चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंओ३म्
चरकसंहिता
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अब यहां से 'दीर्घ-जीवतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था १ ॥ २ ॥
ऋषि भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन
दीर्घं जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज उपागमत् ।
इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥३॥
दीर्घ काल तक जीवन की इच्छा से उग्रतपस्वी भरद्वाज मुनि देवों के राजा
इन्द्र को शरण योग्य जानकर उनके पास गये ॥ ३ ॥
१. निष्प्रयोजन और अभिधेयरहित अर्थ में बुद्धिमानों की प्रवृत्ति नहीं होती !
इसलिये सब से प्रथम शास्त्र का प्रयोजन अभिधेय और सम्बन्ध बतलाना चाहिये ।
कहा भी है—
अभिधेयफलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः ।
श्रोतुमल्पमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥
सिद्धार्थे सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥
इस शास्त्र का प्रयोजन 'धातुसाम्य' है । कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता
तन्त्रस्यास्यप्रयोजनम्' 'धातुसाम्य' का अर्थ विषम हुए धातुओं को समान करना और
समान धातुओं का रक्षण करना है। अथवा रोगी के रोग का निवारण करना और स्वस्थ