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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१

अ० १५ ] सूत्रस्थानम् १६१
वमन करते हुए रोगी को पकड़ कर सहारा देना चाहिये । इसके लिये कोई
माथे को, कोई पसलियों को पकड़े, कोई पेट को दबाये, और कोई पीठ को मले ।
इस कार्य में जिनके सामने लज्जा अनुभव न हो ऐसे मनोऽनुकूल मित्र सहा-
यता करें ॥११-१२॥
अथैनमनुशिष्यात् — विवृतौष्ठ-तालु-कण्ठो नातिमहता व्यायामेन
वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनम्य ग्रीवामूर्ध्वशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान्
प्रवर्तयन सुपरिलिखितनखाभ्यामङ्गुलीभ्यामुत्पल-कुमुद-सौगन्धिक-ना-
लैर्वा कण्ठमनभिस्पृशन् सुखं प्रवर्त्तयस्व—इति ॥ १३ ॥
स तथाविधं कुर्यात् । ततोऽस्य वेगान् प्रतिग्रहागतानवेक्षेताव-
हितः । वेगविशेषदर्शनाद्धि कुशलो योगायोगातियोगविशेषानुपलभेत,
वेगविशेषदर्शी पुनः कृत्यं यथार्हमवबुध्येत लक्षणेन, तस्माद्वेगानवे-
क्षेतावहितः ॥ १४ ॥
इसके अनन्तर वैद्य रोगी को उपदेश दे कि तालु और गला खोल कर
बहुत अधिक बल से नहीं, प्रत्युत साधारण शक्ति से बाहर आते हुए वेग को
बाहर करे । इसके लिये गर्दन, तथा मुख को आगे की ओर झुका दे तथा अनु-
पस्थित वेग को बाहर निकालने के लिये खूब अच्छी प्रकार से नखों से रहित
दो अंगुलियों, अथवा कमल, कुमुद या सुगन्धित कमल की डण्डों से धीरे-धीरे
गले के भीतर स्पर्श करे और वेग को बाहर कर देवे । रोगी वैद्य के कहे अनु-
सार करे । वैद्य रोगी के वमन किये पदार्थ को सावधानी से देखे । कुशल,
चतुर वैद्य वेग को देख कर ही सम्यक् योग, अयोग और अतियोग का अनु-
मान कर सकता है । वेग को समझने में चतुर वैद्य वेग देखकर लक्षणों से
अतियोग आदि के प्रतिकार को ठीक प्रकार से समझ लेता है । इसलिये वैद्य
सावधानी से वेगों को देखे ॥१३-१४॥
तत्रामुन्ययोग-योगातियोग-विशेषज्ञानानि भवन्ति, तद्यथा-अप्र-
वृत्तिः कुतश्चित् केवलस्य वाऽप्यौषधस्य विभ्रंशो विबन्धो वेगानामयो-
गलक्षणानि भवन्ति । काले प्रवृत्तिरनतिमहती व्यथा यथाक्रमं दोषह-
रणं स्वयं चावस्थानमिति योगलक्षणानि भवन्ति । योगेन तु दोषप्रमाण-
विशेषेण तीक्ष्ण-मृदु-मध्यविभागो ज्ञेयः, योगाधिक्येन तु फेनिल-रक्त-
चन्द्रिकोपगमनमित्यतियोगलक्षणानि भवन्ति । तत्रातियोगायोगनि-
मित्तानमानुपद्रवान् विद्यात्-आध्मानं परिकर्तिकां परिस्रावो हृदयो-
पसरणामङ्गग्रहो जीवादानं विभ्रंशः स्तम्भः क्लम उपद्रव इति ॥ १५ ॥

An accurate, line-by-line Devanagari transcription of the page is presented below:

१६२ चरकसंहिता [ अ० १५
अयोग, सम्यक् योग और अतियोग के विशेष लक्षण ये हैं । जैसे किसी
विशेष कारण से ( गले में अंगुली आदि डालने से भी वमन का थोड़ा आना
अथवा, वमनकारक औषध ही का केवल बाहर आना,) वेगों का रुक जाना
ये अयोग के चिन्ह हैं । न तो बहुत जल्दी और न देर में ठीक समय पर
वमन का आना; वमन करने में कष्ट का अधिक न होना, क्रम से
पहले कफ, फिर पित्त और अन्त में वायु इन दोषों का बाहर आना; और
वमन का अपने आप रुक जाना सम्यक् योग के लक्षण हैं । सम्यक् योग में दोषों
के प्रमाणों के अनुसार तीक्ष्ण, मृदु और मध्य भाग होते हैं । वमन के अतियोग
से झागदार, रक्तमिश्रित, चन्द्रिका का आना ये अतियोग के लक्षण हैं । अतियोग
और अयोग से होने वाले उपद्रवों को जानना चाहिये । अफारा, गुदा में काटने
के समान पीड़ा होना, स्राव होना, हृदय का बाहर आना, अर्थात् कलेजे का
मुख को आना ( आमाशय का बाहर आना सा प्रतीत होना ), अंगों में वेदना
और जकड़ना, रक्त का बाहर निकलना, शरीर का विभ्रम ( चक्कर आना ),
शरीर की जड़ता, शरीर में थकान, उदासी का होना, ये अयोग और अतियोग
के उपद्रव हैं ॥ १५ ॥
योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्रक्षालित-पाणि-पादास्यं
मुहूर्तमाश्वास्य, स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं साम-
र्थ्यतः पाययित्वा, पुनरेवोदकमुपस्पर्शयेत् ॥ १६ ॥
उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्—
उच्चैर्भाष्यमत्यासनमतिस्थानमतिचङ्क्रमणं क्रोध-शोक-हिमातपावश्याया-
तिप्रवातान् यानयानं ग्राम्यधर्ममस्वप्नं निशि दिवा स्वप्नं विरुद्धाजी-
र्णासात्म्याकालप्रमितातिहीन-गुरु-विषम-भोजन-वेग-सन्धारणोदीरण-
मिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमाहारमद्यात्-इति । स तथा
कुर्यात् ॥ १७ ॥
सम्यक् योग से वमन कर चुकने पर रोगी को देखकर उसके हाथ पांव, मुख
धुलवा कर थोड़ी देर विश्राम लेने दे । इसके पीछे स्नैहिक, वैरेचनिक या
उपशमनीय कोई एक प्रकार का धूम यथाशक्ति पिलाकर फिर पानी से हाथ
पांव धुला देवे । पानी से मुंह हाथ धुलाकर वमन किये पुरुष को वायुरहित—
सीधी वायु जिसमें न आ सके, एक पार्श्व से आये, ऐसे घर में लेजा कर लेटा
दे और निम्न आदेश करे—ऊंचा बोलना, बहुत देर बैठना, बहुत सोना,
बहुत चलना-फिरना, क्रोध, शोक, ठण्डक, धूप, ओस, वायु में अधिक बैठना,
घोड़े आदि की सवारी अधिक करना, मैथुन, रात में जागना, दिन में सोना,