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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 519

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥
जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥
अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥
रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥
अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥
नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥
तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥
पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥
हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥
या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥
साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥
सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥
पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥
जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥
देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥
कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥
तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !