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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 509

बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥
नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥
पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥
चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥
साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥
श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥
सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥
नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥
सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥
रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥
सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥
निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥
इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥
सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥
पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥
सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥
छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥
यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥
सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥
तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥
दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥
दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥
सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥
कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥
इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३