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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५
अतिबहुत्वात्तु खलु केचिदपरिसंख्येयान्यचक्षते स्रोतांसि, परि-
संख्येयानि पुनरन्ये ॥ ५ ॥
स्रोतों के बहुत अधिक होने से कुछ आचार्य इन स्रोतों को असंख्य मानते
हैं । दूसरे आचार्य इन को गणना के योग्य मानते हैं ॥ ५ ॥
तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोप-
विज्ञानतश्चानुव्याख्यास्यामः, भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां
विज्ञानाय चाज्ञानवताम् । तद्यथा- प्राणोदकान्न-रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-
मज्ज-शुक्र-मूत्र-पुरीष-स्वेदवहानि, वातपित्तश्लेष्मणां पुनः सर्वशरीरचराणां
सर्वस्रोतांस्ययनभूतानि, तद्वदतीन्द्रियाणां पुनः सत्त्वादीनां केवलं चेत-
नावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च । तदतत्स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न
विकारैरुपसृज्यते शरीरम् ॥ ६ ॥
इन सांतों में जो स्थूल ( गणना के योग्य ) हैं, उन के कुछ भेदों की
मूल से, प्रकोप-विज्ञान ( और उपशमन ) से भी व्याख्या करेंगे सांतों की इतनी
व्याख्या बुद्धिमान् ज्ञानवान् वैद्यों के लिये अनुक्त, सूक्ष्म स्रोतों का ज्ञान कराने
और अज्ञानी, अनुमान और युक्ति से हीन पुरुषों के लिये सामान्य रूप में सांतों
का ज्ञान कराने के लिये पर्याप्त होगी ।
यथा- प्राणवह, जलवह, अन्नवह, रसवह, रुधिरवह, मांसवह, मेदवह,
अस्थिवह, मज्जावह, शुक्रवह, मूत्रवह, पुरीषवह और स्वेदवह ये तेरह प्रकार के
स्रोत हैं । वात, पित्त, कफ ये सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए हैं, इस लिये इन को ले
जानेवाले सब स्रोत हैं । इसी प्रकार अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से अग्राह्य ) सत्त्व
आदि ( मन आदि ) पदार्थों का चेतना युक्त यह सम्पूर्ण शरीर मार्ग तथा
आश्रय है । स्रोत शरीर के धातुओं को ले जानेवाले हैं, इसलिये सांतों के
प्रकृति में स्थित रहने से यह शरीर विकारों अर्थात् रोगों से आक्रान्त नहीं होता
सांतों के विकृत होने पर शरीर भी रोगी हो जाता है ॥६॥
तत्र प्राणवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं महास्रोतश्च, प्रदुष्टानां खल्वे-
षामिदं विशेषविज्ञानं भवति, अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पाल्पमभी-
क्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ्वसन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टा-
नीति विद्यात् ॥ ७ ॥
इन से प्राणवह स्रोतों का मूल ( प्रभाव स्थान ) हृदय और महा सांत
(कोष्ठ भी) है। इन प्राणवह सांतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। जैसे-प्राण
का अतिसर्पण ( प्रश्वास का दीर्घ होना ), अतिबद्ध ( रुक रुक कर श्वास का

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चलना), प्रकुपित (बहुत तेजी से चलना), थोड़ा थोड़ा चलना, अभीक्ष्ण (बार-
बार रुक रुक कर आना), शब्दशूल अर्थात् वेदनायुक्त शब्द के साथ, श्वास लेते
हुए रोगी को देखकर प्राणवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥७॥
उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च। प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं
विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—जिह्वा-ताल्वोष्ठ-कण्ठ-क्लोम-शोषं पिपासां
चातिप्रवृद्धां दृष्ट्वा भिषगुदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥८॥
उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम (पित्ताशय) है। इन उदक-
वह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। यथा—जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ
क्लोम का सूख जाना, प्यास का बहुत अधिक लगना ये लक्षण देखकर उदक-
वह-स्रोत विकृत हुए हैं यह समझना चाहिये ॥८॥
अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वम्। प्रदुष्टानां तु
खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—अनन्नाभिलषणमरोचका-
विपाकौ छर्दि च दृष्ट्वाऽन्नवहानि स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ६ ॥
अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है। इन के दुष्ट होने पर
ये लक्षण होते हैं। यथा—अन्न की रुचि का न होना, अरुचि, अविपाक, वमन।
इन लक्षणों को देखकर अन्नवह स्रोत विकृत हुए यह समझना चाहिये ॥ ९ ॥
रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः। शोणितवहानां
स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च। मांसवहानां च स्रोतसां स्नायु मूलं त्वक्च
मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च। अस्थिवहानां स्रोतसां
मेदो मूलं जघनं च। मज्जावहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं संधयश्च।
शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणो मूलं शेफश्च। प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसा-
दिस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीयेऽध्याये। यान्येव हि
धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं धातुस्रोतसाम् ॥ १० ॥
रसवह स्रोतों का मूल हृदय और हृदय से सम्बद्ध दस धमनियां
हैं। शोणित (रक्त) वह स्रोतों का मूल यकृत् और प्लीहा है।
मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है। मेदोवह स्रोतों का मूल दो
वृक्क (दो मांसपिण्ड एक दक्षिण पार्श्व में स्थित और दूसरा वाम पार्श्व में
१. क्लोम को सुश्रुत में 'पिपासा-स्थान' माना है। क्लोम का स्थान गले में
जरा नीचे की ओर दक्षिण पार्श्व में मना है। जिसको आज कल 'तिलक' या
(कण्ठकूप) कहते हैं। वैद्य श्री हरिप्रपन्न ने 'क्लोम याथातथ्यम्' नाम एक
पुस्तक लिखी है उस में पित्ताशय को यह नाम दिया है।