चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] निदानस्थानम् ४७५
अ० ८ ] निदानस्थानम् ४७५
सान्निपातिक अपस्मार—जिस अपस्मार में तीनों दोषों के लक्षण मिले
रहते हैं; उस को सान्निपातिक अपस्मार समझना चाहिये। यह असाध्य है, इस
प्रकार से चार प्रकार के अपस्मार कह दिये ॥ १० ॥
तेषामागन्तुरनुबन्धो भवत्येव कदाचित्, स उत्तरकालमुपदे-
क्ष्यते। तस्य विशेषविज्ञानं यथोक्तैर्लिङ्गैरैलिङ्गाधिक्यमशेषलिङ्गानु-
रूपं किंचित् ॥ ११ ॥
इन चार प्रकार के अपस्मार रोगों में भाग्य से कभी आगन्तुज अपस्मार
का सम्बन्ध होता है। इस का विस्तार आगे चिकित्सा-स्थान में करेंगे।
जिस अपस्मार में उपरोक्त लक्षणों से भिन्न लक्षण अथवा लक्षणों की अधिकता
या दोषों के लक्षणों से भिन्न लक्षण दिखाई दें; उसे आगन्तुज अपस्मार
समझना चाहिये ॥ ११ ॥
सर्वमेवं हितम्। हितान्यपस्मारिभ्यस्तीक्ष्णानि चैव संशोधनान्यु-
पशमनानि च यथास्वं, मन्त्रादीनि चाऽऽगन्तुसंयोगे ॥ १२ ॥
चिकित्सा सूत्र—अपस्मार रोगी के लिये तीव्र संशोधन या तीव्र संशमन
सब औषधियां हितकारी हैं। आगन्तुज अपस्मार में मंत्र आदि का प्रयोग
करना होता है ॥ १२ ॥
तस्मिन् हि दक्षाध्वरोध्वंसे देहिनां नाना दिक्षु विद्रवतामतिसरण-
प्लवन-धावन-लङ्घनाद्यैर्देहविक्षोभणैः पुरा गुल्मोत्पत्तिर्भूत्, हविष्प्रा-
शान्मेहकुष्ठानां, भयोत्रासशोकैरुन्मादानां, विविधभूताशुचिसंस्पर्शाद-
पस्माराणां, ज्वरस्तु खलु महेश्वर ललाटप्रभवः, तत्संतापाद्रक्तपित्तं,
अतिव्यवायात्पुनर्नक्षत्रराजस्य राजयक्ष्मेति ॥ १३॥
भिन्न भिन्न रोगों की उत्पत्ति—प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ
का विध्वंस होने के समय सब प्राणी इधर-उधर दिशाओं में भागे। इन के
भागने, कूदने-फांदने आदि शरीर को विक्षोभित करने वाली चेष्टाओं से
'गुल्म' रोग की उत्पत्ति हुई। हविष्य के अधिक खाने से 'प्रमेह' और 'कुष्ठ'
रोग की; भय डर और शोक से 'उन्माद' रोग की; नाना प्रकार के अपवित्र
पदार्थों के स्पर्श से 'अपस्मार' रोग की उत्पत्ति हुई। ज्वर महादेव के माथे
से उत्पन्न हुआ है, ज्वर के सन्ताप से 'रक्तपित्त' रोग और नक्षत्रराज चन्द्रमा
के अति स्त्रीसंग से 'राजयक्ष्मा' रोग उत्पन्न हुआ ॥ १३ ॥
अपस्मरति वातेन पित्तेन च कफेन च ।
सन्निपातेन प्रत्याख्येयस्तथाविधः ॥ १४ ॥
५७६ चरकसंहिता [ अ० ८
साध्यांस्तु भिषजः प्राज्ञाः साधयन्ति समाहिताः।
तीक्ष्णैः संशोधनैश्रैव यथास्वं शमनैरपि ॥ १५ ॥
यदा दोषनिमित्तस्य भवत्यागन्तुरन्वयः ।
तदा साधारणं कर्म प्रबदन्ति भिषग्वराः ॥ १६ ॥
साध्य और असाध्य—अपस्मार चार प्रकार का है । वातजन्य, पित्तजन्य,
कफजन्य और सन्निपातजन्य । इन में सन्निपातजन्य असाध्य है । साध्य
अपस्मारों को बुद्धिमान् वैद्य तीक्ष्ण संशोधन एवं संशमन क्रिया से अच्छा
करते हैं और जिस समय दोषज और आगन्तुज दोनों अपस्मार मिले रहते हैं
उस समय उत्तम वैद्य दोनों प्रकार की मिश्रित चिकित्सा करते हैं ॥१४-१६॥
सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वौषधविशेषवित् ।
भिषक् सर्वामयान् हन्ति न च मोहं निगच्छति ॥ १७॥
इत्येतदखिलेनोक्तं निदानस्थानमुत्तमम् ।
रोगज्ञान का फल—सब रोगों को और सब ओषधियों को भली प्रकार से
जानने वाला वैद्य सब प्रकार के रोगों को शान्त कर सकता है और कभी भी
घबराता नहीं । इस प्रकार से उत्तम निदानस्थान को सम्पूर्ण रूप में कह
दिया है ॥ १७ ॥
निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलब्धये ॥ १८ ॥
तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ।
रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां शोषश्चाप्युपजायते ॥ १९ ॥
प्लीहाभिवृद्धया जठरं जठराच्छोथ एव च ।
अर्शोभ्यो जठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ॥ २० ॥
प्रतिश्यायात्तथो कासः कासात्संजायते क्षयः ।
क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ॥ २१ ॥
एक रोग के कारण दूसरा रोग—एक रोग दूसरे रोग का निदान
अर्थात् उत्पादक कारण भी होता है । जैसे—ज्वर-सन्ताप से रक्तपित्त रोग
उत्पन्न होता है । रक्तपित्त और ज्वर से शोष रोग उत्पन्न होता है । प्लीहा के
बढ़ने से उदर रोग, उदर रोग से शोथ रोग उत्पन्न होता है । अर्श रोग से
दुःखदायी उदर रोग तथा गुल्म रोग भी उत्पन्न हो जाता है । प्रतिश्याय
से कास और कास रोग से क्षय तथा क्षय रोग से दूसरे अन्य रोग या शोष ही
उत्पन्न हो जाता है ॥ १८-२१ ॥
ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ।
उभयार्थकरा दृष्टास्तथैवैकार्थकारिणः॥ २२ ॥