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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 470

(२६)

ज्ञानप्रकाश

मेव तीन दिव्य दरशन मोहीं । तीनों भेष मैं जानौं तोहीं ॥
सतगुरुप्रथम दरस मोहिदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥
भेष छिपाय बहुरि ओहि आये । सार बात बहु मोहिं सुनाये ॥
तिसरे तुम्ह आयउ तन धारी । हम हैं तोहरे दरश भिखारी ॥
तुम्ह मोहिआय परमसुखदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥
तुमतो प्रभु बहु सुख दीन्हा । तुमते प्रभु परिचय हम चीन्हा ॥
एक बात प्रभु कहहु बिलोई । कहहु दया करि धरहु न गोई ॥
चिउँटी बहुत जरी मम पाहीं । तुम प्रताप अघ पायो नाहीं ॥
औरौ कबहिं होइ जो ऐसी । हे प्रभु कहहु बने तब कैसी ॥
चेत अचेत पावैं तर परई । हे प्रभु दास कौने विधि तरई ॥

जिन्दा वचन

धर्मदास निःसंशय रहहु । सद्गुरुध्यान अस्थिरचित्त गहहु ॥
जानिके जीव कबहिं नहिं मारो । भरोंसा और दया उर धारो ॥
भरसक चूको नाहीं कबहु । सब जीवनकी रक्षा करहु ॥
साधू सेवा पर सरवस वारी । सेवा सन्त प्रीति चित धारो ॥
सन्त चरण कर अस परतापा । मेटै दोष दुख करमज दापा ॥
साधू सेवा जीव जन धारो । नाम ध्यान धरि काज सँवारो ॥
साधू सेवा चित देइ करई । जीवन मुक्तिसो भव जल तरई ॥
तीर्थ व्रत बहु कम्म कगहीं । सत्यभक्ति विनु तरे जिव नाहीं ॥
कोटि तीर्थ सन्तन्हपद वासा । अंधा जीवहि नहिं विश्वासा ॥
सन्त जाहि घर चरण पखारा । भूत पिशाच होये सब न्यारा ॥
नौग्रह कर वसि नहिं चलई । सब विघ्न सदा सो टलई ॥
जेहि घर संत चरण परछालैं । सन्त उछिष्ट जाहि घर डालैं ॥
ताकर फल कछु वरणि न जाई । जाहि गहि विश्वास करै सेवकाई ॥
गुरु चरणोदक नित प्रीतिसे लेई । निहचै लोक पयान देई ॥
गुरुमुख कणिक प्रीतिसे पावै । ऊँच नीचकै भरम मिटावै ॥