चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
फलानां यानि चान्यानि तेषामन्याहारसंविधौ ।
युज्यन्ते गुणकर्मभ्यां तानि ब्रूयाद्यथाफलम् ॥ २८२ ॥
मधुरो बृंहणो वृष्यो बल्यो मज्जा तथा वसा ।
यथासत्त्वं तु शैत्योष्णे वसामज्झोर्विनिर्दिशेत् ॥ २८३ ॥
तिल का तैल कषाय अनुरस, स्वादु, सूक्ष्म ( स्रोतों में घुसनेवाला ) उष्ण,
व्यवायी, छिद्रों में पहुंचने वाला ( शरीर में फैलनेवाला ), पित्तकारक, मल
मूत्र को रोकने वाला है, परन्तु कफ को बढ़ानेवाला नहीं है । वातनाशक ओष-
धियों में श्रेष्ठ, बलकारक, त्वचा के लिये हितकारी, बुद्धि, और अग्नि को बढ़ाने
वाला है, संयोग एवं संस्कार करने से सब रोगों को नाश करने वाला है।
प्राचीन काल में इस तेल के प्रयोग से दैत्याधिपति, बुढ़ापे से रहित, विकार-
शून्य, परिश्रम सहन करनेवाले, न थकने वाले, लड़ाई में बहुत बलवान् हुए थे।
( १ ) ऐरण्ड का तेल-मधुर, गुरु, कफ को बढ़ानेवाला, वातरक्त, गुल्म,
हृदय रोग, अजीर्ण और ज्वरका नाशक है । सरसो का तेल कटु, उष्ण, रक्त-
पित्त को दूषित करने वाला, कफ, शुक्र और वायु को नष्ट करने वाला, कण्डू
और कोठ का नाशक है। (सरसो के तेल को खाने से रक्त पित्त दूषित होते हैं,
मलने से नहीं ) ( ३ ) पियाल फल ( चिरौंजी ) का तैल मधुर, गुरु, कफ को
बढ़ाने वाला और बहुत गरम न होने से वात-पित्त के संम्मिलित विकारों में
उत्तम है ( ४ ) अलसी का तेल-मधुर, अम्ल, विपाक में कटु, उष्णवीर्य वात-
रोग में हितकारी, रक्त और पित्त को कुपित करने वाला है । ( ५ ) सनिये का
तेल-गरम, विपाक में कटु, गुरु, विदाही और सब रोगों को ( दोषों को ) कुपित
करने वाला है । जिन फलों से अन्य तैल तैयार किये जाते हैं, उन तैलों के
गुण उन्हीं फलों के अनुसार समझने चाहिये ।
चिरायता तिक्तक, अतिमुक्तक, बिभीतक ( बहेड़ा ) ना रियल, बेर, अख-
रोट, जीवन्ती, पियाल ( चिरौंजी ) कुसुंदार, सूर्यवल्ली, त्रपुस, ऐरावारू, ककरि
कूष्माण्ड आदि के तेल मधुर, मधुरवीर्य, मधुर विपाक वाले, वात पित्त को शान्त
करने वाले, शीतवीर्य, मार्गशोधक, मलमूत्रकारक, अग्निवर्धक होते हैं ( सुश्रुत )
मज्जा और वसा, मधुर रस, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, बलकारक होता है। इनकी
शीतता और उष्णता प्राणियों के अनुसार समझनी चाहिये। जिस प्राणी का मांस
उष्ण है उसकी मज्जा भी उष्ण, जिसका मांस शीत उस प्राणी की मज्जा भी
शीत समझनी चाहिये ॥ २८४-२६३ ॥
अस्नेहं दीपनं वृष्यमुष्णं वातकफापहम् ॥ २६४ ॥
विपाकेमधुरं हृद्यं रोचनं विश्वभेषजम् ॥
श्लेष्मला मधुरा चार्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ।
सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २९५ ॥
नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् ।
छेदित्वाच्छोषणत्वाच्च दीपनं कफवातजित् ॥ २९६ ॥
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कटूष्णं दीपनं लघु ।
हिङ्गु शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २९७ ॥
रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च ।
त्रिदोषघ्नं समधुरं सैन्धवं लवणोत्तमम् ॥ २९८ ॥
सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ।
सौवर्चलं विबन्धघ्नं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २९९ ॥
तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् ।
ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं बिडम् ॥ ३०० ॥
सतिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम् ।
न काललवणे गन्धः सोवर्चलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥
सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् ।
रोचनं लवणं सर्वं पाकि संस्र्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥
हृत्पाण्डु-ग्रहणी-दोष-प्लीहानाह-गलग्रहान् ।
कासं कफजमर्शांसि यावशूको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥
तीक्ष्णोष्णो लघुरूक्षश्च क्लेदी पक्ता विदारणः ।
दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंन्निभः ॥ ३०४ ॥
कारव्यः कुञ्चिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बरु ।
रोचनं दीपनं वात-कफ-दौर्गन्ध्य-नाशनम् ॥ ३०५ ॥
आहारयोगिनां भक्तिनिश्चयो न तु विद्यते ।
समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥
सोंठ—थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक,
विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है। हरी पिप्पली-कफ-
कारक, मधुर, गुरु और स्निग्ध होती है। सूखी पिप्पली कफ वातनाशक कटु,
उष्ण, वीर्यवर्धक है। काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, वीर्य को न बढ़ाने
वाली, लघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली
और शोषक होने से अग्निदीपक एवं कफ-वातनाशक है। और हरी अवस्था में
स्वादु गुरु, कफवर्धक होती है। हींग वायु-कफ विबन्धनाशक, कटु, उष्ण,
अग्निदीपक, लघु, शूलनाशक, पाचक और रुचिकर है। सेन्धा नमक—रुचि-