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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 520

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥
तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥
लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥
देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥
डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥
धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥
आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥
हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥
यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥
तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥
यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥
गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥
सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥
भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥
अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥
साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥
लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥
इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥
अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥
राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥
तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।