मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में
भूमिका । ५६
अर्थात् निर्गुणोपासन में असमर्थ सगुणोपासन करें, चित्त के
निश्चल होने पर वही निर्गुण (निरुपाधि-ब्रह्म) प्रकट होगा।
उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में
प्रधानतः अग्नि, इन्द्र और देवता; उनकी भक्ति अर्थात् लोक,
सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, कर्म; तथा भक्तिविशेष
(अवान्तर भेद) और उन्हींको संस्तावक देवता; तथा ८ वसु,
११ रुद्र, १२ आदित्य, १ इन्द्र और १ प्रजापति का यजन
व्यष्टिरूप से कहा है । वैसा इस उपासनाकाण्ड में भी प्रधानतः
विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य इन पांच देवताओं का
यजन कहा है । इन सब के अवान्तर भेद अपरिच्छिन्न
हैं। जैसे चतुर्दश विद्या-प्रस्थान, वा अष्टादश विद्या-प्रस्थान का
संक्षेप (बीज) प्रणव (ओ ३ म् ) है; अर्थात् वाङ्मयमात्र
का बीज प्रणव (अक्षर) है। वैसाही सब देवताओं का मूल
ईश्वर (अक्षर) है। अर्थात् देवतामात्र ईश्वर से अभिन्न है।
और देवताओं की विभूति के विषय में यह श्रुति है-
'त्रीणि शता त्रीणि सहस्रायग्निं
त्रिंशच्चदेवा नवं चासपर्यन् ।' य. ३३ । ७ ।
'त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्रीं च सहस्रेति' बृ. ।
१-४ 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष. ईश्वरः १ । २४' अविद्या
आदि क्लेश, शुभाशुभ कर्मों के फल और वासना से निर्लेप पुरुष विशेष (पुरुषो-
त्तम) ईश्वर है। 'तस्य वाचकः प्रणवः १ । २७' उस ईश्वर का वाचक (बोधक)
प्रणव है। अर्थात् ईश्वर वाच्य और प्रणव वाचक है। ये सब उपासना के विषय
योगदर्शन में स्पष्ट हैं । प्रणव की महिमा माण्डूक्य में कही है । प्रणव वह
'अक्षर' है जो शब्दतः भी ईश्वर से अलग नहीं है । व्याससूत्र में लिखा है
कि 'अक्षरमम्बरान्तधृतेः १ । ३ । १०' इससे अर्थावगति के अभाव में भी मन्त्र जप
से ईश्वर का प्रसन्न होना निर्विवाद है । उपास्य ईश्वर, उपासक (योगी) से
परमार्थ में पृथक् नहीं है। उपनिषद में कहा है कि 'तत् त्वम् असि' इत्यादि ।
६० मनुस्मृति ।
फिर बृहदारण्यक में 'महिमान एवैषां—' इस कथन से
एकही देवता के अनेक रूप बतलाये हैं। इसी वैदिक दर्शन
से भगवान् व्यास ने 'विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्ते-
र्दर्शनात् १।३।२७' यह विग्रहसूचक सूत्र बनाया और
पुराण इतिहासों में विष्णु, शिव, शक्ति आदि भिन्न भिन्न
विग्रह तथा एकही विष्णु आदि के अनेक विग्रह कहे गये हैं।
और महाभारत के प्रारम्भ में पुराण तथा इतिहास के
द्वारा वैदिक ज्ञान को बढ़ाने को कहा—
'इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ॥'
आजान सिद्ध देवताओं की महिमा का तो कहना ही क्या
है; पर कर्मसिद्ध योगियों की महिमा भी श्रुति स्मृति से
विलक्षण ज्ञात होती है—
'पृथ्व्यप्तेजोनिलखे समुत्थे
पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥'
श्वेता० २।१२.
'आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ ।
योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥
१ मन्त्रलिङ्गों से ज्ञात देवविग्रहादिकों का संग्राहक श्लोक—
'विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता ।
फलप्रदानमित्येतत् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥'
शारीरकव्याख्या.
भूमिका । ६१
प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ।
संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ '
शारीरकभाष्य.
समानतन्त्र-सांख्यदर्शन में भी लिखा है कि-
'योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ५।१२८'
औषध मन्त्रसिद्धि के समान योगसिद्धि भी निराकरण
करने योग्य नहीं है । यही दृष्टान्त न्यायदर्शन में वेद के
प्रामाण्य सिद्ध करने में दिया गया है । योगसिद्धि पातञ्जल-
दर्शन के विभूतिपाद में लिखी हैं, इन्हींके न जानने से भारत
के क्षुद्रहृदय ( अभागे ) पौराणिक वा ऐतिहासिक विषयों
को गप्प कहा करते हैं ।
दैवतभाषण । प्रणव आदि इष्टमन्त्र के यथाविधि जप
करने से इष्टदेवता के साथ संभापणादि व्यवहार की सिद्धि
होती है यह बात पातञ्जलदर्शन में लिखी है-
'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः २ । ४४ '
और 'भावं तु बादरायणोऽस्ति हि १।३।३३' इस
ब्रह्मसूत्र के भाष्य में भगवत्पाद ने भी कहा है-
'तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति
स्मर्यते । यस्तु ब्रूयाद् इदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवा-
दिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधयेत् । इदानी-
मिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात्, ततश्च
राजसूयादिचोदना उपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरे-
१ ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् २ । १ । ६७ '
६२ मनुस्मृति ।
ऽप्यव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मान् प्रतिजानीत, ततश्च
व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद् धर्मोत्कर्षवशा-
चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते ।' इति ।
अवतार। जब उक्त श्रुति स्मृति पुराण इतिहास से देवता
जडरूप भौतिकमात्र नहीं हैं; किंतु योगियों के समान ऐश्वर्य-
वान् चेतन हैं; एकही काल में नानाविधरूप धारण करने को
समर्थ हैं; जगत् के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप कर्मों के अनुसार
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र हैं; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ
नाम से विभक्त कर्मेन्द्रिय के अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु और
प्रजापति नाम से विख्यात अधिष्ठाता हैं; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसन और घ्राण नाम से विभक्त ज्ञानेन्द्रिय के दिक्, वात,
अर्क, वरुण और अश्वी नाम से प्रसिद्ध अधिष्ठाता हैं; मन,
बुद्धि, चित्त और अहंकार नाम से विभक्त अन्तःकरण के
चन्द्र, चतुर्मुख, शंकर और अच्युत नाम से प्रसिद्ध स्वामी हैं;
तथा वे पिण्डाण्ड में ब्रह्माण्ड के दैवत भावनानुसार नाना-
नामधारी हैं; और इस जगद् की सारी व्यवस्था (प्राकृतिक
नियम) एकस्वामिक के समान व्यवस्थित देखने में आती
है; न कि 'मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती' के
न्याय से जैसे अनेक अधिकारियों से एक अधिकार अव्यव-
स्थित होता है, वैसी जगत् की कोई व्यवस्था अव्यवस्थित
नज़र आती है; तब अगत्त्या गुणकर्मानुसारी नानाविध नाम-
रूप का उपसंहार करके जगत् का एकस्वामी 'परमेश्वर'
अङ्गीकार करना पड़ता है । ऐसी दशा में जगत् के कल्या-
णार्थ गुणकर्मानुसारी नामरूपधारी अवतार अङ्गीकार करने
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; यदि कहाजाय कि व्याप-
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भूमिका । ६३
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कता नहीं बनपड़ेगी, सो भ्रममात्र है; देखो-अग्नि विद्युद्रूप
से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता में क्या बाधा है ? कुछ
भी नहीं; वायु वात्यारूप से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; जगत् के बहुतेरे कार्य
सामान्यरूप से नहीं सिद्ध होसकते किंतु विशेषरूप से ही
सिद्ध होते हैं जैसे सामान्य अग्नि से पाक नहीं होसकता,
सामान्य वायु अग्नि को नहीं चमका सकता, सामान्य जल
पिपासा को नहीं शान्त करसकता .... .... इत्यादि ।
कितने एक अवतारों का लेख वेद में भी प्राप्त होता है ।
जैसे शतपथब्राह्मण के हविर्यज्ञ नामक प्रथमकाण्ड में
अग्निहोत्र वेदी के इतिहास प्रसङ्ग में ‘ वामनो ह विष्णुरास ’
इत्यादि से विष्णु के वामने बनने का उल्लेख, तथा संहिता
के सौमिक वेदी प्रतिपादक पञ्चमाध्याय के पन्द्रहवें मन्त्र से
विष्णु के त्रिविक्रमत्व का उल्लेख, तथा शतपथ के प्रथम
काण्डही में ‘ मनवे हवै प्रातः—’ इत्यादि श्रुति से मत्स्या-
वतार की कथा । एवं त्रिपुर आदि का इतिहास । बलराम
और कृष्णका अवतार निम्न लिखित श्रुतियोंसे स्पष्ट होताहै-
‘ जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः
प्रापश्यद् वीरो अभिपौंस्यं रणम् ।
अवश्चिदद्रिमत्र सस्यदः सृज-
दस्तभ्नान्नकं स्वपस्यया पृथुम् ॥ ’
१ सामान्यशब्द का अर्थ कार्यानुसार व्यवस्थित स्वीकार किया गया है ।
२ विस्तार भय से श्रुतियां छोड़ दी हैं । इसी बहाने जिज्ञासु लोग उनकी
देखभाल करें ।
६४ मनुस्मृति ।
जिसने (जज्ञान एव) प्रकट होतेही (स्पृधः) स्पर्धा
करनेवाले पूतनादि शत्रुओं को (व्यबाधत) बाधित किया।
(अद्रिं) गोवर्धन पर्वत को (अवशिश्चद्) धारण किया।
(सस्यदः) धान्य देनेवाले वर्षते मेघों को (अवसृजत्)
विसर्जित किया। (स्वपस्यया) अपनी माया से (पृथुं)
महान् (नाकं) इन्द्र को (अस्तभ्नात्) स्तम्भित किया।
(वीरः) महावीर होकर भी (अभिपौंस्यं) पौरुषसाध्य
(रणं) भारत युद्ध को निरस्त्र (प्रापश्यत्) देखा।
‘द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे
अन्यान्या वत्समुपधापयेते ।
हरिरन्यस्यां भवति स्वधावा-
ञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः ॥’
(अन्यान्या) अलग अलग (स्वर्थे) कार्य में तत्पर
(विरूपे) निराली छविवाले (द्वे) वे दो बालक (चरतः)
विचर रहे हैं। (वत्सं) बछरों को (उपधापयेते) समीप में
दूध पिलावरहे हैं। उनमें (अन्यस्यां) एक (स्वधावान्)
अखण्डैश्वर्य (हरिः) श्यामवर्ण (भवति) है, (अन्यस्यां)
दूसरा (सुवर्चाः) तेजस्वी (शुक्रः) गौरवर्ण (ददृशे)
दिखलाई देता है।
‘पूर्वापरं चरतो माययैतौ
शिशू क्रीडन्तौ परियातो अध्वरम्।
विश्वान्यन्यो भुवनानि चष्ट
ऋतून्यन्यो विदधज्जायते पुनः ॥’
तैत्तिरीयश्रुति.
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भूमिका । ६५
[Main Text]
(एतौ) ये दोनों राम-कृष्ण (पूर्वापरं) आगे पीछे
(चरतः) विचरते हुए (मायया) माया से (शिशू) बाल-
रूप (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते करते (अध्वरं) कंस के धनु-
र्यज्ञ को (परियातः) जा पहुँचे। इनमें (अन्यः) एक कृष्ण
योगेश्वर होने से (विश्वानि-भुवनानि) सारे ब्रह्माण्ड को
(वि-चष्टे) जानता है। (अन्यः-पुनः) दूसरा राम (ऋतून्-
दधत्) समयानुसार (जायते) अवतीर्ण हुआ। अर्थात्
बलराम ने कृष्ण के समान 'तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं-'
इत्यादि अद्भुतरूप से नहीं अवतार का ग्रहण किया।
नाम-रूप-लिङ्ग। परमेश्वर के नाम-रूप-लिङ्ग का दिग्द-
र्शन किया जाता है जिसके जानने से साकारोपासना तथा
निराकारोपासना की दृढ़ता होती है। पहले अवतारों की सिद्धि
होचुकी है वे श्रीमद्भागवतानुसार ये हैं—
पहिला अवतार हिरण्यगर्भादि पदवाच्य, दूसरा वराह
(रसातल में गई पृथ्वी के उद्धर्ता) तीसरा नारद (देवर्षि
भाव को प्राप्त होकर सात्वततन्त्र अर्थात् पञ्चरात्रनामक वैष्ण-
[Footnotes]
१ 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं
द्यामुतेमाम्' इति ऋक्श्रुति । 'स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदि-
कर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्त्तत ॥' इति स्मृतिः । 'जगृहे पौरुषं रूपं-' इत्यादि
भागवत ।
६६ मनुस्मृति ।
वागप के कर्ता ) चौथा नर-नारायण ( धर्मपत्नी से उत्पन्न
होकर दुश्चर तप करनेवाले ) पांचवां कपिल ( कालवशसुप्त-
सांख्य को आसुरिनाम ब्राह्मण को बतलानेवाले ) छठां
दत्तात्रेय ( अत्रि से अनसूया में जन्म लेकर प्रह्लाद आदि को
अध्यात्म-विद्या पढ़ानेवाले ) सातवां यज्ञ ( रुचि से आकूति में
पैदा होकर अपने यामादिक पुत्रों के साथ स्वायंभुव मन्वन्तर
के पालक ) आठवां ऋषभ ( नाभि से मेरुदेवी में उत्पन्न-
अत्याश्रमी ) नवां पृथु ( पृथ्वी को दुहनेवाले ) दशवां मत्स्य
( मनु के रक्षक ) ग्यारहवां कूर्म ( समुद्र-मथन के समय मन्दराद्रि
को अपने पीठ पर धारण करनेवाले ) बारहवां धन्वन्तरि
( आयुर्वेदके प्रकाशक ) तेरहवां मोहिनी ( स्त्रीरूप से असुरों
को मोहित करके सुरों को अमृत पिलानेवाले ) चौदहवां नृसिंह
( हिरण्यकशिपु के नाशकर्ता ) पन्द्रहवां वामन ( बलिको बांध-
नेवाले ) सोलहवां परशुराम ( इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार
करनेवाले ) सत्रहवां व्यास ( पराशर से सत्यवती में जन्म
लेकर वेदों के विभाग करनेवाले ) अठारहवां राम ( दशरथ
के पुत्र बन कर रावण के विध्वंसक ) उन्नीसवां राम-कृष्ण
( यदुकुल में प्रकट होकर भूभार के हर्ता ) बीसवां बुद्ध ( अजन
के पुत्र देवद्वेषियों के मोहक ) इक्कीसवां कल्कि का अवतार
( विष्णुयशा के पुत्र चौरप्राय राजाओं के विनाशक ) ।
१-३ कहीं राम, तथा कृष्ण की अलग २ अवतार संख्या दी है; नर और
नारायण की एकही संख्या दी है; बुद्ध के पितृनाम में 'जिन' यह पाठान्तर
श्रीधरी टीका से प्राप्त होता है ।
४ ' अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः ' इससे अवतारों की असंख्ये-
यता, तथा ' एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । मायागुणैर्विरचितं महदादिभि-
रात्मनि ॥ ' इससे रूपाभ्यास, तथा ' यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।
एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ' यह दृष्टान्त दिया है । देखो श्रीधरी ।