग करना, स्वर्णादि धातुओ का आकार तथा परिमाण को
व्यक्त करना, बीजों में अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति पैदा करना, शस्यादि को
बढ़ाना, इसे सड़ने तथा सूखने न देना अन्य जो भी प्रकृतिकार्य हैं उसे करना,
जब यह वायु प्रकुपित हो कर संसार में संचरण करता है तो इससे ये कर्म
होते हैं—समुद्रों को उत्पीड़न करना, तालाब आदि जलाशय के जलों को ऊँचा-
करना (अर्थात् तट के बाहर जल को निकालना) नदियों को विपरीत दिशा में
बहाना भूकंप कराना, मेघों का गर्जन कराना, पर्वतों के चोटियों को तोड़ना, वृक्षों
को उखाड़ना, नीहार,गर्जन,धूलि.बालू,मछली,मेढ़क,सांप,क्षार (राख),रुधिर,छोटे२
पत्थर तथा बिजली को आकाश से गिराना, छहों ऋतुओं को नाश करना,
अन्नको उत्पन्न न होने देना, प्राणियों को मारना, उत्पन्न हुये वस्तुओं का नाश
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करना,चारो युगोका संहार करनेवाले बादल,सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना
इत्यादि होते हैं ।
वह भगवान् वायु उत्पत्ति के कारण हैं, अविनाशी हैं, एवं
प्राणियों का उत्पादक तथा नाशक हैं । सुख एवं दुःख को देने वाला, मृत्यु,
यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकमो, विश्वरूप सर्वग (व्यापक),
सम्पूर्ण नियमों, कर्मों तथा शरीरों को बनाने वाला सभी वस्तुओं का विधाता,
सूक्ष्म, व्यापक, विष्णु पृथ्व्यादिलोकों को आक्रमण करने वाला भगवान्
वायु ही हैं ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा वार्योविद्वचो मरीचिरुवाच-यद्यप्येवमेतत्किमर्थ-
स्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्यां
चाधिकृत्यैयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ९ ॥
वार्योविदि के वचन को सुनकर भगवान् मरीचि ने कहा, यद्यपि आपने
जो कहा है वह ठीक है तथापि आयुर्वेद में इस विषय को कहना या जानना
निष्प्रयोजन है यहां तो केवल चिकित्सा सम्बन्धी ही कथा हो रही है ॥ ९ ॥
वार्योविद उवाच — भिषक् पवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्र-
कारिणमात्ययिकं चेन्नानुनिशम्येत्, सहसा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमप्रेऽ-
भिरक्षितुमभिधास्यति प्रागेवैनमत्त्ययभयादिति । वायोर्यथार्था स्तुति-
रपि भवत्यारोग्याय बलवर्णवृद्धये वर्चस्वित्वायोपचयाय ज्ञानोपपत्तये
परमायुःप्रकर्षाय चेति ॥ १० ॥
वार्योविद बोले—चिकित्सा-शास्त्र में वायु बहुत बलवान्, बहुत कठोर,
अति शीघ्रकारी अतिचपल; अति दुःखदायक है, यदि ऐसा ज्ञात न हो तो,
सहसा वायु के कुपित होने पर, वैद्य किस प्रकार से उसको बिना जाने पहिले
ही इससे बचने को कहेगा । वायु के विषय में यथार्थ रूप में कहना, जानना,
स्तुति करना भी आरोग्यलाभ, बल, कान्ति, तेज, शक्ति को बढ़ाने, ज्ञान वृद्धि
करने और दीर्घतम आयु को प्राप्त करने और बढ़ाने के लिये है ॥ १० ॥
मरीचिरुवाच—अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभा-
शुभानि करोति, तद्यथा-पक्तिमपक्तिं दर्शनमदर्शनं मात्राममात्रत्वमूष्मणः
प्रकृति-विकृति-वर्णं शौर्यं भयं क्रोधं हर्षं मोहं प्रसादमित्येवमादीनि
चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥
मरीचि बोले—शरीर में स्थित पित्त के अन्दर पहुंची हुई अग्नि ही कुपित
और अकुपित अवस्था में शुभ एवं अशुभ कर्मों को (क्रमशः) करती है ।
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यथा—कुपित न होने पर पचन क्रिया को (भ्राजक पित्त ), स्वाभाविक रंग
को (रंजक पित्त ), शौर्य, हर्ष, प्रसाद प्रसन्नता को (साधक अग्नि ) उत्पन्न
करती है। कुपित होने पर, पाचन क्रिया की जड़ता, मन्द दृष्टि, उष्णता को
अयोग्य प्रमाण में, विकृत वर्ण, भय, क्रोध, मूर्च्छा उत्पन्न करता है। इसी
प्रकार कुपित और अकुपित अवस्थाओं में पित्त अन्य द्वन्द्वों को भी उत्पन्न
करता है ॥ ११ ॥
तच्छ्रुत्वा मरीचिवचः काप्य उवाच-सोम एव शरीरे श्लेष्मान्त-
र्गतः शुभाशुभानि करोति, तद्यथा-दार्ढ्यं शैथिल्यमुपचयं कार्श्यमुत्साह-
मालस्यं वृषतां क्लीबतां ज्ञानमज्ञानं बुद्धिं मोहमेवमादीनि चापराणि
द्वन्द्वानीति ॥ १२ ॥
मरीचि ऋषि के वचन सुनकर काप्य बोले—शरीरस्थ कफ में सोम (जल
तत्त्व) पहुंच कर कुपित और अकुपित अवस्था में शुभ एव अशुभ कर्मों को
करता है। अकुपित अवस्था मे—शरीर की दृढ़ता वृद्धि, कार्यों में उत्साह,
पुरुषत्व, ज्ञान, बुद्धि आदि को उत्पन्न करता है। कुपित होने पर शरीर का
ढीलापन, निर्बलता, आलस्य, नपुंसकता, मूढ़ता मूर्च्छा आदि उत्पन्न करता
है। इस प्रकार कुपित और अकुपित अवस्था मे दूसरे द्वन्द्वों को भी उत्पन्न
करता है ॥१२॥
तच्छ्रुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-सर्व एव
भवन्तः सम्यगाहुरन्यत्रैकान्तिकवचनात्, सब एव खलु वातपित्त-
श्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमव्यापन्नेन्द्रियं बल-वर्ण-सुखोपपन्नमायुषा
महतोपपादयन्ति सम्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन
महतोपपादयन्ति पुरुषमिह चामुष्मिंश्च लोके, विकृतास्त्वेवं महता
विपर्ययेणोपपादयन्ति ऋतवस्त्रय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो-
पघातकाले इति ॥ १३ ॥
काप्य ऋषि के वचनों को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले—आप सबने जो
कुछ कहा वह सब ठीक है। परन्तु आपने जो यह कहा कि अकेला वायु या
अकेला पित्त अथवा अकेला कफ ही कुपित और अकुपित अवस्था में सब
शुभ-अशुभ कर्म करते हैं—यह वचन व्यभिचरित होने से ठीक नहीं है। सब
ही वात पित्त कफ (तीनो ) अकुपित अर्थात् स्वास्थ्यावस्था में प्रकृति युक्त,
स्वस्थ इन्द्रिययुक्त पुरुष को, बल, वर्ण, सुख और दीर्घायुष्य प्रदान करते हैं।
जिस प्रकार कि उचित रूप में सेवन किये हुए धर्म, अर्थ और काम पुरुष को