चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
साध्यानामपि ह्युपेक्ष्यमाणानामेषां त्वङ्-मांस-शोणित-लसीका-को-
थ-क्लेद-संस्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति । ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषांश्च
पुनर्दुष्यन्त इमानुपद्रवान् पृथक्पृथगुत्पादयन्ति ।
साध्य कुष्ठों में भी उपेक्षा करने से त्वचा, मांस, रक्त, लसीका में सड़ना,
स्राव और पसीने से कीड़े उत्पन्न होजाते हैं। ये कृमि त्वचा आदि को खाते
हैं, और वात आदि दोष और अधिक दूषित होकर नीचे लिखे उपद्रवों को
पृथक् पृथक् रूप में उत्पन्न करते हैं।
तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपि च रौक्ष्य-शूल-शोष-तोद-वेपथु-
व्यथा-हर्ष-संकोचाऽऽयास-स्तम्भ-सुप्ति-भेद-भङ्गान्, पित्तं पुनर्दाह-स्वेद-
क्लेद-कोथ-कण्डू-स्राव-पाक-रागान्, श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्य-शैत्य-स्थैर्य-
कण्डू-गौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, कृमयस्त्वगादींश्चातुरः शिराः स्नायूनि
मांसान्यस्थीन्यपि च तरुणानि खादन्ति ॥ १८ ॥
अस्यामवस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं स्पृशन्ति । तद्यथा—प्रस्रवण-
मङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णा-ज्वरातिसार-दाह-दौर्बल्यारोचका-
विपाकाश्च, तद्विधमसाध्यं विद्यादिति ॥ १९ ॥
उपद्रव—वायु के कोप के कारण रंग लाल, काला, कर्कशता, रूक्षता, शूल
चुभने की सी वेदना, बींधने का सा अनुभव, रोमांच, हर्ष, कम्प, संकोच,
श्रम, स्तम्भ, अंग का सो जाना, भेदन या भंग अर्थात् अंगों का टूटना—ये
उपद्रव होते हैं। पित्तप्रकोप के कारण दाह, पसीना, क्लिन्नता, सड़ना, खाज,
स्राव, पकना इत्यादि उपद्रव होते हैं। कफ के प्रकोप के कारण, श्वेत वर्ण,
शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकनास, उपलेप होना ये—
उपद्रव होते हैं।
इस प्रकार से उत्पन्न कीड़े त्वचा आदि चार धातुओ को तथा शिरा,
स्नायु, मांस एवं कोमल अस्थियों (जैसे नाक की कोमल अस्थि) को
खाने लगते हैं। इस अवस्था में कुष्ठरोगी को निम्न लिखित उपद्रव घेर लेते
हैं। यथा-स्राव का बहना, अंगों का फटना या टूटना, अंगों का गिरना, तृष्णा,
ज्वर, अतिसार, दाह, निर्बलता, अरुचि, अविपाक ये उपद्रव होते हैं। इस
अवस्था में रोग असाध्य हो जाता है ॥ १८-१९ ॥
चात्र—साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते ।
स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥ २० ॥
यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु च ।
४५४ चरकसंहिता [ अ० ६
भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते ॥ २१ ॥
यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः ।
स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २२ ॥
एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम् ।
विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ २३ ॥
जो मनुष्य रोग के आरम्भ में 'साध्य' है ऐसा समझ कर उपेक्षा कर देता
है, वह थोड़े समय पीछे ही मुर्दा होकर ( असाध्यावस्था में आकर ) ही चेतता
है, और रोग के असाध्य होने पर ही उसकी नींद टूटती है । जो मनुष्य-रोग
के आक्रमण से पूर्व ही या रोग की नवीन अवस्था में ही औषध उपचार कर
लेता है, वह देर तक सुख ( जीवन ) का उपभोग करता है । जिस प्रकार थोड़े
से परिश्रम से ही छोटा वृक्ष काटा जा सकता है, वही वृक्ष बड़ा होने पर बहुत
परिश्रम से कटता है, इसी प्रकार नवीन अवस्था में रोग भी सुगमता से अच्छा
हो जाता है और यही रोग बढ़ने पर कठिनाई से अच्छा होता है, अथवा
असाध्य रूप में बदल जाता है ॥२०-२३॥
तत्र श्लोकाः-संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वरक्षणम् ।
रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक् ॥ २४ ॥
इस कुष्ठनामक अध्याय में कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, हेतु, दोष, पूर्वरूप,
और उपद्रव ये सब विषय पृथक् पृथक् कह दिये हैं ॥ २४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं
नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब शोष के निदान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश
किया है ॥१-२॥
इह खलु चत्वारि शोषस्याऽऽयतनानि । तद्यथा-साहसं, संधा...
क्षयो, विषमाशनमिति ॥ ३ ॥
शोष रोग के चार कारण होते हैं जैसे-( १ ) साहस, ( २ ) सन्...
( मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना ), ( ३ ) क्षय, ( ४ ) विषमाशन
( विषम गुणों वाले अन्नों का भोजन करना ), ॥ ३ ॥
तत्र यदुक्तं साहसं शोषस्याऽऽयतनमिति तदनुव्याख्यास्यामः—यदा
पुरुषो दुर्बलो हि सन् बलवता सह विगृह्णाति, अतिमहता वा धनुषा
व्यायच्छति, जल्पति वाऽप्यतिमात्रं, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु
वा प्लवते चातिदूरं, उत्सादनपदाघाताने वाऽतिप्रगाढमासेवते, अति-
प्रकृष्टं वाऽध्वानं द्रुतमभिधावति, अभिहन्यते वाऽन्यद्वा किंचिदेवंविधं
विषममतिमात्रं वा, व्यायामजातमारभते; तस्यातिमात्रेण कर्मणा उरः
क्षण्यते ॥
साहस शोषरोग का कारण है, यह जो कहा है, इसकी व्याख्या करेंगे—
जब कोई दुर्बल पुरुष अपने से बलवान् व्यक्ति के साथ कुश्ती आदि करता है,
बहुत बड़े धनुष को तानता है, अथवा बहुत अधिक बोलता है, बहुत अधिक
बोझ को उठाता है, पानी में बहुत तैरता है, बहुत ऊंचा लम्बा कूदता है, जोर
से भूमि पर पांव पटकता है, या बहुत लम्बे या कठिन रास्ते को बहुत तेज़ो
से पार करता है, अथवा ऊंचे-नीचे या किसी भारी दुःसह कार्य द्वारा
चोट खाता है या और कोई ऐसा ही विषम या बहुत अधिक व्यायाम
करता है अथवा आरम्भ किये कार्य को बहुत अधिक करता है; इससे उस की
छाती फट पड़ती है ॥
तस्योरःक्षतमुपस्रवते वायुः, स तत्रावस्थितः श्लेष्माणमुरःस्थमुपसं-
सृज्य शोषयन् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च । योऽशस्तस्य शरीरसंधीना-
विशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्चोपजायते, यस्त्वमाशयमभ्युपैति
तेनास्य वर्चो भिद्यते, यस्तु हृदयमाविशति तेन रोगा भवन्त्युरस्याः,
यो रसनां तेनास्यारोचकश्च, यः कण्ठं प्रपद्यते, कण्ठस्तेनोद्ध्वंस्यते
स्वरश्चावसीदति, यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्या-
यश्चोपजायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते ॥३॥
इन घावों में वायु प्रवेश कर जाता है । वायु प्रवेश करके छाती में स्थित
कफ के साथ मिलकर इसको सुखाकर ऊपर, नीचे या तिर्यक् दशा में स्वयं
गमन करने लगता है । इस वायु का जो अंश शरीर की सन्धियों में जाता है,
जम्भाई, अंगों का टूटना और ज्वर उत्पन्न हो जाता है और जो अंश
में पहुँचता है उससे मल पतला आता है, जो भाग हृदय में पहुँचता
हृदय ( छाती ) में अन्य रोग होते हैं । जो जीभ में पहुँचता है उससे
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अरुचि, जो भाग कण्ठ में पहुँचता है, उससे कण्ठ नष्ट होता तथा स्वरभंग
हो जाता है, जो भाग प्राणवह स्रोतों में पहुँचता है उससे श्वास और प्रतिश्याय
उत्पन्न होते हैं और जो भाग शिर में पहुंचता है उससे शिरोरोग होता है ॥३॥
ततः क्षणाच्चैबोरसो विषमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वं-
सनात्कासः सततमस्य संजायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं
ष्ठीवति, शोणितागमाच्चास्य दौर्गन्ध्यमुपजायते, एवमेते साहसप्रभवाः
साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः
शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य
तदनुरूपाणि कर्माण्यारहभेत कर्तुं, बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च
पुरुष इति ॥ ४ ॥
इसके अनन्तर छाती में व्रण होने और वायु की विषम गति होने से तथा
कण्ठ के खर्खर बनने से निरन्तर कास (खाँसी), उत्पन्न हो जाता है । कास
के होने से छाती में व्रण बनने से थूक में रक्त आ जाता है, रक्त के आने से
दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार से साहस करने वाले पुरुष को साहस
से उत्पन्न होने वाले उपद्रव घेर लेते हैं । इन शुष्क करने वाले उपद्रवों से
आक्रान्त होकर पुरुष भी धीरे-धीरे सूख जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य
को चाहिये कि अपने बल को देखकर तदनुसार कार्य का आरम्भ करे । बल के
कारण ही शरीर अच्छे प्रकार से धारण किया जाता है और शरीर ही पुरुष
अर्थात् आत्मा का मुख्य आश्रय है ॥ ४ ॥
भवति चात्र-साहसं वर्जयेत्कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः ।
जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते ॥ ५ ॥
अपना जीवन चाहने वाले पुरुष को साहस के कार्य छोड़ देने चाहिये,
क्योंकि जीता हुआ पुरुष ही अपने कर्म का इष्टफल भोग सकता है ॥५॥
अथ संधारणं शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः-
यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तृसमीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभामन्यं
सतां समाजं स्त्रीमध्यं वाऽनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियन् भयात्
प्रसंगात् ह्रीमत्त्वाद् घृणित्वाद्रा निरुणद्ध्यागतानि वातमूत्रपुरीषाणि,
तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमाद्यते । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ
समुदीर्योर्ध्वमधस्तिर्यक् च विहरति । तत्रग्दांशविशेषेण पूर्वं
वयवविशेषं प्रविश्य शूलं जनयति, भिनत्ति पुरीषमुच्छोष
पार्श्वे चातिरुजति, अंसौ चावमृद्नाति, कण्ठमुरश्चावधमति,