छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्) is an ancient and extensive Upanishad of the Samaveda. The preface to this Gita Press edition places it within the Talavakara Brahmana of the Samaveda, the same branch as the Kena Upanishad, which is why the two share a peace invocation. Its eight chapters set out spiritual knowledge together with the meditations and rites connected with it.
Famous passages include the meditation on Om as the udgitha, the Shandilya vidya, the stories of Satyakama Jabala and Raikva, the doctrine of the five fires, Uddalaka Aruni's teaching 'tat tvam asi' to his son Shvetaketu, the dialogue of Sanatkumara and Narada on the infinite (bhuma), the meditation on the small space in the heart, and the tale of Indra and Virochana learning about the Self from Prajapati. Many of the Brahma Sutras rest on these passages.
This is volume three of the Gita Press, Gorakhpur Upanishad-bhashya series (book code 582), giving the text, Shankara's commentary and a Hindi translation of both. Its imprint records 32,000 copies printed between Samvat 1993 and 2050 and an eighth edition of 5,000 in Samvat 2052. It has 978 pages.
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८५५
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| पासनस्थानस्य सम्बन्धिन्यो नाड्यो हृदयमांसपिण्डात्सर्वतो विनिःसृता आदित्यमण्डलादिव रश्मयस्ताश्चैताः पिङ्गलस्य वर्णविशेषविशिष्टस्याणिम्नः सूक्ष्मरसस्य रसेन पूर्णास्तदाकारा एव तिष्ठन्ति वर्तन्त इत्यर्थः । | सम्बद्ध नाडियाँ आदित्यमण्डलसे किरणोंके समान उस हृदयरूप मांसपिण्डसे सब ओर निकली हुई हैं, वे पिंगलनामक एक वर्णविशेषसे युक्त अणिमा अर्थात् सूक्ष्म रसकी हैं; तात्पर्य यह है कि वे उस रससे पूर्ण होकर तदाकार ही रहती हैं। |
| तथा शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य च रसस्य पूर्णा इति सर्वत्राध्याहार्यम् । सौरेण तेजसा पित्ताख्येन पाकाभिनिर्वृत्तेन कफेनाल्पेन सम्पर्कात्पिङ्गलं भवति सौरं तेजः पित्ताख्यम् । तदेव च वातभूयस्त्वान्नीलं भवति । तदेव च कफभूयस्त्वाच्छुक्लम् । कफेन समतायां पीतम् । शोणितबाहुल्येन लोहितम् । वैद्यकाद्वा वर्णविशेषा अन्वेष्टव्याः, कथं भवन्तीति ? | इसी प्रकार वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रससे पूर्ण हैं—इस प्रकार पूर्ण पदका सर्वत्र अध्याहार करना चाहिये। पित्तसंज्ञक सौर तेजसे परिपक्व हुए थोड़े-से कफसे सम्पर्क होनेपर पित्तनामक सौर तेज पिङ्गल वर्ण हो जाता है। वही वातकी अधिकता होनेपर नीला हो जाता है और कफकी अधिकता होनेपर वही शुक्ल हो जाता है। कफसे [ वातकी ] समता होनेपर वह पीला हो जाता है और रक्तकी अधिकता होनेपर लोहित। अथवा वैद्यक शास्त्रसे इन वर्णविशेषोंका—ये किस प्रकार होते हैं, ऐसा—अन्वेषण करना चाहिये। |
| श्रुतिस्त्वाहादित्यसम्बन्धादेव तत्तेजसो नाडीष्वनुगतस्यैते | किंतु श्रुतिका तो यही कथन है कि आदित्यके सम्बन्धसे ही, नाड़ियोंमें अनुस्यूत हुए उस तेजके |
८५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| वर्णविशेषा इति । कथम् ? असौ वा आदित्यः पिङ्गलो वर्णत एष आदित्यः शुक्लोऽप्येष नील एष पीत एष लोहित आदित्य एव ॥ १ ॥ | ये वर्णविशेष हो जाते हैं । यह किस प्रकार ? [ इसपर कहते हैं-] यह आदित्य वर्णतः पिङ्गल है, यह आदित्य शुक्ल भी है तथा यही नीलवर्ण है, यही पीला है और यही लोहित भी है ॥ १ ॥ |
— : ० : —
| तस्याध्यात्मं नाडीभिः कथं सम्बन्ध इत्यत्र दृष्टान्तमाह— | शरीरके भीतर नाडियोंके साथ उसका सम्बन्ध किस प्रकार होता है - इस विषयमें श्रुति दृष्टान्त देती है— |
तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥
इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस (दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है उसी प्रकार ये सूर्यकी किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें प्रविष्ट हैं । वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन नाडियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाडियोंसे निकलती हैं वे इस आदित्यमें व्याप्त हैं ॥ २ ॥
| तत्तत्र यथा लोके महान्विस्तीर्णः पन्था महापथ आततो | इस विषयमें यों समझना चाहिये कि जिस प्रकार लोकमें कोई महान् |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५७
| व्यास उभौ ग्रामा गच्छतीमं च संनिहितममुं च विप्रकृष्टं दूरम्, एवं यथा दृष्टान्तो महापथ उभौ ग्रामौ प्रविष्टः, एवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकावमुं चादित्यमण्डलमिमं च पुरुषं गच्छन्त्युभयत्र प्रविष्टाः; यथा महापथः ।<br><br>कथम् ? अमुष्मादादित्यमण्डलात्प्रतायन्ते संतता भवन्ति, ता अध्यात्ममासु पिङ्गलादिवर्णासु यथोक्तासु नाडीषु सृप्ता गताः प्रविष्टा इत्यर्थः । आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते प्रवृत्ताः संतानभूताः सत्यस्तेऽमुष्मिन् रश्मीनामुभयलिङ्गत्वात् इत्युच्यन्ते ॥ २ ॥ | यानी विस्तीर्ण मार्ग अर्थात् महापथ आतत—व्यास हुआ इस समीपवर्ती और उस दूरस्थ दोनों ग्रामोंको जाता है इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है कि महापथ दोनों ग्रामोंमें प्रवेश करता है, ये सूर्यकी किरणें दोनों लोकोंमें—उस आदित्यमण्डलमें और इस पुरुषमें जाती हैं अर्थात् महापथके समान दोनों जगह प्रवेश किये हुए हैं।<br><br>किस प्रकार प्रवेश किये हुए हैं ?—वे इस आदित्यमण्डलसे फैलती हैं और शरीरमें उन उपर्युक्त पिङ्गलादि वर्णोंवाली नाड़ियोंमें सृप्त—गत अर्थात् प्रविष्ट होती हैं तथा इन नाड़ियोंसे व्याप्त होती अर्थात् प्रवृत्त होकर फैलती हुई इस आदित्यमण्डलमें प्रवेश करती हैं। ‘रश्मि’ शब्द [ स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग ] दोनों लिङ्गोंवाला होनेके कारण उनके लिये [ पहले ‘ताः’ सर्वनामका प्रयोग होनेपर भी पीछे ] ‘ते’ ऐसा कहा गया है ॥ २ ॥ |
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥
८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया हुआ—भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न होकर स्वप्न नहीं देखता उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे व्याप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
| तत्तत्रैवं सति यत्र यस्मिन् काल एतत्स्वप्नमयं जीवः सुप्तो भवति। स्वापस्य द्विप्रकारत्वाद्विशेषणं समस्त इति; उपसंहृतसर्वकरणवृत्तिरित्येतत् । अतो बाह्यविषयसम्पर्कजनितकालुष्याभावात्सम्यक् प्रसन्नः सम्प्रसन्नो भवति । अत एव स्वप्नं विषयाकाराभासं मानसं स्वप्नप्रत्ययं न विजानाति नानुभवतीत्यर्थः। यदैवं सुप्तो भवत्यासु सौरतेजःपूर्णासु यथोक्तासु नाडीषु तदा | 'तत्'—उस अवस्थामें ऐसा होनेपर वहाँ—जिस समय यह जीव इस स्वप्नावस्था अर्थात् निद्राको प्राप्त होकर सो जाता है । निद्रा* दो प्रकारकी है इसलिये यहाँ 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है । तात्पर्य यह है कि जिस समय वह, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंका उपसंहार हो गया है, ऐसा हो जाता है; इसलिये बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे प्राप्त हुई मलिनताका अभाव हो जानेके कारण यह सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न-सम्प्रसन्न होता है; तात्पर्य यह है कि इसीलिये यह स्वप्न—विषयाकारसे भासित होनेवाले मानसिक स्वप्नप्रत्ययको नहीं जानता, अर्थात् उसका अनुभव नहीं करता । जिस समय इस प्रकार सो जाता है उस समय सूर्यके तेजसे पूर्ण हुई इन पूर्वोक्त नाड़ियोंमें सृप्त अर्थात् प्रविष्ट होता है, तात्पर्य यह है कि वह |
* निद्राकी दो वृत्तियाँ हैं—दर्शनवृत्ति यानी स्वप्न और अदर्शनवृत्ति—गाढ सुषुप्ति । यहाँ दर्शनवृत्तिकी व्यावृत्तिके लिये 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है ।
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सुप्तः प्रविष्टा नाडीभिर्द्वारभूताभिर्हृद्याकाशं गतो भवतीत्यर्थः। न ह्यन्यत्र सत्सम्पत्तेः स्वप्नादर्शनमस्तीति सामर्थ्यान्नाडीष्विति सप्तमी तृतीयाया परिणम्यते । | इन द्वारभूत नाड़ियोंसे हृदयाकाशमें पहुँच जाता है । सत्सम्पत्ति (सत्को प्राप्त हो जाने) के सिवा और कहीं स्वप्नका अदर्शन नहीं होता— इस सामर्थ्यसे ‘नाडीषु’ इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे [‘नाडीभि:’ इस प्रकार] तृतीयाके रूपमें बदल ली जाती है । |
| तं सता सम्पन्नं न कश्चन न कश्चिदपि धर्माधर्मरूपः पाप्मा स्पृशतीति स्वरूपावस्थितत्वात्तदात्मनः। देहेन्द्रियविशिष्टं हि सुखदुःखकार्यप्रदानेन पाप्मा स्पृशतीति न तु सत्सम्पन्नं स्वरूपावस्थं कश्चिदपि पाप्मा स्प्रष्टुमुत्सहते; अविषयत्वात् । अन्यो ह्यन्यस्य विषयो भवति न त्वन्यत्वं केनचित्कुतश्चिदपि सत्सम्पन्नस्य । स्वरूपप्रच्यवनं त्वात्मनो जाग्रत्स्वप्नावस्थां प्रति गमनं बाह्यविषयप्रतिबोधोऽविद्याकाम- | सत्को प्राप्त हुए उस प्राणीको कोई भी धर्माधर्मरूप पाप स्पर्श नहीं करता, क्योंकि उस अवस्थामें आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है । जो जीव देह और इन्द्रियोंसे विशिष्ट है उसीको सुख-दुःखरूप अपने कार्य प्रदान करके पाप स्पर्श कर सकता है । सत्को प्राप्त हुए स्वरूपावस्थित आत्माको स्पर्श करनेका कोई भी पाप साहस नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसका विषय नहीं है । अन्य ही अन्यका विषय हुआ करता है और सत्को प्राप्त हुए जीवका किसीसे भी किसी भी कारणसे अन्यत्व है नहीं । आत्माका जाग्रत् या स्वप्नावस्थाको प्राप्त होना तथा बाह्य विषयोंको अनुभव करना ही स्वरूपसे च्युत होना है, क्योंकि अविद्यारूप काम और कर्मका बीज |
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| कर्मबीजस्य ब्रह्मविद्याहुताशादाहनिमित्तमित्यवोचाम षष्ठ एव तदिहापि प्रत्येत्तव्यम् ।<br><br>यदैवं सुप्तः सौरेण तेजसा हि नाड्यन्तर्गतेन सर्वतः सम्पन्नो व्याप्तो भवति । अतो विशेषेण चक्षुरादिनाडीद्वारैर्बाह्यविषयभोगायाप्रसृतानि करणान्यस्य तदा भवन्ति । तस्मादयं करणानां निरोधात्स्वात्मन्येवावस्थितःस्वप्नं न विजानातीति युक्तम् ॥ ३ ॥ | ब्रह्मविद्यारूप अग्निसे दग्ध न होनेके कारण ही रहता है—ऐसा हम छठे अध्यायमें ही कह चुके हैं, उसीपर यहाँ भी विश्वास करना चाहिये।<br><br>जिस समय यह जीव इस प्रकार सो जाता है उस समय सब ओरसे नाडीके अन्तर्गत और तेजसे सम्पन्न—व्याप्त हो जाता है इसलिये तब इसकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंके भोगके लिये चक्षु आदि नाड़ियोंके द्वारा विशेषरूपसे अप्रसृत अर्थात् निरुद्ध हो जाती हैं। इसीसे इन्द्रियोंका निरोध हो जानेके कारण अपने स्वरूपमें ही स्थित हुआ यह जीव स्वप्न नहीं देखता ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
| तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर— |
अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥
अब, जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता है उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं—'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ? वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता तबतक उन्हें जानता है ॥ ४ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६१
| अथ यत्र यस्मिन् कालेऽबलिमानमबलभावं देहस्य रोगादिनिमित्तं जरादिनिमित्तं वा कृशीभावमेतन्नयनं नीतः प्रापितो देवदत्तो भवति मुमूर्षुर्यदा भवतीत्यर्थः, तमभितः सर्वतो वेष्टयित्वासीना ज्ञातय आहुर्जानासि मां तव पुत्रं जानासि मां पितरं चेत्यादि । स मुमूर्षुर्यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तोऽनिर्गतो भवति तावत्पुत्रादीञ्जानाति ॥ ४ ॥ | अब, जिस समय यह देवदत्त [ नामक पुरुषविशेष ] अबलिमान् रोगादिके कारण अथवा जरादिके कारण देहकी दुर्बलता—कृशताको प्राप्त करा दिया जाता है अर्थात् जिस समय यह मरणासन्न होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए बन्धुजन कहते हैं—‘क्या तुम मुझ अपने पुत्रको जानते हो ? क्या तुम मुझ अपने पिताको पहचानते हो ?’ इत्यादि । वह मुमूर्षु जीव जबतक इस शरीरसे अनुत्क्रान्त रहता है अर्थात् बहिर्गत नहीं होता तबतक उन पुत्रादिको पहचानता है ॥ ४ ॥ |
अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभि-
रूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षि-
प्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं
विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥
फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह ‘ॐ’ ऐसा [ कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ ] ऊर्ध्वलोक अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है ॥ ५ ॥
८१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथ यत्र यदैतत्क्रियाविशेषणमित्यस्माच्छरीरादुत्क्रामति । अथ तदैतैरेव यथोक्ताभी रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते यथाकर्मजितं लोकं प्रत्यविद्वान् । इतरस्तु विद्वान्यथोक्तसाधनसम्पन्नः स ओमित्योङ्कारेणात्मानं ध्यायन्यथापूर्वं वा हैव । उद्बोर्ध्वं वा विद्वांश्चेदितरस्तिर्यङ्ङ्वेत्यभिप्रायः। मीयते प्रमीयते गच्छतीत्यर्थः। | फिर जिस समय—'एतत्' यह शब्द क्रियाविशेषण है—यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है तब वह अज्ञानी अपने कर्मोंके अनुसार उपार्जित लोकोंके प्रति इन उपर्युक्त किरणोंके द्वारा ही ऊपर चढ़ता है। तथा दूसरा जो उपर्युक्त साधनोंसे सम्पन्न ज्ञानी (निर्गुणोपासक) है वह ओंकारके द्वारा पूर्ववत् आत्माका ध्यान करता हुआ—तात्पर्य यह है कि यदि वह विद्वान् होता है तो ऊर्ध्वलोकोंको और अविद्वान् होता है तो अधोलोकोंको 'मीयते' अर्थात् जाता है। |
| स विद्वानुत्क्रमिष्यन्यावत्क्षिप्येन्मनो यावता कालेन मनसः क्षेपः स्यात्तावता कालेनादित्यं गच्छति प्राप्नोति क्षिप्रं गच्छतीत्यर्थो न तु तावतैव कालेनेति विवक्षितम् । | वह उत्क्रमण करनेवाला विद्वान् जितनी देरमें मन जाता है अर्थात् जितने समयमें मनको कहीं ले जाया जाता है, उतने ही समयमें आदित्यलोकमें जाता—पहुँचता ह । तात्पर्य यह है कि वह शीघ्र चलता है, इससे यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि उतने ही समयमें पहुँचता है। |
| किमर्थमादित्यं गच्छतीत्युच्यते। एतद्वै खलु प्रसिद्धं ब्रह्मलोकस्य द्वारं य आदित्यस्तेन द्वार- | वह आदित्यलोकमें क्यों जाता है? यह बतलाया जाता है—यह जो आदित्य है वह निश्चय ही ब्रह्मलोकका प्रसिद्ध द्वार है; उस |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
| भूतेन ब्रह्मलोकं गच्छति विद्वान्। अतो विदुषां प्रपदनं प्रपद्यते ब्रह्मलोकमनेन द्वारेणेति प्रपदनम्। निरोधनं निरोधोऽस्मादादित्यादविदुषां भवतीति निरोधः। सौरेण तेजसा देह एव निरुद्धाः सन्तो मूर्धन्यया नाड्या नोत्क्रमन्त एवेत्यर्थः। विष्वङ्ङन्या इति श्लोकात् ॥ ५ ॥ | द्वारभूत आदित्यके द्वारा विद्वान् ब्रह्मलोकको जाता है। अतः इस द्वारसे विद्वान् ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं इसलिये यह विद्वानोंका प्रपदन है। निरोधनका नाम निरोध है; इस आदित्यसे अविद्वानोंका निरोध होता है, इसलिये यह निरोध है। तात्पर्य यह है कि अविद्वान् लोग सौर तेजके द्वारा देहमें ही निरुद्ध होकर मूर्धन्यनाडीसे उत्क्रमण नहीं करते, जैसा कि 'विष्वङ्डन्या' इत्यादि आगेके मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥५॥ |
— : ० : —
तदेष श्लोकः। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥
इस विषयमें यह मन्त्र है—हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं। उनमेंसे एक मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है; शेष इधर-उधर जानेवाली नाडियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमणका कारण होती हैं [ उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती ] ॥ ६ ॥
| तदेतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति। शतं चैका चैकोत्तरशतं नाड्यो हृदयस्य मांसपिण्डभूतस्य सम्बन्धिन्यः | उस इस उपर्युक्त अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र है—मांसके पिण्डभूत हृदयसे सम्बन्ध रखनेवाली सौ आर एक अर्थात् एक ऊपर सौ प्रधान नाडियाँ हैं, [ 'प्रधानतः' |
८६४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८६४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| प्रधानतो भवन्ति, आनन्त्याद्दे-<br>हनाडीनाम्। तासामेका मूर्धान-<br>मभिनिःसृता विनिर्गता तयो-<br>र्ध्वमायन्गच्छन्नमृतत्वममृतभा-<br>वमेति विष्वङ्नानागतयस्ति-<br>र्यग्विसर्पिण्य ऊर्ध्वगाश्चान्या<br>नाड्यो भवन्ति संसारगमन-<br>द्वारभूता न त्वमृतत्वाय किं<br>तर्ह्युत्क्रमण एवोत्क्रान्त्यर्थमेव<br>भवन्तीत्यर्थः । द्विरभ्यासः-<br>प्रकरणसमाप्त्यर्थः ॥६॥ | इसलिये कहा कि ] देहकी नाड़ियोंका<br>कोई अन्त नहीं है । उनमेंसे एक<br>मूर्धाकी ओर निकल गयी है ।<br>उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला<br>जीव अमृतत्व—अमृतभावको प्राप्त<br>होता है । तथा अन्य नाड़ियाँ<br>विष्वक्—नाना गतिवाली अर्थात्<br>इधर-उधर जानेवाली और ऊर्ध्व-<br>गामिनी हैं । वे संसारप्राप्तिकी<br>द्वारभूत हैं, अमृतत्वकी हेतुभूत<br>नहीं हैं । तो फिर कैसी हैं ?–वे<br>उत्क्रमण अर्थात् प्राणप्रयाणके लिये<br>ही होती हैं—ऐसा इसका तात्पर्य<br>है । 'उत्क्रमणे भवन्ति' इस पदकी<br>द्विरुक्ति प्रकरणकी समाप्ति सूचित<br>करनेके लिये है ॥ ६ ॥ |
—: ॐ :--
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६.॥
सप्तम खण्ड
— : ० : —
आत्मतत्त्वका अनुसंधान करनेके लिये इन्द्र और
विरोचनका प्रजापतिके पास जाना
| अथ य एष सम्प्रसादोऽस्मा-<br>च्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरु-<br>पसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत<br>एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभ-<br>यमेतद्ब्रह्मेत्युक्तम् । तत्र कोऽसौ<br>सम्प्रसादः ? कथं वा तस्याधि-<br>गमः ? यथा सोऽस्माच्छरीरात्स-<br>मुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन<br>रूपेणाभिनिष्पद्यते, येन स्वरूपेणा-<br>भिनिष्पद्यते स किंलक्षण आत्मा ?<br>सम्प्रसादस्य च देहसम्बन्धीनि<br>रूपाणि ततो यदन्यत्कथं स्वरूप-<br>मित्येतेऽर्था वक्तव्या इत्युत्तरो<br>ग्रन्थ आरभ्यते । आख्यायिका | ‘अथ यह जो सम्प्रसाद है, जो<br>इस शरीरसे सम्यक् रूपसे उत्थान<br>कर परम ज्योतिको प्राप्त होकर<br>अपने स्वरूपसे निष्पन्न होता है यह<br>आत्मा है— ऐसा [ आचार्यने ]<br>कहा । यह अमृत है, यह अभय है,<br>यह ब्रह्म है’ ऐसा [ पहले दहर<br>विद्याके प्रसङ्गमें ] कहा जा चुका<br>है । सो इस प्रसङ्गमें यह सम्प्रसाद<br>कौन है और उसकी प्राप्ति कैसे<br>होती है ? यह जिस प्रकार इस<br>शरीरसे उत्थानकर परम ज्योतिको<br>प्राप्त हो अपने स्वरूपसे निष्पन्न<br>होता है और जिस रूपसे निष्पन्न<br>होता है वह आत्मा कैसे लक्षणवाला<br>है ? सम्प्रसादके जो [ सविशेष ]<br>रूप हैं वे तो देहसम्बन्धी हैं, उनसे<br>भिन्न जो उसका [ निर्विशेष ]<br>रूप है वह कैसा है ?—ये सब<br>बातें बतलानी हैं, इसीलिये आगेका<br>ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।<br>यहाँ जो आख्यायिका है वह तो<br>विद्याके ग्रहण और दान करनेकी |
८६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तु विद्याग्रहणसम्प्रदानविधिप्रदर्शिनार्था विद्यास्तुत्यर्था च । राजसेवितं पानीयमितिवत् । | विधि प्रदर्शित करने एवं विद्याकी स्तुतिके लिये है, जिस प्रकार [ जलकी प्रशंसा करनेके लिये ] 'यह जल राजाद्वारा सेवित है' ऐसा कहा जाता है । |
य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥
जो आत्मा [ धर्माधर्मादिरूप ] पापशून्य, जरारहित, मृत्युहीन, विशोक, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसे खोजना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा प्रजापतिने कहा ॥ १ ॥
| य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः, यस्योपासनायोपलब्ध्यर्थं हृदयपुण्डरीकमभिहितम्, यस्मिन्कामाः समाहिताः सत्या अनृतापिधानाः, यदुपासनसहभावि ब्रह्मचर्यं | जो आत्मा पापरहित, जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधारहित, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, जिसकी उपासना अर्थात् उपलब्धिके लिये हृदयपुण्डरीक स्थान बतलाया गया है, जिसमें मिथ्यासे अपिहित (ढँके हुए) सत्यकाम सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, जिसकी उपासनाके साथ-साथ रहनेवाला |
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१७ |
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| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| साधनमुक्तम्, उपासनफलभूतकामप्रतिपत्तये च मूर्धन्यया नाड्या गतिरभिहिता सोऽन्वेष्टव्यः शास्त्राचार्योपदेशैर्ज्ञातव्यः स विशेषेण ज्ञातुमेष्टव्यो विजिज्ञासितव्यः स्वसंवेद्यतामापादयितव्यः । | ब्रह्मचर्यरूप साधन बतलाया गया है और उपासनाके फलभूत कामकी प्राप्तिके लिये मूर्धन्य नाड़ीसे गति बतलायी गयी है उसका अन्वेषण करना चाहिये—शास्त्र और आचार्यके उपदेशोंसे उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; वह विजिज्ञासितव्य—विशेषरूपसे जाननेके लिये इष्ट है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त करानेयोग्य है । |
| किं तस्यान्वेषणाद्विजिज्ञासनाच्च स्यात् ? इत्युच्यते—स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानं यथोक्तेन प्रकारेण शास्त्राचार्योपदेशेनान्विष्य विजानाति स्वसंवेद्यतामापादयति तस्यैतत्सर्वलोककामावाप्तिः सर्वात्मता फलं भवतीति ह किल प्रजापतिरुवाच । | उसके अन्वेषण और विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे क्या होता है, यह बतलाया जाता है—जो उपर्युक्त प्रकारसे उस आत्माको शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार अन्वेषणकर विशेषरूपसे जान लेता है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त कर लेता है उसे इन समस्त लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति और सर्वात्मतारूप फलकी प्राप्ति होती है—ऐसा प्रजापतिने कहा । |
| अन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इति चैष नियमविधिरेव नापूर्वविधिः । एवमन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इत्यर्थः । दृष्टार्थत्वादन्वे- | 'अन्वेषण करना चाहिये, विशेषरूपसे जानना चाहिये' यह नियमविधि ही है, अपूर्व विधि नहीं है । इसका तात्पर्य यह है कि उसे इस प्रकार अन्वेषण करना चाहिये, इस प्रकार जानना चाहिये, क्योंकि |
छा० उ० २८—
८६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| षणविजिज्ञासनयोः । दृष्टार्थत्वं च दर्शयिष्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्यनेनासकृत्। पररूपेण च देहादिधर्मैरवगम्यमानस्यात्मनः स्वरूपाधिगमे विपरीताधिगमनिवृत्तिदृष्टं फलमिति नियमार्थतैवास्य विधेर्युक्ता न त्वग्निहोत्रादीनामिवापूर्वविधित्वमिह सम्भवति ॥ १ ॥ | अन्वेषण और विजिज्ञासा ये दोनों ही दृष्टार्थ हैं [ इनका फल प्रत्यक्ष सिद्ध है, परलोकादिकी भाँति अदृष्ट नहीं है ]। इनकी दृष्टार्थता 'मैं इसमें भोग्य नहीं देखता' इस [ इन्द्रके ] वाक्यसे श्रुति बारंबार दिखलायेगी । देहादि धर्मोंसे अतीत रूपसे ज्ञात होनेवाले आत्माके स्वरूपका ज्ञान होनेमें विपरीत ज्ञानकी निवृत्ति—यह दृष्ट फल है; अतः इस विधिक नियतार्थक होना ही उचित है; अग्निहोत्रादिके समान इसका अपूर्वविधि होना सम्भव नहीं है ॥ १ ॥ |
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तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामानितीन्द्रो हैव देवाना-मभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापति सकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥
प्रजापतिके इस वाक्यको देवता और असुर दोनोंहीने परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे—'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं जिसे जाननेपर जीव सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'—ऐसा निश्चय कर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा विरोचन—ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ लेकर प्रजापतिके पास आये ॥ २ ॥
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६९ |
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| तद्धोभय इत्याद्याख्यायिकाप्रयोजनमुक्तम्। तद्ध किल प्रजापतेर्वचनमुभये देवासुरा देवाश्चासुराश्च देवासुरा अनु परम्परागतं स्वकर्णगोचरापन्नमनुबुबुधिरेऽनुबुद्धवन्तः। | 'तद्धोभये' इत्यादि आख्यायिकाका प्रयोजन पहले बतला दिया गया। परम्परासे आये हुए—अपने कर्णोंके विषय हुए उस प्रजापतिके वचनको देवता और असुर इन दोनोंने जान लिया। |
| ते चैतत्प्रजापतिवचो बुद्ध्वा किमकुर्वन्नित्युच्यते—ते होचुरुक्तवन्तोऽन्योन्यं देवाः स्वपरिषदद्यसुराश्च हन्त यद्यनुमतिर्भवतां प्रजापतिनोक्तं तमात्मानमन्विच्छामोऽन्वेषणं कुर्मो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानित्युक्त्वेन्द्रो हैव राजैव स्वयं देवानामितरान्देवांश्च भोगपरिच्छदं च सर्वं स्थापयित्वा शरीरमात्रेणैव प्रजापतिंप्रत्यभिप्रवव्राज प्रगतवांस्तथा विरोचनोऽसुराणाम्। | प्रजापतिके इस वचनको जानकर उन्होंने क्या किया—यह बतलाया जाता है—उन देवता और असुरोंने अपनी-अपनी सभामें आपसमें कहा, 'यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो प्रजापतिके बतलाये हुए उस आत्माका अन्वेषण करें, जिस आत्माका अन्वेषण कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है। ऐसा कहकर स्वयं देवताओंका राजा इन्द्र ही अपनी सम्पूर्ण भोगसामग्री देवताओंको सौंपकर शरीरमात्रसे ही प्रजापतिके पास गया। इसी प्रकार असुरोंका राजा विरोचन भी गया। |
| विनयेन गुरवोऽभिगन्तव्या इत्येतद्दर्शयति, त्रैलोक्यराज्याच्च गुरुतरा विद्येति। यतो देवासुर- | गुरुजनोंके प्रति विनयपूर्वक जाना चाहिये—यह बात श्रुति दिखलाती है; तथा यह भी [ प्रदर्शित करती है ] कि विद्या त्रिलोकीके राज्यसे |
८७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| राजौ महार्हभोगार्हौ सन्तौ तथा<br>गुरुमभ्युपगतवन्तौ। तौ ह किला-<br>संविदानावेवान्योन्यं संविदम्-<br>कुर्वाणौ विद्याफलं प्रत्यन्योन्य-<br>मीर्ष्यां दर्शयन्तौ समित्पाणी<br>समिद्भारहस्तौ प्रजापतिसकाश-<br>माजग्मतुरागतवन्तौ ॥ २ ॥ | भी बढ़कर है, क्योंकि देवराज और<br>असुरराज ये दोनों बहुमूल्य भोगके<br>पात्र होनेपर भी इस प्रकार गुरुके<br>समीप गये । वे दोनो परस्पर<br>असंविदान—संविद् ( सद्भाव ) न<br>करते हुए अर्थात् विद्याके फलके<br>लिये एक दूसरेके प्रति ईर्ष्या<br>प्रदर्शित करते हुए समित्पाणि—<br>हाथोंमें समिधाओंके भार लिये<br>प्रजापतिके समीप आये ॥ २ ॥ |
तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तमिति तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥
उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—'तुम यहाँ किस इच्छासे रहे हो ?' उन्होंने कहा—'जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये । जो उस आत्माका अन्वेषण कर उसे विशेषरूपसे जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्के वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं । उसीको जाननेकी इच्छा करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ ३ ॥
| खण्ड ७] | शाङ्करभाष्यार्थे | ८७१ |
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| तौ ह गत्वा द्वात्रिंशतं वर्षाणि शुश्रूषापरौ भूत्वा ब्रह्मचर्यमूषतुरुषितवन्तौ । अभिप्रायज्ञः प्रजापतिस्तानुवाच किमिच्छन्तौ किं प्रयोजनमभिप्रेत्येच्छन्ताववास्तमुषितवन्तौ युवामितीत्युक्तौ तौ होचतुः—य आत्मेत्यादि भगवतो वचो वेदयन्ते शिष्टा अतस्तमात्मानं ज्ञातुमिच्छन्ताववास्तमिति । यद्यपि प्राक् प्रजापतेः समीपागमनादन्योन्यमीर्ष्यायुक्तावभूतां तथापि विद्याप्राप्तिप्रयोजनगौरवात्त्यक्तरागद्वेषमोहेर्ष्यादिदोषावेव भूत्वोषतुर्ब्रह्मचर्यं प्रजापतौ । तेनेदं प्रख्यापितमात्मविद्यागौरवम् ॥ ३ ॥ | वहाँ जाकर उन्होंने बत्तीस वर्षतक सेवामें तत्पर रहते हुए ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनके अभिप्रायको जाननेवाले प्रजापतिने उनसे कहा—'तुमने किस प्रयोजनके अभिप्रायसे अर्थात् क्या चाहते हुए यहाँ निवास किया है ?' इस प्रकार कहे जानेपर वे बोले—'शिष्टजन श्रीमान्-का 'य आत्मा' इत्यादि वाक्य बतलाते हैं, अतः उस आत्माको जाननेके लिये हमने निवास किया है ।' यद्यपि प्रजापतिके पास आनेसे पूर्व वे एक दूसरेके प्रति ईर्ष्यायुक्त थे, तथापि विद्याप्राप्तिके प्रयोजनके गौरवसे उन्होंने प्रजापतिके यहाँ रागद्वेष, मोह एवं ईर्ष्यादि दोषोंको त्यागकर ही ब्रह्मचर्यवास किया । इससे इस आत्मविद्याके गौरवकी सूचना मिलती है ॥ ३ ॥ |
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तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत
एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं
भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष
उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायते इति होवाच ॥ ४॥
८७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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उनसे प्रजापतिने कहा—'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी देता है यह आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है।' [तब उन्होंने पूछा—] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है उनमें आत्मा कौन-सा है ?' इसपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जिस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥
| तावेवं तपस्विनौ शुद्धकल्मषौ योग्यावुपलक्ष्य प्रजापतिरुवाच ह । य एषोऽक्षिणि पुरुषो निवृत्तचक्षुर्भिर्मृदितकषायैर्दृश्यते योगिभिर्द्रष्टा । एष आत्मापहतपाप्मादिगुणो यमवोचं पुराहं यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिरेतदमृतं भूमाख्यम् । अत एवाभयमत एव ब्रह्म वृद्धतममिति । | उन्हें इस प्रकार तपस्वी, विशुद्धकल्मष (जिनके दोष निवृत्त हो गये हैं) और योग्य जानकर प्रजापतिने कहा—'जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं और जिनके राग-द्वेषादि दोषोंका नाश हो गया है उन योगियोंको जो नेत्रके भीतर यहाँ द्रष्टा पुरुष दिखायी देता है, यह अपहतपाप्मादि गुणोंवाला आत्मा है, जिसके विषयमें पहले मैंने कहा था और जिसका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोक और कामनाओंकी प्राप्ति हो जाती है। यह भूमासंज्ञक अमृत है, इसलिये अभय है और इसीसे ब्रह्म यानी वृद्धतम है।' |
| अथैतत्प्रजापतिनोक्तमक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति वचः श्रुत्वा छायारूपं पुरुषं जगृहतुः । | तब प्रजापतिके कहे हुए 'नेत्रोंके भीतर जो पुरुष दिखायो देता है' इस वाक्यसे उन्होंने छायारूप पुरुषको ग्रहण किया |
खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ [८०३
| गृहीत्वा च दृढीकरणाय प्रजापतिं पृष्टवन्तौ । अथ योऽयं हे भगवोऽप्सु परिख्यायते परिसमन्ताज्ज्ञायते यश्चायमादर्श आत्मनः प्रतिबिम्बाकारः परिख्यायते खड्गादौ च कतम एष एषां भवद्भिरुक्तः किं वैक एव सर्वेष्विति ।<br><br>एवं पृष्टः प्रजापतिरुवाच—<br>एष उ एव यश्चक्षुषि द्रष्टा मयोक्त इति । एतन्मनसि कृत्वैषु सर्वेष्वन्तेषु मध्येषु परिख्यायत इति होवाच ।<br><br>ननु कथं युक्तं शिष्ययोर्विपरीतग्रहणमनुज्ञातुं प्रजापतेर्विगतदोषस्याचार्यस्य सतः ?<br><br>सत्यमेवं नानुज्ञातम् । | और उसे ग्रहणकर अपने विचारको पुष्ट करनेके लिये प्रजापतिसे पूछा, 'हे भगवन् ! यह जो पुरुष जलमें परिख्यात—'परि'—सब ओर 'ख्यात'—प्रतीत होता है और जो यह दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देता है तथा जो खड्गादि [स्वच्छ पदार्थों] में दीखता है इन सबमें आपका बतलाया हुआ आत्मा कौन है ? अथवा इन सबमें एक ही आत्मा है ?'<br><br>इस प्रकार पूछे जानेपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जो नेत्रान्तर्गत द्रष्टा बतलाया है वही आत्मा है'* इस बातको मनमें रखकर ही उसने कहा कि 'वह इन सभीके भीतर दिखायी देता है ।'<br><br>शङ्का—किंतु निर्दोष आचार्य होकर भी प्रजापतिका अपने शिष्योंके विपरीत ग्रहणका अनुमोदन करना कैसे उचित हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह ठीक है, परंतु प्रजापतिने उसका अनुमोदन नहीं किया । |
* इस उक्तिसे प्रजापतिने यह सूचित कर दिया है कि तुम मेरा अभिप्राय नहीं समझे, मैंने द्रष्टाको आत्मा बतलाया है और तुम दृश्यको आत्मा समझ बैठे हो।
८७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| [प्रजापतिविषय-काक्षेपवारणम्]<br><br>कथम्—<br>आत्मन्यध्यारोपितपाण्डित्यमहत्त्वबोद्धृत्वौहीन्द्रविरोचनौ तथैव च प्रथितौ लोके । तौ यदि प्रजापतिना मूढौ युवां विपरीतग्राहिणावित्युक्तौ स्यातां ततस्तयोश्चित्ते दुःखं स्यात्तज्जनिताच्च चित्तावसादात्पुनः प्रश्नश्रवणग्रहणावधारणं प्रत्युत्साहविघातः स्यादतो रक्षणीयौ शिष्याविति मन्यते प्रजापतिः । गृहीतां तावत्तदुदशरावदृष्टान्तेनापनेष्यामीति च । | शङ्का — सो किस प्रकार ?<br>समाधान — इन्द्र और विरोचन इन दोनोंने अपनेमें पाण्डित्य, महत्त्व और ज्ञातृत्वका आरोप किया था और ये लोकमें प्रतिष्ठित भी थे । यदि उनसे प्रजापति यह कहते कि 'तुम मूढ हो और उलटा समझनेवाले हो, तो उनके चित्तमें दुःख हो जाता और उससे होनेवाले चित्तके पराभवसे फिर प्रश्न करने, सुनने, ग्रहण करने और समझनेके लिये उत्साहका ह्रास हो जाता । अतः प्रजापति यही मानते हैं कि शिष्योंकी रक्षा करनी चाहिये । अभी ये विपरीत ग्रहण करते हैं तो भले ही करें, मैं जलके शकोरे आदिके दृष्टान्तसे उसे निवृत्त कर दूँगा । |
| ननु न युक्तमेष उ एवेत्यनृतं वक्तुम् । | शङ्का — किंतु 'यही वह आत्मा है' ऐसा कहकर मिथ्याभाषण करना तो उचित नहीं है । |
| न चानृतमुक्तम् । | समाधान — प्रजापतिने मिथ्याभाषण तो नहीं किया । |
| कथम् ? | शङ्का — किस प्रकार नहीं किया ? |
| आत्मनोक्तोऽक्षिपुरुषो मनसि | समाधान — शिष्यके ग्रहण |