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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 472

(२८)

ज्ञानप्रकाश

त्रिगुण त्यागि चौथा पद भेटे । तब जरा मरणकी संशय मेटे ॥
चौथा पद सत्यनाम अमाना । विरला पाइ करै पद ध्याना ॥
सत्यनाम है सार अनुपा । प्रेम प्रीति गुरु दरस सरूपा ॥
काह भये यह अंगुरीके देखे । जो नहिं शीश दरश प्रभु पेखे ॥
काह भये ठठिया के भेटै । शीश दरश विनु भरम न मेटै ॥
नख सिख सत्पद दरश जबहीं । सो जिव जठर न आवै कबहीं ॥
निश्चै सत्य पर रहै समाई । कर्म भर्म तजि जिव दुरि ताई ॥
सत्यपद जिन एकहि मन लाया । शीश दरश निज निश्चै पाया ॥
सुरति निरति सत्यगुरुपद परसै । षोडश भानु चन्द्र छबि दरशै ॥
सुधापान सिंधासन सारा । हंसन्ह मिलि सुख बड़ा अपारा ॥
पुरुष दरश लोचन छकि जायी । पुरुष वचन शुभ घ्रान अघायी ॥
अन्धकार तहवाँ नहिं होई । सदा अँजोर अमरपुर सोई ॥
दीप असंख्य तहँ गणिन सिराहीं । हंसा निश्चल राज कराहीं ॥
निराकार यम तहाँ न जाई । तिरदेवनकी कौन चलाई ॥
सतगुरु शरण गहहिं जो कोई । ताहि देसको पहुँचे सोई ॥
जब राजा सो तिनुका मूटै । पाप पुण्य कै आशा छूटै ॥
तबहीं सत्यगुरु शब्द मन जूटै । जन्म मरणका संशय छूटै ॥
असुर भक्ष सो रहै निनारा । तजि असंग सत्संग बिचारा ॥
विरले हंस निःसंशय होई । दृढ़ प्रतीति नाम गहे सोई ॥
गुरु कहैं सत्यपुरुष सम जाने । सन्त कहैं गुरु सम करि मानै ॥
होइ निःकपट चरण गुरुआशा । सदगुरु नाम गहै विश्वासा ॥
निराधार सतनाम अधारा । शब्द सुरति जगबंध विचारा ॥
कर्म भर्म सो न्यारा होई । गुरुपद राखै सुरति समोई ॥
बहु विधि ज्ञान गुरुते पावै । यमका फन्दन सोई कटावै ॥
यमके फन्द कटे सुख होई । पशुआ हो नहिं पावै सोई ॥
गुरुका शब्द सुने जो काना । करे विचार बहुत परमाना ॥