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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 874 of 978

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Page 874

८७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| राजौ महार्हभोगार्हौ सन्तौ तथा<br>गुरुमभ्युपगतवन्तौ। तौ ह किला-<br>संविदानावेवान्योन्यं संविदम्-<br>कुर्वाणौ विद्याफलं प्रत्यन्योन्य-<br>मीर्ष्यां दर्शयन्तौ समित्पाणी<br>समिद्भारहस्तौ प्रजापतिसकाश-<br>माजग्मतुरागतवन्तौ ॥ २ ॥ | भी बढ़कर है, क्योंकि देवराज और<br>असुरराज ये दोनों बहुमूल्य भोगके<br>पात्र होनेपर भी इस प्रकार गुरुके<br>समीप गये । वे दोनो परस्पर<br>असंविदान—संविद् ( सद्भाव ) न<br>करते हुए अर्थात् विद्याके फलके<br>लिये एक दूसरेके प्रति ईर्ष्या<br>प्रदर्शित करते हुए समित्पाणि—<br>हाथोंमें समिधाओंके भार लिये<br>प्रजापतिके समीप आये ॥ २ ॥ |


तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तमिति तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥

उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—'तुम यहाँ किस इच्छासे रहे हो ?' उन्होंने कहा—'जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये । जो उस आत्माका अन्वेषण कर उसे विशेषरूपसे जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्के वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं । उसीको जाननेकी इच्छा करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ ३ ॥