कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
कबीर सागर कबीरपन्थ, विशेषकर धर्मदासी शाखा, का विशाल धार्मिक ग्रन्थ-समूह है, जो मुख्यतः कबीर साहब और उनके शिष्य धर्मदास के संवाद के रूप में है। इसमें अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ, जैसे ज्ञान सागर, अनुराग सागर और बोध सागर के विभिन्न बोध, ग्यारह भागों में संकलित हैं। यह कबीरपन्थ के सृष्टि-विचार, गुरु-परम्परा और साधना का मुख्य स्रोत है।
पहले भाग ज्ञान सागर के प्रकरणों से इसकी विषय-वस्तु का अनुमान होता है: मुक्ति-भेद और अमरलोक, सत्य पुरुष का वर्णन, सृष्टि की उत्पत्ति, द्वीपों का वर्णन, धर्मराय (निरञ्जन) का सत्य पुरुष की सेवा से द्वीप और मानसरोवर पाना, कामिनी को निगलना और शाप पाना, चौदह यमों के नाम और कर्म, ज्ञानी जी (कबीर) का पृथ्वी पर आना और धर्मराय से वचन लेना, जगन्नाथ की स्थापना का प्रसंग, तीन देवों और आदि माया की कथा, समुद्र-मन्थन, वेदों और चार खानियों की उत्पत्ति, और फिर बलि, सनक-सनन्दन तथा नारद के चरित्र।
यह सम्पूर्ण ग्यारह भागों का संस्करण खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई ने प्रकाशित किया है। २१३६ पृष्ठों में पूरा कबीर सागर एक साथ उपलब्ध होने से यह कबीरपन्थ के अध्येताओं के लिए एक सम्पूर्ण सन्दर्भ है।
बोधसागर
(५७)
जम्बूद्वीप कलिके कडिहारा । धर्मनि बाहु जीव होयँ पारा ॥
धर्मनि बाँह जिय पहुँचे आयी । देहु दान जेहि आरति लायी ॥
शब्द मानि पुनि मस्तक नाया । पुरुष दरशकै बात जनाया ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु चिन्तागण करु मोरा । पुरुष दरश देउ करो निहोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह हठ का करहु । मानहुँ शब्द शीश पर धरहु ॥
हमरे गहे पुरुष पहुँ जैहा । विना गहे उहाँ जान न पैहा ॥
हमसों पुरुष सो ऐसी अहई । जल तरंग जल अन्तर रहई ॥
जिमिरवि और वि तेजप्रकाशा । तिमिमाहि पुरुष अन्तर धर्मदासा ॥
हमरी सुरति गहौ चितलायी । तबहीं पुरुष पद दर्शन पायी ॥
शिष्य हृदय प्रतीति अस आनै । गुरु औ पुरुष भिन्न नहि जानै ॥
जौ लौ चित अस रीति न आवै । तौ लौ जिवनहि लोकसिधावै ॥
धर्मदास चित बहुत सकाने । चरण टेकि बहु विनती ठाने ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु सत्य कहौ तोहि पाहीं । तुम्हते कछु दुचितार्ई नाहीं ॥
मोरे तुमहि पुरुष हौ स्वामी । यमते छोड़ावहु अन्तर्यामी ॥
हो प्रभु बरणेउँ लोककी शोभा । ताते आहि मारममलोभा ॥
तव लीला बहुतै हम देखा । पुरुष दरशविनु रहै हिय रेखा ॥
जौ किंकर पर होहु दयाला । तौ छिन महाँहायगत उरसाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जौ ऐसो चित कीन्हा । तनुतजि चलौ लोकप्रवीना ॥
राखेउ तन गौने लै हंसा । तहँ पहुँचे जहँ कालै संसा ॥
लवन एक महाँ पहुँचे जाई । अविगति लीला लखै को भाई ॥
शोभालोक देखि सुख माना । उदित असंख्य शशिऔ भाना ॥
(५८)
ज्ञानप्रकाश
जितदेखिये जगमगझलकाहीं । देखत छकित भये हियमाहीं ॥
द्वारपाल हंस जो रहिया । ता महाँ एकहंसहिँ असकहिया ॥
एहि संसहिँ तुम्हजाहु लिवाई । पुरुष दरश दे आनहुँ भाई ॥
चले लिवाय पुरुष पहुँ जबहीं । झझकि हंस बहु आये तबहीं ॥
करत कोलाहल मंगल चारा । शोभा अद्भुत अंग अपारा ॥
हंसन शोभा कहाँ बताऊँ । कछुक प्रभाव सो वरणि सुनाऊँ ॥
रतनमाल ग्रिव शोभित हंसा । और मणिमाल किमिकरौँ प्रशंसा ॥
जगमग देह हंसन करहीं । अमर चीर बहु शोभा धरहीं ॥
उडुराख चिकुर शोभा छबि आछे । रविका करतार रोम छबिकाछे ॥
हंसन्हभाल शोभा किमि कहऊँ । षोडस चन्द्रभाल छबि लहऊँ ॥
हंस कान्ति प्रतिरोम प्रकाशा । हीरामणी उदित रोमासा ॥
कोटिकविधु हंसन छबिमोहा । देह प्राण शोभा अमी गिरोहा ॥
षोडश रवि हंसन छबि मोहा । देह प्राण शुभ अमृत सोहा ॥
कञ्चन कलश जडित मणि लोना । रतन थार आरतिमहि सोना ॥
हंस मगन शब्द मुख उचारा । कीडाविनोद रतन मणियारा ॥
सुरति हंस कहँ आगे लीन्हा । नृत करत चले हंस प्रवीणा ॥
सुरति हंस अप्रानि अघाने । पुरुष सकल देखत हरषाने ॥
सिंघासन छबि देखत मनमोहा । अद्भुत अमित कलातन सोहा ॥
पुरुष राम एक कला अनन्ता । वरणत कोउ न पावै अन्ता ॥
एक रोम रवि शशि कोटीशा । नखकोटिन्ह विधुमलिन रवीशा ॥
पुरुष प्रकाश सतलोक अँजोरा । तहाँ न पहुँच निरञ्जन चोरा ॥
पुरुष कबीर देखा एक भाई । धर्मदास पुनि रहे लजाई ॥
पुरुष दरश करि आयेउ तहँवा । प्रथम कबीर बैठे रहै जहँवा ॥
इहाँ कबीर बैठे पुनि देखा । कला पुरुष तन अचरजपेखा ॥
का अजगुत कीन्हैके भाई । उहाँ मोहिँ प्रतीति न आई ॥
बोधसागर
(५९)
कवीर पुरुष यक उहाँ छिपाये । सत्य पुरुष जग दास कहाये ॥
धाये चरण गहु अति सकुचायी । हे प्रभु हम परिचै अब पायी ॥
यह शोभा कस उहाँ छिपावा । कस नहिं जगमहँ प्रगट दिखावा ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जोवहि छवि जग जाऊ । तो होय विकल निरअन राऊ ॥
सब जीव तब मोहि लौलावे । उजरे भौ सब लोकहि आवै ॥
ताते गुप्त राखो जग भाऊ । शब्द सँदेश जीवन समुझाऊ ॥
शब्दपरखि चीन्हैं माहिं कोई । गहि प्रतीति घर पहुँचे सोई ॥
कहै कवीर सुनहुँ सुकृति हंसा । दरश पुरुष मिटेहु चित मंसा ॥
अब तुम्ह वेगि चला संसारा । जिवहि चेतावहु करहु पुकारा ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब अब उहाँ न जाही । यह सुख घरतजि कहाँ झुराही ॥
वहि यम देश अपरबल काला । नहिं जानौधौ मति होयवेहाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तोहि चिन्ता नाहीं । तुमरे सङ्ग हम सदा रहाहीं ॥
तुम देखो सत्य लोक प्रभाऊ । हंसन कहो संदेश सुनाऊ ॥
धर्मदास वचन
मानेउँ शब्द शीश पर राखा । लैचलु अंश सुकृत तब भाषा ॥
छिन एक महँ जगहीं चलि आये । पैठि देह धर्मनि अकुलाये ॥
परेउ चरण गहि साहब केरा । करि बिनती पदगहि सुख हेरा ॥
छन्द-धन्य साहेब सतगुरु तुम सत्य पुरुष अनादि हो ॥
तुव अमितलीला कोलखै प्रभु सकल लोकके तुम आदिहो ॥
त्रिदेव मुनि सनकादि नारद कोईना लखि तुम पावई ॥
तेहि हंस भाग सराहिये जो नाम तुव लौ लावई ॥
(६०)
ज्ञानप्रकाश
दोहा-निर्गुण सर्गुण आदिहौं, अविगति अगम अथाह ॥
गुप्त भये जग महाँ फिरो, को तुव पावै थाह ॥
सोरठा-मोहि परचै तुम दीन्ह, ताते चीन्हैउँ तोहि प्रभु ॥
भये चरण लौलीन, दुचितार्ई सकलो गयी ॥
चौपाई
कीट ते भुंङ्ग मोहि प्रभुकीन्ह। निश्चलरंग आपनो दीन्ह। ॥
जिमिनिलते जग होय फुलेला। तिमिमोहिं भयोसमर्थपदमेला॥
पारस परसि लोहा जिमिहेमा। तिमि मोहिं भयउनाथव्रतनेमा॥
अगर परसि जिमिभयोसुवासा। जल प्रसंग बसन मल नासा ॥
सनपट शुद्ध सूत कहै न कोई। प्रभुगुण लखित शिरनावैलोई ॥
हे प्रभु तिमिमाहिं भयउ अनंदा। जिमिचकोरहरहितलखिचंदा ॥
जनम मरण भौ संशय नाशी। तवपद सुखनिधान सुखराशी ॥
हे प्रभु अस शिख दीजै मोहीं। एकौ पल न विसारौं तोहीं ॥
सतगुरु वचन
जस मनसा तस आगे आवै। कहै कवीर ईजा नहिं पावै ॥
धर्मनि गुरुहिं दोष देह प्रानी। आपु करहिंनर आपनहानी ॥
जो गुरु वचन कहै चित लाई। ब्यापै नाहिं ताहि दुचितार्ई ॥
जो गुरुचरन शिष्य संयोग। उपजै ज्ञान न नासै भ्रम रोगा ॥
जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं ॥
सतगुरु साहु सन्त सौदागर। सजीशब्द गुरुयोगा बहुनागर ॥
जो गुरु शब्द कहै विश्वासा। गुरु पूरा पुरवहिं आसा ॥
विनु विश्वास पावै दुखचैला। गहै न निश्चय हृदय गुरुमेला ॥
सुत नारी तन मन धन जाई। तन जोरहै न प्रीति टढाई ॥
शूरा हंस सोई कहलावै। अग्नि रहै तो शोक न लावै ॥
जो विचलै तौ यम धरि खायी। अड़ा रहै तौ निज घर जायी ॥
हंसरहनीवर्णन
बोधसागर
(६१)
काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥
सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥
धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥
बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥
बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥
रहनी वर्णन
अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥
दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥
धर्मदास वचन
हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥
हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥
ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥
सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥
सत्गुरु वचन
मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥
तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥
आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥
तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥
कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥
मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥
कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥
सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥
सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥
सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥
को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥
(६२)
ज्ञानप्रकाश
सोइ हम सोइ तुम सोइ अनन्ता । कहैं कबीर गुरु पारस सन्ता ॥
सन्त चेतु चित सतगुरु ध्याना । कहैं कबीर सद्गुरु परमाना ॥
सतगुरु शब्द ज्ञान गुरु पुंजा । कहैं कबीर लखु मोहनकुंजा ॥
कुंज मोहि मोहन ठहरावै । कहैं कबीर सोइ सन्त कहावै ॥
सन्त कहाय जो सोधै आपू । कहैं कबीर तेहि पुण्य न पापू ॥
पुण्य पाप नहि मान गुमाना । कहैं कबीर सो लोक समाना ॥
जिन्दा सुरदा चीन्है जीवा । कहैं कबीर सतगुरु निज पीवा ॥
सुरदा जग जिन्दा सतनामा । कहैं कबीर सतगुरु निज धामा ॥
यक जग जीतै यक जग हारै । कहैं कबीर गुरु काज सवैरै ॥
धर्मदास बचन
कौन जग जीतै कौन जग हारै । कहौ कौन विधि काज सवैरै ॥
सतगुरु बचन
इन्द्रिन जीते साधुन सो हारै । कहैं कबीर सतगुरु निस्तारै ॥
सतगुरु सो सत्यनाम लखावै । सतपुर लै हंसन पहुँचावै ॥
सत्यनाम सतगुरु तत भाखा । शब्द ग्रन्थ कथि गुप्तहि राखा ॥
सत्य शब्द गुरु गम पहिचाना । विनु जिभ्या करु अमृत पाना ॥
सत्य सुरति अम्मर सुख चीरा । अमी अंकका साजहु वीरा ॥
सोहं ओहं जावन वीरु । धर्मदास सो कहै कबीरु ॥
धरिहौ गोय कहिहौ जिन काहीं । नाद सुशील लखैहो ताहीं ॥
प्रथमहि नाद विन्द तब कीन्हा । मुक्ति पन्थ सो नाद गहि चीन्हा ॥
नाद सो शब्द पुरुष मुख बानी । गुरुमुख शब्द सो नाद बखानी ॥
पुरुष नाद सुत षोडश अहई । नाद पुत्र शिष्य शब्द जो लहई ॥
शब्द प्रतीति गहै जो हंसा । शब्द चालु जेहिसे मम बंशा ॥
शब्द चाल नाद दृढ़ गहई । यम शिर पगु देइ सो निस्तरई ॥
सुमिरण दया सेवा चित धरई । सत्यनाम गहि हंसा तरई ॥
पठित मूर्खका वर्णन
बोधसागर
(६३)
बिन्दो होय शब्द मम धावैँ । नाहबिन्दु दोउ मोहिँ पहुँ आवैँ ॥
नाद सखा जेहि अहँविगुरचे । अहँ रहित सो निज घर पहुँचे ॥
केते पढ़ि गुणि नर्कीहि जैहै । केते पढ़ि गणि लोक सिधैहै ॥
धर्मदास बचन
हो सद्गुरु मैं तुम्हारो दासा । विनती करौँ खसम तुव पासा ॥
पढ़े गुणै दुइदिशि किमिजाहीं । सो चरित्र वरणों मोहिँ पाहीं ॥
सतगुरु बचन
सुनु धर्मनि बहु पढ़ि अरथावै । शब्द कहै सो चालु न पावै ॥
पढ़ि गुणि नीति विचारे नाही । अस पढुआ सुनु नरकहिँ जाही ॥
जिन्ह पढ़िशब्दचाल गहिभाई । सुनु धर्मनि सो लोकहि जाई ॥
छन्द-जो कथत बकतौ तरे जग तो जग सबै तरि जायहो ॥
तजि तरुत सुलतान उबैर नृप कयों बनजाय हो ॥
तातै कहूँ निज समुझ पापी शब्द पढ़ि सतपद गहै ॥
जो सत्य पद निरखत चलै तो नहिँ फेरि जो नीवहै ॥
दोहा-सत्यनाम सुमिरण करै, सतगुरुपद निज ध्यान ॥
आतम पूजा जीव दया, लहै सो मुक्ति अमान ॥
सोरठा-सदगुरु कहै पुकारी, चाल चलै पथ निरखिके ॥
इंस होय भव पारि, शब्द गहन सदगुरु कृपा ॥
चोपाई
गुप्त भयो कहि शब्द प्रमाना । कालिंजर पुनि आय तुलाना ॥
कहैं कालिंजर विनै बडाई । देहु पान मोहिँ अहो गुसाई ॥
धर्मदास कहै देउँ परवाना । साहिब मोहि कह्यो सहिदाना ॥
कह कालिंजर सुनहुँ गोसाई । का सहिदान आहि तुव ठाई ॥
तब सहिदान कहा सुख बासा । सतगुरु बोल कीन्ह परगासा ॥
समय संयोग बोल सो कहेऊ । सुनि भौमौन मुगुध होई रहेऊ ॥
जात कमीना सुनत परायी । केहि कारण आरती लायी ॥
साधन वर्णन
(६४)
ज्ञानप्रकाश
औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥
तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥
धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥
बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥
धर्मदास वचन
प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥
मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥
तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥
वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥
धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥
अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥
दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥
अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ
किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥
जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥
संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥
चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥
यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥
चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥
कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥
सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥
धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥
अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥
समाप्ति
बोधसागर
(६५)
पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥
नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥
पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥
चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥
साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥
श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥
सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥
नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥
सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥
रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥
सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥
निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥
इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥
सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥
पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥
सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥
छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥
यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥
सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥
तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥
दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥
दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥
सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥
कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥
इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥
इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥
नं. ४ कबीरसागर - ३
इति श्रीधर्मदासबोध
ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित
श्री-अमरसिंह बोध
A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
बम्बई
श्रीमद्भगवद्गीता
संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः
सप्तमः अध्यायः
श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता
१९९९
सत्य कबीराय नमः
बोधसागर
द्वितीयस्तत्रंगः
अमरसिंहबोध
★
धर्मदास वचन-बीपाई
धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥
जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥
युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥
यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥
सतगुर वचन
धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥
जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥
युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥
अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥
रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥
भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥
पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥
सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥
बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥
सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥
ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ
(७०)
अमरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥
पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥
साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥
कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥
चौपाई
कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥
इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥
पुरुष वचन
अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥
सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥
साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥
सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥
चौपाई
पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥
मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥
ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥
देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥
ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥
चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥
आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥
राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥
ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥
हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥
राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥
कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन
बोधसागर
(७१)
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥
पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥
कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥
ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥
धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥
तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥
अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥
तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥
षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥
अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥
देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥
आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥
अमरसिंह वचन
अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥
कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥
और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥
सतगुरु वचन
साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥
कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥
चौपाई
यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥
बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥
सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥
पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना
(७२)
अमरसिंह बोध
छन्द चर्चरी
मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥
हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥
हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥
कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥
सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥
नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥
चौपाई
दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥
सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥
ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥
सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥
तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥
हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥
सतगुरु वचन
ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥
सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥
नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥
जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥
धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥
साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥
हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥
अमरसिंह वचन-चौपाई
हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥
अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥
रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना
बोधसागर
(७३)
सतगुरु वचन
सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥
तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥
सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥
सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥
साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥
साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥
रानी वचन-चौपाई
रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥
केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥
राजा वचन
रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥
एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥
तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥
दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥
पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥
प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥
बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥
भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥
सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥
ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥
दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥
रानी वचन
राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥
अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥
(७४)
अमरसिंह बोध
राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥
राजा वचन
रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥
धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥
तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥
हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥
सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥
सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥
तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥
रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥
गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥
आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥
तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥
रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥
साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥
सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥
चौपाई
लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥
राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥
दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥
साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥
तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥
झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥
राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥
चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥
बोधसागर
(७५)
चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥
जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥
धर्मदास वचन
और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥
सतगुरु वचन
तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥
अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥
रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥
अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥
नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥
तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥
पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥
हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥
या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥
साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥
सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥
चौपाई
श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥
पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥
जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥
देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥
कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥
तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥
१ इरे !
(७६)
अमरसिंह बोध
पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥
तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥
लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥
देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥
डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥
धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥
आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥
हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥
यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥
तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥
यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥
गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥
सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥
भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥
चोपाई
तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥
अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥
साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥
लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥
इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥
अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥
राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥
तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥
१ चित्रगुप्त ।