छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 866 of 978
Read in contextPage 866
| ८१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अथ यत्र यदैतत्क्रियाविशेषणमित्यस्माच्छरीरादुत्क्रामति । अथ तदैतैरेव यथोक्ताभी रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते यथाकर्मजितं लोकं प्रत्यविद्वान् । इतरस्तु विद्वान्यथोक्तसाधनसम्पन्नः स ओमित्योङ्कारेणात्मानं ध्यायन्यथापूर्वं वा हैव । उद्बोर्ध्वं वा विद्वांश्चेदितरस्तिर्यङ्ङ्वेत्यभिप्रायः। मीयते प्रमीयते गच्छतीत्यर्थः। | फिर जिस समय—'एतत्' यह शब्द क्रियाविशेषण है—यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है तब वह अज्ञानी अपने कर्मोंके अनुसार उपार्जित लोकोंके प्रति इन उपर्युक्त किरणोंके द्वारा ही ऊपर चढ़ता है। तथा दूसरा जो उपर्युक्त साधनोंसे सम्पन्न ज्ञानी (निर्गुणोपासक) है वह ओंकारके द्वारा पूर्ववत् आत्माका ध्यान करता हुआ—तात्पर्य यह है कि यदि वह विद्वान् होता है तो ऊर्ध्वलोकोंको और अविद्वान् होता है तो अधोलोकोंको 'मीयते' अर्थात् जाता है। |
| स विद्वानुत्क्रमिष्यन्यावत्क्षिप्येन्मनो यावता कालेन मनसः क्षेपः स्यात्तावता कालेनादित्यं गच्छति प्राप्नोति क्षिप्रं गच्छतीत्यर्थो न तु तावतैव कालेनेति विवक्षितम् । | वह उत्क्रमण करनेवाला विद्वान् जितनी देरमें मन जाता है अर्थात् जितने समयमें मनको कहीं ले जाया जाता है, उतने ही समयमें आदित्यलोकमें जाता—पहुँचता ह । तात्पर्य यह है कि वह शीघ्र चलता है, इससे यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि उतने ही समयमें पहुँचता है। |
| किमर्थमादित्यं गच्छतीत्युच्यते। एतद्वै खलु प्रसिद्धं ब्रह्मलोकस्य द्वारं य आदित्यस्तेन द्वार- | वह आदित्यलोकमें क्यों जाता है? यह बतलाया जाता है—यह जो आदित्य है वह निश्चय ही ब्रह्मलोकका प्रसिद्ध द्वार है; उस |