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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 469

बोधसागर

(२५)

नरक वास नहिं छूटै भाई । महा नरक भग जठर कहाई ॥
नरकते विष्णु छुटे नहिं पाये । जनम जनम जठरै भग आये ॥
जग अंधा हिय गम्य न कीन्हा । सबै आस ताही कर लीन्हा ॥
जिव अचेत हिय गम्य न करई । सबै आस वैकुण्ठहिं धरई ॥
विष्णु सरीखे को जग आही । बहु भगता किमि वरणो ताही ॥
तिन्ह वैकुण्ठ वास नहिं पाया । कर्महिं वसि पुनि नर्क भोगाया ॥
सो वैकुंठ चाहत नर प्रानी । यह यम छल विरले पहिचानी ॥
जस जो कर्म करै संसारा । तस भुगतै चौरासी धारा ॥
मानुष जन्म बडे तप होई । सो मानुष तन जात विगोई ॥
नाम विना नहिं छूटे कालू । बार बार यम नर्कहिं घालू ॥
नरक निवारण नाम जो आही । सुर नर मुनि लखन कोइ नाहीं ॥
ताते यम फिर फिर भटकावै । नाना जोइनि काल सतावै ॥
विरलै सार शब्द पहिचाने । सतगुरु मिलै सतनाम समाने ॥
छंद-सुनु धर्मदास सुजाना शब्द प्रमान सतगुरु जानहुँ ॥
सुरति निरति गहि ठाम चीन्हो अनूप अलच्छन मानहुँ ॥
सत्यनाम अराधहु मनहीं साधहु चतुर चोर जो मन अहैं ॥
मने अहैं निरञ्जन कोइ न चीन्है सुत्रवासी सब कहैं ॥
साखी-सुन्य सरूपी मन सोई, धर्मदास लेहु जानि ॥
रेख रूप वाको नहीं, जिन्दा शब्द प्रमान ॥
सोरठा-निरंकार निःरूप, परिचय वेद प्रकास इमि ॥
तिहुँपुरके सोइ भूप, नेति निगम यश गावहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब तुमको शिर नावा । तुमतो मोहि अलख लखावा ॥
समरथ नव चरनन बलि जावै । तुम्ह ते बहु परचै हम पावै ॥
उन साहेब सम तुमहू अहहू । वैसिहि बात तुमहु प्रभु कहहू ॥