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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ७ ] निदानस्थानम् ४८६

अ० ७ ] निदानस्थानम् ४८६
(५) आगन्तुक के लक्षण—आगन्तुक उन्माद के ये लक्षण होते हैं।
जैसे—उन्मत्त रोगी में अमानुष बल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, ग्रहण, धारण,
स्मरण, ज्ञान, वाणी और विज्ञान प्राप्त हो जाता है। उन्माद रोग का काल भी
अनिश्चित रहता है ॥ १५ ॥
उन्मादयिष्यतामपि खलु देवर्षि-पितृ-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-पिशाचानां
गुरुवृद्धानां वा एष्वन्तरेष्वभिगमनीयाः पुरुषा भवन्ति । तद्यथा—
पापस्य कर्मणः समारम्भे, पूर्वकृतस्य वा कर्मणः परिणामकाले, एकस्य
वा शून्यगृहवासे, चतुष्पथाधिष्ठाने वा, सन्ध्यावेलायां अप्रयतभावे वा,
पर्वसंधिषु वा मिथुनभावे, रजस्वलाभिगमने वा, विगुणे वाऽध्ययन-
बलि-मङ्गल-होम-प्रयोगे, नियम-व्रत-ब्रह्मचर्य-भङ्गे वा, देश-कुल-पुर-विनाशे
वा, महाग्रहोपगमने वा, स्त्रिया वा प्रजननकाले, विविधभूताशुभाशुचि-
स्पर्शने वा, वमन-विरेचन-रुधिर-स्रावाशूचेः, अप्रयतस्य वा चैत्यदेवा-
यतनाभिगमने वा, मांस-मधु-तिल-गुड-मद्योच्छिष्टे वा, दिग्वाससि वा,
निशि नगर-निगम-चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनाभिगमने वा, द्विज-गुरु-
सुरपूज्याभिधर्षणे वा धर्माख्यानव्यतिक्रमे वा, अन्यस्य कर्मणोऽप्रशस्त-
स्याऽऽरम्भे चेत्याघातकाला व्याख्याता भवन्ति ॥ १६ ॥
आघात काल—देव, ऋषि, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि
निम्नलिखित स्थान या समयों पर मनुष्यों में उन्माद उत्पन्न करते हैं। यथा—
पाप कर्म के प्रारम्भ करने के समय; पूर्वजन्मकूत पापकर्म के परिणाम समय पर;
निर्जन, एकान्त घर में अकेला होने पर; चौराहे पर खड़े रहने या बैठने पर;
सन्ध्या-समय में असावधान या अपवित्र रहने से; पूर्णिमा, अमावस्या में स्त्रीसंग
करने से; रजस्वला स्त्री के साथ संग करने से; अव्यवस्थित कार्य करने से;
अध्ययन, बलि, मंगल, होम इनको नियम से न करने पर; नियम, व्रत या ब्रह्मचर्य
के भंग करने पर; बड़े युद्ध के समय, देश, कुल या नगर के विनाश के समय;
बड़े भारी ग्रह के आ जाने पर; प्रसव के समय स्त्री पर; नाना प्रकार के अशुभ
पदार्थों के स्पर्श से; वमन, विरेचन, रक्तस्राव आदि अपवित्र काम करके अशुद्ध
शरीर से चैत्य ( गांव का तह-खेड़ा ), या देवमन्दिर आदि पवित्र स्थान में
जाने से; मांस, मधु, तिल, गुड़, मद्य या जूठन ( उच्छिष्ट ), खाकर; या नग्ना-
「 में, अथवा रात के समय ग्राम, नगर वा चौराहे या उपवन, श्मशान
घाने के समीप जाने से; ब्राह्मण, गुरु, सन्यासी, पूज्यपुरुषों को धमकाने
उल्लंघन करने से, इसी प्रकार के अन्य अपवित्र, पाप कर्म के

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आरम्भ करने से उन्माद रोग का आक्रमण होता है। इस प्रकार से आघात
काल का वर्णन कर दिया है ॥ १६ ॥
त्रिविधं तु खलून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति ।
तद्यथा—हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति । तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचा-
रविशेषलक्षणैर्विद्यात् । तत्र हिंसार्थमुन्माद्यमानोऽग्निं प्रविशत्यप्सु वा
निमज्जति, स्थलाच्छ्वभ्रे वा निपतति, शस्त्र-कशा-काष्ठ-लोष्ट-मुष्टिभिर्ह-
न्त्यात्मानमन्यच्च प्राणवधार्थमारभते किंचित्, तमसाध्यं विद्यात्,
साध्यौ पुनर्द्वावितरौ ॥ १७ ॥
उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन—उन्माद रोग को उत्पन्न करने वाले
भूतों के मनुष्यों को उन्मत्त बनाने में तीन प्रकार के प्रयोजन हैं । यथा—हिंसा,
रति और पूजा । इन कार्यों (प्रयोजनों) को उन्मत्त पुरुष के लक्षणों से
पहिचानना चाहिये । हिंसा के लिये उन्माद होने पर मनुष्य आग में घुसता है,
पानी में डूबता है, ऊंचे स्थान से गड्ढे में गिरता है, हथियार, काष्ठ, कशा,
(चाबुक), ढेला (पत्थर), मुक्कों आदि से अपने को मारता है, अथवा अन्य
इसी प्रकार के प्राणनाश करने वाले कार्यों को करता है। इसको असाध्य
जानना चाहिये । १बाकी के दोनों प्रकार के उन्माद साध्य हैं ॥ १७ ॥
तयोः साधनानि-मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नियम-
व्रत-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात-गमनादीनीति । एवमेते पञ्चो-
न्मादा व्याख्याता भवन्ति ॥ १८ ॥
ये उन्माद मन्त्र, औषधि, मार्ग, मंगल-पाठ, बलिदान, उपहार, हवन,
नियम, व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात आदि मंगल कृत्यों से
शान्त होते हैं । इस प्रकार से पांचों उन्मादों की व्याख्या करदी ॥ १८ ॥
ते तु खलु निजागन्तुविशेषेण साध्यासाध्यविशेषेण च प्रविभज्य-
मानाः पञ्च सन्तो द्वावेव भवतः । तौ परस्परमनुबध्नीतः । कदाचिद्य-
थोक्तहेतुसंसर्गादुभयोः संसृष्टमेव पूर्वरूपं भवति, संसृष्टञ्चैव लिङ्गमभि-
ज्ञेयम् । तत्रासाध्यसंयोगं साध्यासाध्यसंयोगं वाऽसाध्यं विद्यात् ।
१. रति प्रयोजन से आक्रान्त होने पर मनुष्य खेलता है, पूजा के लिये
पूजा करता है। देव आदि मनुष्य को आक्रान्त नहीं करते । जैसा कि सुश्रुतमें
कहा है—
"न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान क्वचिदाविशन्ति ।
ये त्वाविशन्ति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोहाः ॥"