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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 467

बोधसागर

(२३)

धर्मदास वचन

जोरि पानि मैं पूछौं स्वामी । कहो कृपा करि अन्तर्यामी ॥
अहो साहेब नाम क आही । परचै नाम कहो मोहिं पाहीं ॥
अरु सतगुरु तुमका कहैं कहहुँ । हे प्रभु कौन देश तुम रहहु ॥

जिन्दा वचन

हो धर्मनि जो पूछेहु मोहीं । सुनहुँ सुरति धरि कहों मैं तोहीं ॥
जिन्दा नाम अहैं सुनु मोरा । जिन्दा भेष खोज किहैं तोरा ॥
हम सतगुरु कर सेवक आहीं । सतगुरु संग हम सदा रहाहीं ॥
सत्य पुरुष वह सत्यगुरु आहीं । सत्य लोक वह सदा रहाहीं ॥
सकल जीवके रक्षक सोई । सतगुरु भक्ति काज जिव होई ॥
सतगुरु सत्यकवीर सो आहीं । गुप्त प्रगट कोइ चीन्है नाहीं ॥
सतगुरु आ जगत तन धारी । दासातन धरि शब्द पुकारी ॥
काशी रहहिं परखि हम पावा । सत्यनाम उन मोहिं दढावा ॥
जम राजा कर सब छल चीन्हा । निरखि परखिभै यम सो भीना ॥
तीन लोक जो काल सितावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥
निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥
तिन्ह कर सुत आहि त्रिदेवा । सब जग करै जो उनकी सेवा ॥
त्रिगुण जाल यह जग फन्दाना । गहै न अविचल पुरुष पुराना ॥
जाकर ई जग भक्ति कराई । अन्तकाल जिव सो धरि खाई ॥
सबै जीव सतपुरुषके आहीं । यम दै धोख फन्दाइस ताहीं ॥
प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहैं लाई ॥
दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँधारा ॥
जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥
जिव जानै यह धनी हमारा । दे विश्वास पुनि धरै अवतारा ॥
प्रभुता देखि कीन्ह विश्वासा । अन्तकाल पुनि करै निरासा ॥