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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 505

बोधसागर

(६१)

काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥
सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥
धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥
बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥
बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥

रहनी वर्णन

अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥
दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥
हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥
ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥
सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥

सत्गुरु वचन

मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥
तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥
आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥
तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥
कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥
मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥
कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥
सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥
सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥
सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥
को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥