चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०७
अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०७
यदि एक ही पुरुष में वमन आदि कार्यों की प्रवृत्ति (देने) और निवृत्ति
(न देने) दोनों कार्यों के लक्षण हों तब रोगों में गुरुता और लघुता भली
प्रकार देख कर एक कार्य का निश्चय करना चाहिये, प्रवृत्ति और निवृत्ति के
लक्षणों में से जिसके लक्षण गुरु हों वह कार्य करना चाहिये। दूसरे लघु-लक्षणों
वाले कार्य को छोड़ देना चाहिये। क्योकि शास्त्रों में ऐसे भी रोग हैं, जिनकी
चिकित्सा विधि और निषेध रूप से कही है। शास्त्र में उपक्रम की प्रवृत्ति और
निवृत्ति दोनों ही कही है। इनमें से एक कार्य का निश्चय गुरु, लघु देखकर
करना चाहिये ॥१३२॥
यानि तु खलु वमनादिषु भेषज-द्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति तान्यनु-
व्याख्यास्यन्ते । तद्यथा- फल-जीमूतकेक्ष्वाकु - धामार्गव-कुटज-कृतवेधन-
फलानि, फल-जीमूतकेक्ष्वाकु-धामार्गव-पत्र-पुष्पाणि, आरग्वधवृक्षक-
मदन-स्वादुकण्टक-पाठा-पाटला-शाङ्गेष्टामूर्वा-सप्तपर्ण-नक्तमाल-पिचु-
मर्द-पटोल-सुषवी - गुडूची-चित्रक-सोमवल्क द्वीपि-शिग्रु-मूल-कषायैश्च,
मधुक-मधूक-कोविदार-कर्बुदार-नीप-निचुल-बिम्बी-शणपुष्पी-सदापुष्पी-
प्रत्यकपुष्पी-कषायैश्च, एला-हरेणु-प्रियंगु-पृथ्वीका-कुस्तुम्बुरु-तगर-नलद-
ह्रीवेर-तालीश-गोपी-कषायैश्च, इक्षुकाण्डद्वयेक्षुवालिका-दर्भ-पोटगलका-
लंकृत-कषायैश्च, सुमना-सौमनस्यायनी-हरिद्रा-दारुहरिद्रा-वृश्चीर-पुनर्नवा-
महासहा-क्षुद्रसहा-कषायैश्च, शाल्मलि-शाल्मलिक-भद्रपर्ण्यैलापर्ण्युपोदि-
कोद्दालक-धन्वन-राजादनोपचित्रा-गोपी-शृङ्गाटिका-कषायैश्च, पिप्पली-
पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सर्षप-फाणित-क्षीर-क्षार-लवणोदकैश्च
यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रियाचूर्णावलेह-स्नेह कषाय-मांस-
रस-यवागू-यूष-काम्बलिक-क्षीरोपधेयान्मोदकानन्यांश्च योगान् विवि-
धाननुविधाय यथा वमनार्हाय दद्याद्विधिवद्वमनमिति कल्पसंग्रहो
वमनद्रव्याणाम्। कल्पस्त्वेषां विस्तरेणोत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३३ ॥
वमनोपयोगी द्रव्यः—वमन आदि कार्यों में जो औषध द्रव्य काम में आते
हैं उनका वर्णन करते हैं। जैसे-वमन द्रव्य फल (मदन फल) जीमूत (तुरई)
इक्ष्वाकु (कड़वी तुरई), धामार्गव (कोषातकी), कुटज (कुड़ा), कृतवेधन
(तुरई) इनके फल लेने चाहियें। फल, जीमूत, ईक्ष्वाकु, धामार्गव इनके पत्ते
और फूल। अमलतास, कुड़ा मैनफल, विकङ्कत, पाठा, पाटला, गुञ्जा, मूर्वा,
सतवन, नाटाकरञ्ज, नीम, परबल, करेला, गिलोय, चीता, खैर, शतावरी,
कंटेरी (छोटी), शोभाञ्जन इनकी जड़ों का कषाय बना कर देवे। महुवा,
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मुलहठी, सफेद कचनार, लाल कचनार नीम, अम्लवेतस, कन्दूरी, झनझनिया,
लाल आक, अपामार्ग इनका कषाय प्रयोग करना चाहिये। बड़ी इलायची,
रेणुका (मेथी के बीज), फूल प्रियंगू, छोटी इलायची, धनिया, तगर, जटामांसी,
खस, तालीशपत्र, उशीर, नेत्रबाला इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये।
गजा, काण्डेक्षु, कुष्ठ, होगल, कसौंदी, तगर इनके कषाय को देवे। चमेली,
चमेली की कली, हल्दी, दारूहल्दी, श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, माषपर्णी,
मूंगपर्णी इनका कषाय देवे । सिम्बल, रोहेड़ा, भादाली, रास्ना, कलम्बी, बहुवार,
धामन, क्षीरणी वृक्ष, पृश्नपर्णी, सारिवा, सिंघाड़ा इनका कषाय देवे । पिप्पली,
पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोंठ, सरखों, फाणित (राब), दूध, क्षार और नमक
इनका कषाय देना चाहिये। अथवा इच्छा के अनुसार, दोष दूष्य की अपेक्षा
से प्रयोजनानुसार वर्त्ति, चूर्ण, अवलेह, घी, तैल आदि, कषाय, मांस रस, यवागू
(लप्सी), यूष, काम्बलिक*, दूध, इनको मिलाकर बनाये लड्डू तथा अन्य
खाद्य पदार्थ तैयार करके वमन के योग्य व्यक्ति को वमनविधि से खाने के लिये
देना चाहिये। यह वमन द्रव्यों का कल्प संक्षेप में कह दिया है। वमन द्रव्यों के
कल्प को पीछे कल्पस्थान में विस्तार से कहेंगे ॥ १३३ ॥
विरेचनद्रव्याणि तु श्यामा-त्रिवृच्चतुरंगुल-तिल्वक-महावृक्ष-सप्तला-
शङ्खिनी- दन्ती-द्रवन्तीनां क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-पुष्प-फलानि यथायोगं तैस्तैः
क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-फलैर्बिक्लिप्ताविक्लेपितैरजगन्धाश्वगन्धाऽजशृङ्गी-क्षीरि-
णी-नीलिनी-क्लीतक-कषायैश्च, प्रकीर्योदकीर्या-मसूर-विदला-कम्पिल्लक-
विडंग-गवाक्षी-कषायैश्च, पीलु-प्रियाल-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषक-बदर-
दाडिमामलक-हरीतकी-विभीतक-शृङ्गीर-पुनर्नवा-विदारिगन्धादि-कषा-
यैश्च, शीधु-सुरा-सौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मदिरा-मधु-मधूलक-धा-
न्याम्ल-कुवल-बदर-खर्जूर-कर्कन्धुमिश्रश्च दधि-दधिमण्डोदश्विद्भिश्च,
गोमहिष्याजावीनां च क्षीर-मूत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्ति-
क्रिया-चूर्णासव-लेह-स्नेह-कषाय-मांसरस-यूषकाम्बलिक-यवागू-क्षीरोप-
षेयान्मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्रकारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथार्हं
विरेचनार्थाय दद्याद्विरेचनमिति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम्। कल्प-
स्त्वेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३४ ॥
☸ काम्बलिक यूष का लक्षण —
‘पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः ।
मूलैश्च तिलफल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ॥ अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान ॥