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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ६ ] -निदानस्थानम् ४६३

अ० ६ ] -निदानस्थानम् ४६३
अन्दर अरिष्ट उत्पन्न हो सकते हैं और बिना कारण ही अरिष्ट लक्षण दीखने
लगते हैं ॥ १६ ॥
तत्र श्लोकः—समुत्थानं च लिङ्गं च यः शोषस्यानुबुद्ध्यते ।
पूर्वरूपं च तत्त्वेन स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
जो वैद्य शोष की उत्पत्ति, लक्षण और पूर्वरूप भली प्रकार से जानता है
वह राजयक्ष्मा की चिकित्सा करने के योग्य है ॥ १७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने
शोषनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः ।
अथात उन्मादनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब उन्माद निदान का वर्णन करेंगे ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश
किया है ॥ २ ॥
इह खलु पञ्चोन्मादा भवन्ति । तद्यथा—वात-पित्त-कफ-सन्निपा-
ताऽऽगन्तु-निमित्ताः ।
उन्माद पांच प्रकार के हैं । जैसे—( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य,
( ३ ) कफजन्य, ( ४ ) सन्निपातजन्य और ( ५ ) आगन्तुज । इन में से
पहिले चार उन्माद दोषजन्य हैं ।
तत्र दोषनिमित्ताश्चत्वारः पुरुषाणामेवंविधानां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते
तद्यथा,—भीरूणामुपक्लिष्टसत्त्वानामुत्सन्नदोषाणां च समलविकृतोप-
हितान्यनुचितान्याहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां
तन्त्रप्रयोगं वा विषममाचरतामन्यां वा चेष्टां विषमां समाचरतामत्यु-
पक्षीणदेहानां च व्याधि-वेग-समुदीरितानामुपहतमनसां वा काम-
क्रोध-लोभ-हर्ष-भय-मोहायास-शोक-चिन्तोद्वेगादिभिः पुनरभिघा-
ताच्चाहतानां वा मनस्युपहते बुद्धौ च प्रचलितायामभ्युदीर्णा दोषाः
कुपिता हृदयमुपसृत्य मनोवहानि स्रोतांस्यावृत्य जनयन्त्युन्मादम् ॥ ३ ॥
( दोषजन्य उन्माद निम्न लक्षणोंवाले व्यक्तियों में शीघ्र उत्पन्न
.जो मनुष्य डरपोक हों, जिन के शरीर में सत्त्व गुण न हो,

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(अपि तु रज और तम हों), जिन में वात आदि दोष बढ़े हुए हों, जो अपवित्र
बिगड़े हुए एवं विरोधी गुणवाले पदार्थों से मिले, अथवा कुष्ठ आदि के
रोगी मनुष्यों द्वारा खाये हुए अन्न पान खाते हों, विषम रीति से भोजन करने
वाले व्यक्तियों में, शास्त्रोक्त विधि के विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुषों में,
अथवा कोई अन्य प्रकार की विषम चेष्टा करने वाले व्यक्तियों में, जिन का
शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया हो, जिनका चित्त रोग के वेग के कारण उद्भ्रान्त
हो चुका हो, जिन का मन, काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, आयास,
(थकान), शोक, चिन्ता और उद्वेग आदि द्वारा दुःखित होता है, घाव या
चोट के लगने से जिनका मन ठिकाने पर नहीं रहता तथा बुद्धि चलायमान
हो गई हो, ऐसे मनुष्यों के वात आदि दोष प्रकुपित होकर, हृदय को दूषित
करके (हृदय में पहुंचकर) मनोवह स्रोतों की गति को बन्द करके उन्माद
रोग उत्पन्न करते हैं ॥ ३ ॥

उन्मादं पुनर्मनो-बुद्धि-संज्ञा-ज्ञान-स्मृति-भक्ति-शील-चेष्टाचार-
विभ्रमं विद्यात् ॥ ४ ॥

उन्माद का लक्षण—मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, शील,
आहार, चेष्टा इनका विभ्रम अर्थात् विक्षिप्त होना 'उन्माद' कहाता है, इन
के विकार से उन्माद-रोग होता है १ ॥४॥

तस्येमानि पूर्वरूपाणि। तद्यथा—शिरसः शून्यभावश्चक्षुषोराकुलता,
स्वनः कर्णयोरुच्छ्वासस्याऽऽधिक्यमास्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषोऽरोचका-
विपाकौ हृदयग्रहो ध्यानायाससंमोहोद्वेगाश्चास्थाने सततं लोमहर्षो
ज्वरश्चाभीक्ष्णमुन्मत्तचित्तत्वमुदीर्तिवमर्दिताकृतिकरणं च व्याधेः स्वप्ने
च दर्शनमभीक्ष्णं भ्रान्तचलितावनवस्थितानां च रूपाणामप्रशस्तानां


१. मन चिन्तन का काम करता है, उस के विभ्रम से चिन्तन करने
योग्य बातों को नहीं सोचता और चिन्तन न करने योग्य बातों की चिन्ता
करता है। बुद्धि के विभ्रम से नित्य को अनित्य और प्रिय को अप्रिय देखने
लगता है। संज्ञा, ज्ञान इस के विभ्रम से अग्नि से जलने की प्रतीति नहीं होती।
स्मृति के विभ्रम से कुछ स्मरण नहीं होता या उल्टा स्मरण होता है। भक्ति
अर्थात् इच्छा, इस के विभ्रम से पहिले जहां इच्छा थी वहां अनिच्छा हो जाती
है। शील के विभ्रम से अति क्रोधी वा क्रोध के स्थान में भी
जाता है। आचार के विभ्रम से अपवित्र आचरण करता है।