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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 468

(२४)

ज्ञानप्रकाश

कालै भेष दयाल बनावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥
द्वापर देखहु कृष्णकी रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनिती ॥
अर्जुन कहै तिन्ह दया हठावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥
गीता पाठकै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥
बन्धु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहै बहु काल सतावा ॥
भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥
बहु गंजन जीवन कहै कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
पतिव्रता वृन्दा व्रत टारा । ताके पाप पहन औतारा ॥
बलिते सो छल कीन्ह बहुता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥
छल बुद्धि दीन्है ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला ॥
लघु सुरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवीलीन्ह पुनि स्वस्तिकराये ॥
स्वस्तिकराइ तबै प्रगटना । दीर्घरूप देखि बलि भय माना ॥
तीनि परग तीनो पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥
देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥
तेहि कारण पतालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगटन चीन्हा ॥
तब ले पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥
यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्त हरि हमको कीन्हा ॥
जाकर वचन थिर होवे नाहीं । औ पुनि जीव दया नहिं ताहीं ॥
तासो कहहु लाभ किमि होई । तेहि सेवै सो जाय विगोई ॥
औ हरिचन्द्र केर कस लेखा । धर्मदास चित करो विवेखा ॥
यती सती त्यागी भयऊ । सब कहै काल विगुरुचन लयऊ ॥
काहूकै व्रत हट नहिं राखा । ताकहै मुक्तिदाता जग भाखा ॥
स्वर्गहिं धोखा नरकहिं जाहीं । जीव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥
पण्डो सम जग को व्रतधारी । नरक बास ताकहै ले डारी ॥
करण मोरध्वज सत्यव्रत धारी । ले कसनी ताहि दीन्ह विडारी ॥
भक्त अनेक जगत महीं भयेऊ । काहू कहै वैकुण्ठ न दयऊ ॥