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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 639 में से

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पृष्ठ 27

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६
वृद्धि और ह्रास का कारण है। सब कालों में शरीर के अन्दर दोनों ही धर्म रह
सकते हैं। इसलिये शरीरमें वृद्धि और क्षय शरीरका बनना (Metabolism) और
शरीर का टूटना ( Ketabolism ) दोनों क्रियायें हर समय होती रहती हैं।
एकत्व बतलाने वाला धर्म 'सामान्य' है। और 'पृथग्-भाव' बतलाने वाला
धर्म 'विशेष' है।¹ क्योंकि समान धर्म का होना यह सामान्य है, और इससे
विपरीत होना विशेष है ॥ ४४-४५ ॥
सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् ।
लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ४६ ॥
स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।
वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ ४७ ॥
(सत्त्व) मन, (आत्मा) चेतना और 'शरीर' इन तीनों से बने हुए को
"लोक"² कहते हैं। यह तीनों मिलकर तिकन्टी, या तिपाई की तरह 'लोक'
को धारण किये हुए हैं। इस संयोग से बने हुए पुरुष में जन्म-मरण आदि
१ समान गुण वाले—इसका अर्थ यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म, इनमें
सम्पूर्ण रूप मे समान गुण वाले पदार्थ ही ग्रहण करने चाहिये।
जिस प्रकार खट्टा आंवला भी खट्टे पित्त को नहीं बढ़ाता, अपितु शीतवीर्य
होने से पित्त का शमन करता है, क्योंकि पित्त उष्ण है।
द्रव्यसमान से विपरीत प्रभाव—तैजस क्षार से श्लेष्मा का क्षय
गुण ” ” ” ”—द्रव कांजी से श्लेष्मा का लघु-रूक्ष गुण के
कारण क्षय,
कर्म ” ” ” ”—नींद से वायु का नाश, भागने से कफ का
क्षय होना,
सामान्य और विशेष का स्वरूप—तुल्यार्थता अर्थात् समानार्थक होने का
नाम सामान्य और विपर्यय का अर्थ 'विशेष' है।
"सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम्" । वैशेषिक द० ॥
कहा भी है—
सर्वेषां सर्वदा वृद्धिः तुल्यद्रव्यगुणक्रियैः।
भावैर्भवति भावानां विपरीतेर्विपर्ययः ॥
२. "षड्धातुसमुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते ।"
तिकन्टी—में एक बल्ली या स्तम्भ के निकाल लेने से वह खड़ी नहीं रह
सकती, इसी प्रकार इन तीनोंमें से एकके न होनेसे 'पुरुष' स्थिर नहीं रह सकता।