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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 513

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

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धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥
जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥
युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥
यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥
जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥
युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥
अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥
रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥
भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥
पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥
सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥
बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥
सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥
ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥