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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सत्यनामकी महिमा

बोधसागर

(२३)

धर्मदास वचन

जोरि पानि मैं पूछौं स्वामी । कहो कृपा करि अन्तर्यामी ॥
अहो साहेब नाम क आही । परचै नाम कहो मोहिं पाहीं ॥
अरु सतगुरु तुमका कहैं कहहुँ । हे प्रभु कौन देश तुम रहहु ॥

जिन्दा वचन

हो धर्मनि जो पूछेहु मोहीं । सुनहुँ सुरति धरि कहों मैं तोहीं ॥
जिन्दा नाम अहैं सुनु मोरा । जिन्दा भेष खोज किहैं तोरा ॥
हम सतगुरु कर सेवक आहीं । सतगुरु संग हम सदा रहाहीं ॥
सत्य पुरुष वह सत्यगुरु आहीं । सत्य लोक वह सदा रहाहीं ॥
सकल जीवके रक्षक सोई । सतगुरु भक्ति काज जिव होई ॥
सतगुरु सत्यकवीर सो आहीं । गुप्त प्रगट कोइ चीन्है नाहीं ॥
सतगुरु आ जगत तन धारी । दासातन धरि शब्द पुकारी ॥
काशी रहहिं परखि हम पावा । सत्यनाम उन मोहिं दढावा ॥
जम राजा कर सब छल चीन्हा । निरखि परखिभै यम सो भीना ॥
तीन लोक जो काल सितावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥
निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥
तिन्ह कर सुत आहि त्रिदेवा । सब जग करै जो उनकी सेवा ॥
त्रिगुण जाल यह जग फन्दाना । गहै न अविचल पुरुष पुराना ॥
जाकर ई जग भक्ति कराई । अन्तकाल जिव सो धरि खाई ॥
सबै जीव सतपुरुषके आहीं । यम दै धोख फन्दाइस ताहीं ॥
प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहैं लाई ॥
दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँधारा ॥
जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥
जिव जानै यह धनी हमारा । दे विश्वास पुनि धरै अवतारा ॥
प्रभुता देखि कीन्ह विश्वासा । अन्तकाल पुनि करै निरासा ॥

(२४)

ज्ञानप्रकाश

कालै भेष दयाल बनावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥
द्वापर देखहु कृष्णकी रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनिती ॥
अर्जुन कहै तिन्ह दया हठावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥
गीता पाठकै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥
बन्धु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहै बहु काल सतावा ॥
भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥
बहु गंजन जीवन कहै कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
पतिव्रता वृन्दा व्रत टारा । ताके पाप पहन औतारा ॥
बलिते सो छल कीन्ह बहुता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥
छल बुद्धि दीन्है ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला ॥
लघु सुरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवीलीन्ह पुनि स्वस्तिकराये ॥
स्वस्तिकराइ तबै प्रगटना । दीर्घरूप देखि बलि भय माना ॥
तीनि परग तीनो पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥
देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥
तेहि कारण पतालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगटन चीन्हा ॥
तब ले पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥
यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्त हरि हमको कीन्हा ॥
जाकर वचन थिर होवे नाहीं । औ पुनि जीव दया नहिं ताहीं ॥
तासो कहहु लाभ किमि होई । तेहि सेवै सो जाय विगोई ॥
औ हरिचन्द्र केर कस लेखा । धर्मदास चित करो विवेखा ॥
यती सती त्यागी भयऊ । सब कहै काल विगुरुचन लयऊ ॥
काहूकै व्रत हट नहिं राखा । ताकहै मुक्तिदाता जग भाखा ॥
स्वर्गहिं धोखा नरकहिं जाहीं । जीव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥
पण्डो सम जग को व्रतधारी । नरक बास ताकहै ले डारी ॥
करण मोरध्वज सत्यव्रत धारी । ले कसनी ताहि दीन्ह विडारी ॥
भक्त अनेक जगत महीं भयेऊ । काहू कहै वैकुण्ठ न दयऊ ॥

बोधसागर

(२५)

नरक वास नहिं छूटै भाई । महा नरक भग जठर कहाई ॥
नरकते विष्णु छुटे नहिं पाये । जनम जनम जठरै भग आये ॥
जग अंधा हिय गम्य न कीन्हा । सबै आस ताही कर लीन्हा ॥
जिव अचेत हिय गम्य न करई । सबै आस वैकुण्ठहिं धरई ॥
विष्णु सरीखे को जग आही । बहु भगता किमि वरणो ताही ॥
तिन्ह वैकुण्ठ वास नहिं पाया । कर्महिं वसि पुनि नर्क भोगाया ॥
सो वैकुंठ चाहत नर प्रानी । यह यम छल विरले पहिचानी ॥
जस जो कर्म करै संसारा । तस भुगतै चौरासी धारा ॥
मानुष जन्म बडे तप होई । सो मानुष तन जात विगोई ॥
नाम विना नहिं छूटे कालू । बार बार यम नर्कहिं घालू ॥
नरक निवारण नाम जो आही । सुर नर मुनि लखन कोइ नाहीं ॥
ताते यम फिर फिर भटकावै । नाना जोइनि काल सतावै ॥
विरलै सार शब्द पहिचाने । सतगुरु मिलै सतनाम समाने ॥
छंद-सुनु धर्मदास सुजाना शब्द प्रमान सतगुरु जानहुँ ॥
सुरति निरति गहि ठाम चीन्हो अनूप अलच्छन मानहुँ ॥
सत्यनाम अराधहु मनहीं साधहु चतुर चोर जो मन अहैं ॥
मने अहैं निरञ्जन कोइ न चीन्है सुत्रवासी सब कहैं ॥
साखी-सुन्य सरूपी मन सोई, धर्मदास लेहु जानि ॥
रेख रूप वाको नहीं, जिन्दा शब्द प्रमान ॥
सोरठा-निरंकार निःरूप, परिचय वेद प्रकास इमि ॥
तिहुँपुरके सोइ भूप, नेति निगम यश गावहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब तुमको शिर नावा । तुमतो मोहि अलख लखावा ॥
समरथ नव चरनन बलि जावै । तुम्ह ते बहु परचै हम पावै ॥
उन साहेब सम तुमहू अहहू । वैसिहि बात तुमहु प्रभु कहहू ॥

(२६)

ज्ञानप्रकाश

मेव तीन दिव्य दरशन मोहीं । तीनों भेष मैं जानौं तोहीं ॥
सतगुरुप्रथम दरस मोहिदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥
भेष छिपाय बहुरि ओहि आये । सार बात बहु मोहिं सुनाये ॥
तिसरे तुम्ह आयउ तन धारी । हम हैं तोहरे दरश भिखारी ॥
तुम्ह मोहिआय परमसुखदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥
तुमतो प्रभु बहु सुख दीन्हा । तुमते प्रभु परिचय हम चीन्हा ॥
एक बात प्रभु कहहु बिलोई । कहहु दया करि धरहु न गोई ॥
चिउँटी बहुत जरी मम पाहीं । तुम प्रताप अघ पायो नाहीं ॥
औरौ कबहिं होइ जो ऐसी । हे प्रभु कहहु बने तब कैसी ॥
चेत अचेत पावैं तर परई । हे प्रभु दास कौने विधि तरई ॥

जिन्दा वचन

धर्मदास निःसंशय रहहु । सद्गुरुध्यान अस्थिरचित्त गहहु ॥
जानिके जीव कबहिं नहिं मारो । भरोंसा और दया उर धारो ॥
भरसक चूको नाहीं कबहु । सब जीवनकी रक्षा करहु ॥
साधू सेवा पर सरवस वारी । सेवा सन्त प्रीति चित धारो ॥
सन्त चरण कर अस परतापा । मेटै दोष दुख करमज दापा ॥
साधू सेवा जीव जन धारो । नाम ध्यान धरि काज सँवारो ॥
साधू सेवा चित देइ करई । जीवन मुक्तिसो भव जल तरई ॥
तीर्थ व्रत बहु कम्म कगहीं । सत्यभक्ति विनु तरे जिव नाहीं ॥
कोटि तीर्थ सन्तन्हपद वासा । अंधा जीवहि नहिं विश्वासा ॥
सन्त जाहि घर चरण पखारा । भूत पिशाच होये सब न्यारा ॥
नौग्रह कर वसि नहिं चलई । सब विघ्न सदा सो टलई ॥
जेहि घर संत चरण परछालैं । सन्त उछिष्ट जाहि घर डालैं ॥
ताकर फल कछु वरणि न जाई । जाहि गहि विश्वास करै सेवकाई ॥
गुरु चरणोदक नित प्रीतिसे लेई । निहचै लोक पयान देई ॥
गुरुमुख कणिक प्रीतिसे पावै । ऊँच नीचकै भरम मिटावै ॥

बोधसागर

(२७)

गुरुमुख सती महा परसादा । पावत मेटे करमकर फाँदा ॥
गुरु हैं ब्रह्म अखण्ड अमाने । गुरु कहैं नहिं मानुष कर जाने ॥
गुरुते द्रोह तजे विष बादा । गुरु निन्दा नहिं पावै स्वादा ॥
नाम पान चरणोदक सीते । कहैं कबीर भक्ति दृढ रीते ॥
गुरु सेवा संतन सनमाना । दया धर्म ले मोक्ष अमाना ॥
जग महे जीव घात बहुतेरे । जीव घात शिर पाप घनेरे ॥
दया न गुणै करै जिव घाता । खेलि शिकार मगन मदमाता ॥
मारि मारि तन करै अहारा । जीव दया नहिं करै गवँरा ॥
जिव घातिक बहुते दुख पावै । जनम जनम तेहि काल सतावै ॥
कागदेह धरि निरघिन खाहीं । जनम अमित तेहि विष्टा माहीं ॥
झूकर स्वान जनम पुनि पावै । मीन मांस मद जाकहैं भावै ॥
साधु देव भक्ष अंकुर आहीं । मीन मांस मद राक्षस खाहीं ॥
कोटिक जप तप पुण्य कमावै । दया विना नर मुक्ति न पावै ॥

छंद-जप योग दान विधान बहु विधि करै कर्म अनेक हो ॥

सत कोटि तीर्थ भूमि परिकरमा करि न पावै थेक हो ॥

जौ लौं दया नहिं जीवको तो सबहि कर्म असार हो ॥

कोई लखे सज्जन जो हरि मैं कह्यों शब्द पुकारि हो ॥

साखी-जीव दया चित्त मों धरै, तजे अभक्ष्य अहार ॥

हंस दया धरि नाम गहि, उतरे भवजल पार ॥

सोरठा-सत्यनाम गुण गाय, गही माधु सेवा करै ॥

सहज परमपद पाय, सो सतगुरुपद विश्वास धरि ॥

चौपाई

जहां फूल तहैं आवै बासा । जहां साधु तहैं प्रभुकर बासा ॥

एक तत्त्व मन गुनि नाम समावै । दया क्षेम सत्य मन भावै ॥

गुरु औ साधु सेवा चित लावै । सत्यनाम गहि लोक सिधावै ॥

सत्यनाम सो विनसै नाहीं । त्रिगुण जालते न्यार रहाहीं ॥

(२८)

ज्ञानप्रकाश

त्रिगुण त्यागि चौथा पद भेटे । तब जरा मरणकी संशय मेटे ॥
चौथा पद सत्यनाम अमाना । विरला पाइ करै पद ध्याना ॥
सत्यनाम है सार अनुपा । प्रेम प्रीति गुरु दरस सरूपा ॥
काह भये यह अंगुरीके देखे । जो नहिं शीश दरश प्रभु पेखे ॥
काह भये ठठिया के भेटै । शीश दरश विनु भरम न मेटै ॥
नख सिख सत्पद दरश जबहीं । सो जिव जठर न आवै कबहीं ॥
निश्चै सत्य पर रहै समाई । कर्म भर्म तजि जिव दुरि ताई ॥
सत्यपद जिन एकहि मन लाया । शीश दरश निज निश्चै पाया ॥
सुरति निरति सत्यगुरुपद परसै । षोडश भानु चन्द्र छबि दरशै ॥
सुधापान सिंधासन सारा । हंसन्ह मिलि सुख बड़ा अपारा ॥
पुरुष दरश लोचन छकि जायी । पुरुष वचन शुभ घ्रान अघायी ॥
अन्धकार तहवाँ नहिं होई । सदा अँजोर अमरपुर सोई ॥
दीप असंख्य तहँ गणिन सिराहीं । हंसा निश्चल राज कराहीं ॥
निराकार यम तहाँ न जाई । तिरदेवनकी कौन चलाई ॥
सतगुरु शरण गहहिं जो कोई । ताहि देसको पहुँचे सोई ॥
जब राजा सो तिनुका मूटै । पाप पुण्य कै आशा छूटै ॥
तबहीं सत्यगुरु शब्द मन जूटै । जन्म मरणका संशय छूटै ॥
असुर भक्ष सो रहै निनारा । तजि असंग सत्संग बिचारा ॥
विरले हंस निःसंशय होई । दृढ़ प्रतीति नाम गहे सोई ॥
गुरु कहैं सत्यपुरुष सम जाने । सन्त कहैं गुरु सम करि मानै ॥
होइ निःकपट चरण गुरुआशा । सदगुरु नाम गहै विश्वासा ॥
निराधार सतनाम अधारा । शब्द सुरति जगबंध विचारा ॥
कर्म भर्म सो न्यारा होई । गुरुपद राखै सुरति समोई ॥
बहु विधि ज्ञान गुरुते पावै । यमका फन्दन सोई कटावै ॥
यमके फन्द कटे सुख होई । पशुआ हो नहिं पावै सोई ॥
गुरुका शब्द सुने जो काना । करे विचार बहुत परमाना ॥