Skip to content
SarvaKosh
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 865 of 978

Read in context
Page 865

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६१


| अथ यत्र यस्मिन् कालेऽबलिमानमबलभावं देहस्य रोगादिनिमित्तं जरादिनिमित्तं वा कृशीभावमेतन्नयनं नीतः प्रापितो देवदत्तो भवति मुमूर्षुर्यदा भवतीत्यर्थः, तमभितः सर्वतो वेष्टयित्वासीना ज्ञातय आहुर्जानासि मां तव पुत्रं जानासि मां पितरं चेत्यादि । स मुमूर्षुर्यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तोऽनिर्गतो भवति तावत्पुत्रादीञ्जानाति ॥ ४ ॥ | अब, जिस समय यह देवदत्त [ नामक पुरुषविशेष ] अबलिमान् रोगादिके कारण अथवा जरादिके कारण देहकी दुर्बलता—कृशताको प्राप्त करा दिया जाता है अर्थात् जिस समय यह मरणासन्न होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए बन्धुजन कहते हैं—‘क्या तुम मुझ अपने पुत्रको जानते हो ? क्या तुम मुझ अपने पिताको पहचानते हो ?’ इत्यादि । वह मुमूर्षु जीव जबतक इस शरीरसे अनुत्क्रान्त रहता है अर्थात् बहिर्गत नहीं होता तबतक उन पुत्रादिको पहचानता है ॥ ४ ॥ |


अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभि-
रूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षि-
प्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं
विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥

फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह ‘ॐ’ ऐसा [ कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ ] ऊर्ध्वलोक अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है ॥ ५ ॥