चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ )
[बायाँ स्तम्भ]
उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में
सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु-अन्य
ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ ।
रात्रिजागरण के दोष । निद्रोत्पादक
उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के
उपाय । उपसंहार ।
द्वाविंशतितमोऽध्यायः (पृ०२५६-२६१)
लंघनबृंहणीयः—वैद्य का लक्षण
लंघन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्ब-
न्ध में अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय
पुनर्वसु का प्रतिवचन । लंघन, बृंहण,
स्वेदन, स्तम्भन के लक्षण । लंघन,
बृंहण आदि कारक द्रव्यों के कारण ।
लंघन के योग्य व्यक्ति । बृंहण के योग्य
द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य
व्यक्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और
स्तंभन योग्य व्यक्ति । सम्यक् लंघन
और लंघन के अतियोग के लक्षण ।
सम्यक् बृंहण और बृंहण के अतियोग के
लक्षण । रूक्षण के सम्यकयोग और
अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग
और अतियोग के लक्षण । लंघन आदि
छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के
दुष्परिणाम ।
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६१-२६६
सन्तर्पणीयः—सन्तर्पणजन्य रोग
के कारण । रोगों के लक्षण—उनकी
चिकित्सा । अपतर्पण और तज्जन्य रोग—
उनका उपशमन ।
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७४
विधिशोणितीयः—विशुद्ध रक्त
का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण
[दायाँ स्तम्भ]
और लक्षण । चिकित्सा । विशुद्ध रक्त
का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का
लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के
लक्षण । अपस्मार और संन्यास के
लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार ।
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२८१
यज्जःपुरुषीयः—पुरुष और रोग
की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद ।
पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और
रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' है ।
शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का
उत्पादन 'सत्त्व' है । वार्योविद का मत
प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल
'रस' है । कुशिक हिरण्याक्ष का मत
पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न
होते हैं । शौनक का मन रोगों और
पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई ।
भद्रकाप्य का मत कर्म से पुरुष और
रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वाज का मत
कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग
उत्पन्न होते हैं । कांकायन का मत सुख
दुःख, चेतन अचेतन का कर्त्ता प्रजापति
हैं । आत्रेय भिक्षु का मत पुरुष और
रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु
आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से
पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए ।
इस पर पुरुषों और रोगों की वृद्धि के
कारण के विषय में काशिपतिवामक
का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति-
वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश
आत्रेय संवाद हित अहित का लक्षण ।
आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।