चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
मण्डः संदीपनत्यग्निं वातं चाप्यनुलोमयेत् ॥ २५० ॥
मृदूकरोति स्रोतांसि स्वेदं संजनयत्यपि ।
लङ्घितानां विरिक्तानां जीर्णे स्नेहे च तृष्यताम् ॥ २५१ ॥
दीपनत्वाल्लघुत्वाच्च मण्डः स्यात्प्राणधारणः ।
लाजपेया श्रमघ्नी तु क्षामकण्ठस्य देहिनः ॥ २५२ ॥
तृष्णातीसारशमनो धातुसाम्यकरः शिवः ।
लाजमण्डोऽग्निजननो दाहमूर्च्छानिवारणः ॥ २५३ ॥
मन्दाग्निविषमाग्नीनां बाल-स्थविर-योषिताम् ।
देयश्च सुकुमाराणां लाजमण्डः सुसंस्कृतः ॥ २५४ ॥
क्षुत्पिपासापहः पथ्यः शुद्धानां तु मलापहः ।
शृतः पिप्पलीशुण्ठीभ्यां युक्तो लाजाम्लदाडिमैः ॥ २५५ ॥
पेया ( ग्यारह गुने पानी में थोड़ी स्विन्न होने पर बनी हुई कांजी ) भूख,
प्यास, ग्लानि, दुर्बलता, उदर रोग को नष्ट करती है, स्वेदकारक, अग्नि को
बढ़ाती और वायु, मल का अनुलोमन करती है । विलेपी ( चार गुने पानी में
बनाई ) तृप्तिकारक, संग्राही लघु, हृदय के अनुकूल होती है । मण्ड ( चौदह
गुने पानी में तैयार किया ) अग्नि का दीपन और वायु का अनुलोमन करता है,
स्रोतों को कोमल करता तथा पसीना लाता है । उपवास किये, विरेचन किये,
स्नेहपान के जीर्ण होने पर, प्यास लगने पर; अग्निदीपक और लघु होने से मण्ड
का सेवन करना उत्तम है ( मण्ड, लघु और दीपक गुण वाला है ) । लाजपेया
( लाज अर्थात् खीलों से बनाई पेया ) श्रमनाशक, गले के खुश्क होजाने पर
हितकारी है । लाजमण्ड, अग्निवर्धक, दाह-मूर्च्छानाशक है । मन्दाग्नि और
विषमाग्नि वाले पुरुषों के लिये, बालक, वृद्ध, स्त्रियों को तथा कोमल-नाजुक
प्रकृति वालों को लाजमण्ड पका करके देना चाहिये * । जो भूख और प्यास
को सहन न कर सकते हों, पथ्य सेवन करते हों, वमन विरेचन से जो
शुद्ध देह वाले हों, परन्तु थोड़ा मल वमन विरेचन के पीछे रुक गया हो
इस अवस्था में पिप्पली, सोंठ, अनारदाना ( खट्टे अनार के रस ) से बनाया
लाजमण्ड अग्नि को बढ़ावा और वायु का अनुलोमन करता है ॥ २४९-२५५ ॥
सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नः संतप्तश्चौदनो लघुः ।
अधौतोऽप्रस्रुतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥ २५६ ॥
भृष्टतण्डुलमिच्छन्ति गरश्लेष्मामयेष्वपि ।
मांस-शाक-वसा-तैल-घृत-मज्ज-फलौदनाः ॥ २५७ ॥
- धनिया, पिप्पली, सोंठ, मरिच के साथ पकाना चाहिये ।
बल्याः संतर्पणा हृद्या गुरवो बृंहयन्ति च ।
तद्वन्माषतिलं क्षीर-मुद्ग-संयोग-साधिता ॥ २५८ ॥
कुल्माषा गुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः ।
स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य-गोधूम-यावकाः ॥ २५६ ॥
भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् ।
अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥
सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम-चावल (भात )
लघु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और
कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना
मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फल इनको मिलाकर
तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते हैं ।
इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार
गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका-
रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो
उड़द, मूंग, गेहुं, जौ आदि से पिठ्ठी करके बनाये जांय, वे जिस वस्तु से
बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघुगुण वाले होते हैं ।
अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत-
यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत-मांस-स्नेहादि
से संस्कृत ] मांस रस; अम्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर
भारी हैं X अर्थात् अकृत यूष से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक
मांस रस भारी है । अम्ल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६–२६० ॥
सक्तवो वातला रूक्षा बहुवर्चोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते ।
मधुरा लघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥
ग्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा-च्छर्दि-ज्वरापहाः ।
सत्तू वायुकारक, रूक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुलो-
मक, पीने पर जल्दी ही तृप्ति करने वाले, एवं शीघ्र बलकारक हैं ॐ शालि
X अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना ।
विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥
ॐ सुश्रुत ने—"पवनापहा" वायुनाशक लिखा है ।