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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार

( १० )
सप्तमोऽध्यायः
( पृ० ४६३–४७२ )
उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार
के उन्माद। उन्माद का लक्षण।
उन्माद के पूर्वरूप वातोन्माद के लक्षण।
पित्तजन्य उन्माद के लक्षण। सान्नि-
पातिक उन्माद। उन्माद की चिकित्सा।
आगन्तुज उन्माद। उन्माद का प्रारम्भ।
आगन्तुज के लक्षण। आघात काल।
उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन।
उन्माद के भेद। उपसंहार।
अष्टमोऽध्यायः
( पृ० ४७२–४८० )
अपस्मारनिदानम्—चार प्रकार
का अपस्मार। निदान और सम्प्राप्ति।
अपस्मार का लक्षण। अपस्मार के पूर्व-
रूप वातजन्य अपस्मार के लक्षण।
पित्तजन्य अपस्मार। कफजन्य अपस्मार।
सान्निपातिक अपस्मार। चिकित्सा सूत्र।
भिन्न २ रोगों की उत्पत्ति। साध्य और
असाध्य। रोग ज्ञान का फल। एक
रोग के कारण दूसरा रोग। शुद्ध प्रयोग
का लक्षण। कारण भेद। लक्षण भेद।
चिकित्सा विधान। सुखसाध्य और
कृच्छ्रसाध्य। साध्य और असाध्य।
उपसंहार। इति निदानस्थानम् ॥
विमानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
( पृ० ४८१–४६४ )
रसविमानम्—विमानस्थान का
प्रयोजन। छः रस तीन दोष। रसों के
प्रभाव। द्रव्य के प्रभाव। सात्म्य।
सात्म्य के भेद। प्रवर मध्यम और अवर।
आहार विधि उसके आठ अंग।
करण। संयोग। राशि। देश। काल।
उपयोग संस्था। उपयोक्ता। आहार
विधि। आहार के सद्गुणों का उपदेश।
उपसंहार।
द्वितीयोऽध्यायः
( पृ० ४६४–५०१ )
त्रिविधकुक्षीयं विमानम्—पेट
में तीन भाग। आहार की अमात्रा,
हीन मात्रा, अधिक मात्रा। उनके दोष
आहार की अति मात्रा से हानियां।
आमप्रदोष के दो प्रकार-विषूचिका और
अलसक। अलसक का स्वरूप। असाध्य
अलसक। साध्य अलसक की चिकित्सा।
विषूचिका का उपाय। आम प्रदोष में
औषध का प्रयोग। अपतर्पण का प्रयोग।
अन्न पाचन के सम्बन्ध में अग्निवेश का
प्रश्न और आत्रेय पुनर्वसु का उत्तर।
उपसंहार।
तृतीयोऽध्यायः
( पृ० ५०१–५१६ )
जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानम्—
जनपदनाशक रोग के प्रतीकार का उप-
देश। जनपदनाशक रोग के फैलने के
कारण प्रश्न और उत्तर। आरोग्यनाशक
वायु के लक्षण। रोगकारी जल के
लक्षण। नाशकारी रोगों के पूर्व, देश में
उपस्थित लक्षण। विपरीत ऋतु के
लक्षणों वाला काल। आयु-रक्षक उपाय।
वायु आदि में विगुणता उत्पन्न होने का

( ११ )
कारण, अधर्म। अधर्म की युगों के के प्रकोप के कारण। स्रोतों के दोष का
अनुसार उत्पत्ति और उसके दुष्परि- लक्षण। स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप।
णाम। आयु के समय और परिणाम उपसंहार।
विषयक अग्निवेश का प्रश्न तथा आत्रेय षष्ठोऽध्यायः (पृ० ५३०-५४१)
ऋषि का प्रतिवचन। दैव और पुरुषकार रोगानीकं विमानम्—प्रभाव
का लक्षण तीन प्रकार की आयु। आयु भेद से रोगों के प्रकार भेद। दश
का काल। अकाल-मरण पर विचार। प्रकार के रोग। दो मानस दोष रजस्
काल मृत्यु और अकाल मृत्यु पर विचार। और तमस्। इनके कुपित होने के तीन
ज्वर में उष्ण जल देने विषयक प्रश्न। कारण अनुबन्ध्य-अनुबन्ध भेद से रोगों
आत्रेय का उत्तर। ज्वर में उष्ण जल में भेद। बल के भेदों से शरीरस्थ अग्नि
के गुण। निदान से विपरीत चिकित्सा। के चार प्रकार। अग्नि भेद से मनुष्यों
अपतर्पण तीन प्रकार के उनके उपयोग के चार प्रकार वात, पित्त, कफ प्रकृति
के अवसर। त्याज्य रोगी। उपसंहार। के पुरुषों का विवेचन। आरोग्य प्रकृति।
चतुर्थोऽध्यायः सम प्रकृति। वातल, पित्तल और
(पृ० ५१६-५२४) श्लेष्मल तीन प्रकार के रोगी। वात,
त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयम्— पित्त और श्लेष्म प्रकृति के पुरुषों के
तीन प्रकार के रोग विशेषों का विज्ञान लक्षण इनके अनुकूल आहार विहार।
आप्तोपदेश, अनुमान और प्रत्यक्ष। उपसंहार।
आप्तोपदेश का निरूपण। प्रत्यक्ष और सप्तमोऽध्यायः
अनुमान के लक्षण। आप्तोपदेश से (पृ० ५४१-५५ )
क्या जानें। प्रत्यक्ष से क्या जानें। व्याधितरूपीयं विमानम्—
अनुमान से क्या जानें उपसंहार। व्याधि के ज्ञान में भ्रम। चार प्रकार
पञ्चमोऽध्यायः के कृमि। दो प्रकार का मल। उन में
(पृ० ५२४-५३१) उत्पन्न कृमि। उनका प्रभाव और
स्रोतोविमानम्—शरीर गत चिकित्सा। रक्तजन्य कृमि। पुरीषजन्य
अनेक धातुवाही स्रोतों का वर्णन। कृमि। उनका उपाय अपकर्ष विधि,
प्राणवह स्रोतों के दुष्ट होने पर लक्षण। प्रकृति विघात। कृमि-कोष्ठ के रोगी का
जलवह स्रोत अन्नवह स्रोत। रसवह उपचार। आस्थापन बस्तिक्रिया की विधि।
स्रोत। रक्तवह स्रोत। मांसवह स्रोत। विरेचन। अनुवासन। शिरो विरेचन।
मूत्रवह स्रोत। पुरीषवह स्रोत। स्वेद- कृमियों के प्रकृतिविघात की रीति।
वह स्रोत। स्रोतों के पर्याय। स्रोतों शिरोरोग पर चिकित्सा। उपसंहार।

( १२ )
अष्टमोऽध्यायः
( पृ० ५१५-६१८ )
रोगभिषग्जितीयम्—शास्त्रप-
रीक्षा। शास्त्र के गुण। आचार्य का
लक्षण। शास्त्र को दृढ़ करने के उपाय
शास्त्र के अध्ययन की विधि ! अध्या-
पन-विधि। गुरु शिष्य के परस्पर
कर्त्तव्य। दीक्षा। आचार्य का शिष्य
को उपदेश। संभाषा-विधि। तद्विद्य-
संभाषा। (संधाय) अनुलोम संभाषण
विगृह्य संभाषा। प्रतिवादी के तीन
प्रकार। तीन प्रकार की परिषद्।
प्रतिवादी को निग्रह करने के उपाय :
प्रतिलोम संभाषण का प्रकार। वाद
की मर्यादा। ४४ आवश्यकीय ज्ञातव्य-
वाद का लक्षण। जल्प वितण्डा।
प्रतिज्ञास्थापना, प्रतिष्ठापन, हेतु,
उत्तर, दृष्टान्त। सिद्धान्त ४ प्रकार के।
शब्द प्रत्यक्ष अनुमान ऐतिह्य औपम्य
संशय प्रयोजन सव्यभिचार। जिज्ञासा
व्यवसाय। अर्थप्राप्ति, अनुयोज्य।
अननुयोज्य अनुयोग प्रत्यनुयोग वाक्य-
दोष न्यून अधिक अनर्थक अपार्थक
विरुद्ध। वाक्यप्रशंसा। छल सामान्य-
छल वाक् छल अहेतु तीन प्रकार के
प्रकरणसम संशयसम वर्ण्यसम। अतीत
काल उपालम्भ परिहार। प्रतिज्ञाहानि
अभ्यनुज्ञा हेत्वन्तर अर्थान्तर। निग्रह-
स्थान। कारण करण कार्ययोनि-कार्य-
कार्यफल। अनुबन्ध, देश, काल, उपाय
प्रवृत्ति आदि के सम्बन्ध में विशेष
विज्ञान। इनकी परीक्षा। दश विध
परीक्षा। कारण-परीक्षा। करण-परीक्षा
कार्ययोनि-परीक्षा-कार्य-कार्यफल-परीक्षा।
अनुबन्ध-देश कार्य-देश आदि की व्या-
ख्या। आतुर परीक्षा। प्रकृति आदि
भाव। श्लेष्मप्रकृति। पित्तप्रकृति।
वातप्रकृति। समधातुप्रकृति। विकृतियों
से परीक्षा। सार से परीक्षा शरीर रचना
से परीक्षा। प्रमाण से परीक्षा। तीन
प्रकार के प्रमाण। सात्म्य से परीक्षा।
बल से परीक्षा। आहार से व्यायाम-
शक्ति से परीक्षा। वयस् से परीक्षा।
काल का विवेचन संवत्सर। रोगी की
दशा के अर्थ में काल की अपेक्षा से
काल, अकाल। प्रवृत्ति। उपाय। परीक्षा
का प्रयोजन। वमनोपयोगी द्रव्य।
विरेचन द्रव्य। रसों की अपेक्षा से
द्रव्यों का वर्गीकरण। मधुरस्कन्ध।
अम्लस्कन्ध। लवणस्कन्ध। कटुक-
स्कन्ध। तिक्तस्कन्ध। कषायस्कन्ध।
६ हों वर्गों के उपयोग में वैद्य का
कर्त्तव्य। अनुवासना द्रव्य शिरोविरेचन-
द्रव्य। उपसंहार। इति विमानस्थानम्॥