सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

१७४ मनुस्मृति ।
अपने समानोदक का मरण और पुत्र का जन्म सुनकर सचैल
स्नान से शुद्धि होती है । सगोत्र बालक का और असपिण्ड मामा,
साला आदि का विदेश में मृत्यु सुनकर, सचैल स्नान से शुद्धि
होती है । यदि दशाह के भीतर फिर कोई पैदा हो या मरे, तो
ब्राह्मण दश दिन पूरे होने तक शुद्ध न होगा । आचार्य के मरने में,
शिष्य को तीन दिन आशौच रहता है और आचार्य के पुत्र या
स्त्री के मरण में एक दिन का होता है ॥ ७६-८० ॥
श्रोत्रिये तूपसंपन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
मातुले पक्षिणीं रात्रिं शिष्यर्त्विग्बान्धवेषु च ॥ ८१ ॥
प्रेते राजनि सज्ज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः ।
अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरौ ॥ ८२ ॥
शुद्ध्येद्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति ॥ ८३ ॥
श्रोत्रिय की मृत्यु में तीन दिन, मामा, शिष्य, ऋत्विक् और
बान्धवों की मृत्यु में दिन-रात आशौच रहता है । जिस राजा के
देश में निवास हो उसकी मृत्यु, दिन में होने पर सूर्यास्त तक
और रात में रातभर, सूतक रहता है । अश्रोत्रिय ब्राह्मण, वेदपाठी
और गुरु के मरण में, एक दिन का आशौच होता है । ब्राह्मण दश
दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक
मास में शुद्ध होता है ॥ ८१-८३ ॥
न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्निषु क्रियाः ।
न च तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ ८४ ॥
दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।
शवं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ॥ ८५ ॥

पाँचवां अध्याय । १७५

पाँचवां अध्याय । १७५
आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने ।
सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानींश्च शक्तितः ॥ ८६ ॥
नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुध्यति ।
आचम्यैव तु निःस्नेहं गामा लभ्यार्कमीक्ष्य वा ॥ ८७ ॥
आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् ।
समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ ८८ ॥
अग्निहोत्री को सूतक के दिन बढ़ाकर, अग्निहोत्र में विघ्न न
करना चाहिए। अग्निहोत्री सपिण्ड होने पर भी सूतकी नहीं
होता । चाण्डाल, रजस्वला, पतित, प्रसूता, मुरदा और मुरदे
को छूने पर स्नान से शुद्धि होती है। अपवित्र वस्तु का दर्शन
होने पर, पवित्र होकर आचमनपूर्वक सौर मन्त्र 'उदुत्यं जात-
वेदसम्-' और पवमान मन्त्रों का जप करना चाहिए। मनुष्य
की गीली हड्डी छूने पर स्नान करके और सूखी हो तो आचमन
से विप्र शुद्ध होता है। अथवा गौ का स्पर्श या सूर्यदर्शन से पवि-
त्रता होती है। ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति तक जलदान न करे।
उसके बाद जलदान करे और तीन रात में ही शुद्ध भी हो
जाता है ॥ ८४-८८ ॥
वृथा संकरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् ।
आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ॥ ८६ ॥
पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।
गर्भभर्तृद्रुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ ६० ॥
आचार्यं स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् ।
निर्हृत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ ६१ ॥
वर्णसंकर, संन्यासी और आत्मघाती को जलदान की ज़रूरत

नहीं है। पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने-

१७६ मनुस्मृति ।
नहीं है। पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने-
वाली और मद्य पीनेवाली स्त्री को जलदान न करना। अपने आ-
चार्य, उपाध्याय, पिता, माता और गुरु के शव को उठाने और
दाह करने से, ब्रह्मचारी अपने व्रत से पतित नहीं होता है ॥८६-९१॥
दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् ।
पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥ ६२ ॥
न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम् ।
ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हिते सदा ॥ ६३ ॥
राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते ।
प्रजानां परिरक्षार्थमासनञ्चात्र कारणम् ॥ ६४ ॥
डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च ।
गोब्राह्मणस्य चैवार्थे यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥६५॥
शूद्र के मृत शरीर को, नगर के दक्षिण द्वार से और ब्राह्मण-
क्षत्रिय-वैश्य के शव को क्रम से पश्चिम, उत्तर और पूर्व द्वार से
श्मशान में लेजाना चाहिए। राजा, ब्रह्मचर्य व्रत करनेवाला और
यज्ञ करनेवाला सूतकी नहीं होता। क्योंकि-राजा इन्द्र के पद पर
है। ब्रह्मचारी और याज्ञिक सदा ब्रह्मरूप ही है। जो पुरुष राजा के
यहां श्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त होता है। वह कार्य करने के निमित्त
तुरंत ही अशौच से मुक्त होता है। क्योंकि प्रजारक्षा के लिए
न्यायासन पर बैठना ही इसमें कारण है। बिना राजा की लड़ाई
में, बिजली से, राजाज्ञा फांसी से और गौ-ब्राह्मण के रक्षा के
लिए मरे हुए का और जिसको राजा अपने कार्य के लिए चाहे,
उसकी तत्काल शुद्धि होती है ॥ ६२-६५ ॥
सोमाग्न्यर्कानिलेन्द्राणां वित्तापत्योर्यमस्य च ।
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥ ६६ ॥

पांचवां अध्याय। १७७

पांचवां अध्याय। १७७
लोकेशाधिष्ठितो राजा नास्याशौचं विधीयते ।
शौचाशौचं हि मर्त्यानां लोकेशप्रभवोप्ययम् ॥ ६७ ॥
उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्महतस्य च ।
सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञस्तथाशौचमिति स्थितिः ॥ ६८ ॥
विप्रः शुध्यत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम् ।
वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रियः ॥६६॥
चन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु, इन्द्र, कुबेर, वरुण और यम इन आठ-
लोकपालों के शरीर को राजा धारण करता है । लोकपालों का
राजा के शरीर में निवास होने से उसको सूतक नहीं लगता । आ-
शौच तो मनुष्यों के लिए है । राजा तो लोकपालों के अंश से
पैदा हुआ है । जो राजा शस्त्रों से धर्मयुद्ध करके मरता है उसको
यज्ञ का फल मिलता है और आशौच तुरंत दूर हो जाता है ।
प्रेतक्रिया के अन्त में ब्राह्मण जल का, क्षत्रिय शस्त्र, वाहन का,
वैश्य हांकने का डण्डा या बागडोर का और शूद्र लकड़ी का स्पर्श
करके शुद्ध होता है। अर्थात् इन पदार्थों को आशौचान्त में जरूर
छूना चाहिए ॥ ६६-६६ ॥
एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः ।
असपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धिं निबोधत ॥ १०० ॥
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत् ।
विशुध्यति त्रिरात्रेण मातुराप्तांश्च बान्धवान् ॥१०१॥
यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाहेनैव शुध्यति ।
अनदन्नन्नमह्रैव न चेत्तस्मिन् गृहे वसेत् ॥ १०२ ॥
अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च ।
२३

१७८ मनुस्मृति ।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥१०३॥
न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृते शूद्रेण नाययेत् ।
अस्वर्ग्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता॥१०४॥
हे द्विजो ! यह सपिण्डों की मरणाशौच विधि कही गई है। अब
असपिण्डों की विधि सुनो। असपिण्ड द्विज की मृत्यु होने पर,
उसको बन्धु के तरह उठाना, दाह देना और माता के समीप के
भाई वहन आदि का भी उसी तरह कर्म करना। इसमें तीन दिन
का आशौच होता है। जो दाहादि करनेवाला मृतक के सपिण्डों
का अन्न खाता हो तो दश दिन में, और न खाता हो न उसके
मकानही में रहता हो तो एक दिन में, शुद्ध हो जाता है। अपनी
जाति, या दूसरी जाति के शव का अनुगमन करने से, सचैल
स्नान, अग्निस्पर्श और घृत खाने से शुद्धि होती है। सजातियों
के रहते शूद्रों से, ब्राह्मण शव का वाहन कभी न कराना। क्योंकि
शूद्र स्पर्श से दूषित शव की आहुति, उसको स्वर्गदायक
नहीं होती ॥ १००-१०४ ॥
ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनोवार्युपाञ्जनम् ।
वायुः कर्मार्ककालौ च शुद्धेः कर्तॄणि देहिनाम् ॥१०५॥
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सशुचिर्नमृद्वारिशुचिः शुचिः॥१०६॥
क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः ।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥१०७॥
ज्ञान, तप, अग्नि, भोजन, मिट्टी, मन, जल, लीपना, वायु,
कर्म, सूर्य और काल ये सब प्राणियों की शुद्धि करनेवाले हैं।
सब शुद्धियों में न्याय से मिले धन की शुद्धि श्रेष्ठ कही है। जो

[Page Header: पांचवां अध्याय। १७६]

[Page Header: पांचवां अध्याय। १७६]

पुरुष, न्याय से मिले धन से शुद्ध हैं वे ही शुद्ध हैं। केवल मिट्टी
जल से शुद्ध होनेवाले पवित्र नहीं माने जाते। विद्वान् क्षमा से,
यज्ञ आदि न करनेवाले दान से, पापी जप से और वेदविशारद
तप से पवित्र होते हैं ॥ १०५-१०७ ॥

मृत्तोयैः शुध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ १०६॥
एष शौचस्य वः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः ।
नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धेः शृणुत निर्णयम् ॥११०॥

अपवित्र पदार्थ मिट्टी और जल से शुद्ध होते हैं । नदी वेग से
शुद्ध होती है। मन से दूषित स्त्री रजस्वला होने से शुद्ध होती है
और ब्राह्मण त्याग से शुद्ध होता है। जल से शरीर शुद्ध होते हैं ।
मन सत्यभाषण से शुद्ध होता है । इस प्रकार शरीरशुद्धि का
निर्णय कहा है अब द्रव्य शुद्धि का निर्णय कहेंगे ॥ १०८-११० ॥

तैजसानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च ।
भस्मनाद्भिर्मृदाचैव शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः ॥ १११ ॥
निर्लेपं काञ्चनं भाण्डमद्भिरेव विशुध्यति ।
अब्जमश्ममयं चैव रजतं चानुपस्कृतम् ॥ ११२ ॥
अपामग्नेश्च संयोगाद्धैमं रौप्यं च निर्बभौ ।
तस्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ॥ ११३ ॥
ताम्रायः कांस्यरैत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च ।
शौचे यथार्हं कर्तव्यं क्षाराम्लोदकवारिभिः ॥ ११४ ॥

१८० मनुस्मृति ।
द्रव्याणां चैव सर्वेषां शुद्धिराप्लवनं स्मृतम्।
प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ॥११५॥
पदार्थ-शुद्धि।
सुवर्ण आदि तेजस पदार्थ, मणि और सब पत्थर के पदार्थों की
शुद्धि राख, जल और मिट्टी से होती है। जिस में किसी भांति का
लेप न हो ऐसा सोना का पात्र, शंख, पत्थर और चांदी का पात्र जल
से ही शुद्ध होता है। सोना और चांदी अग्नि और जल के संयोग
से उत्पन्नहुए हैं इसलिये उनकी पवित्रता अपनी योनि से ही उत्तम
होती है। तांबा, लोहा, कांस, पीतल, जस्ता और सीसा का पात्र,
खार-खटाई और जल इनमें जिससे होतके उसी से शुद्ध कर लेना
चाहिए। घी, मधु आदि को पिघलाकर छान लेने से, जमे हुए का
प्रोक्षण से और लकड़ी के पात्रको छीलने से, शुद्धिहोती है१११-११५॥
मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि।
चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिःप्रक्षालनेन तु ॥११६॥
चरूणां स्रुक्स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा।
स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ॥११७॥
अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां धान्यवाससाम्।
प्रक्षालनेन त्वल्पानामद्भिः शौचं विधीयते ॥ ११८ ॥
चैलवच्चर्मणां शुद्धिर्वैदलानां तथैव च।
शाकमूलफलानां च धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ॥ ११९॥
कौशेयाविकयो रूषैः कुतपानामरिष्टकैः।
श्रीफलैरंशु पट्टानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ १२०॥
क्षौमवच्छङ्खशृङ्गाणामस्थिदन्तमयस्य च।
शुद्धिविजानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन वा ॥ १२१ ॥

पाँचवाँ अध्याय । १८१

पाँचवाँ अध्याय । १८१
प्रोक्षणात्तृणकाष्ठं च पलालं चैव शुध्यति ।
मार्जनोपाञ्जनैर्वेश्म पुनः पाकेन मृन्मयम् ॥१२२॥
यज्ञकर्म में यज्ञ के पात्र हाथ से धोडालने से पवित्र होजाते हैं ।
चमस और ग्रहपात्र वगैरह गरम जल से धोने से पवित्र होते हैं।
चरु, स्रुच्, स्रुवा, स्फ्य, सूप, शकट, मूसल और उलूखल गरम
जल से शुद्ध होते हैं । अन्न और वस्त्र का बहुत ढेर हो तो जल
छिड़कने से पवित्र होता है और थोड़ा हो तो जल से धोने पर
पवित्र होता है। चमड़ा, चटाई आदि बांसे के पदार्थ, वस्त्रों के
समान और शाक-मूल-फलों को अन्न के समान पवित्र करना चा-
हिये । रेशमी, ऊनी वस्त्र-रेह से, कम्बल-रीठ से, सन के वस्त्र-बेल
की गूदी से, अलसी आदि के वस्त्र-सफेद सरसों से, पवित्र होते
हैं । शंख, सींग, हड्डी और हाथीदांत के पदार्थ, सफेद सरसों,
गोमूत्र और जल से पवित्र होते हैं । लकड़ी, घास वगैरह जल
छिड़कने से, घर लीप-पोत से और मिट्टी के बर्तन आग में रखने
से शुद्ध होते हैं ॥ ११६-१२२॥
मद्यैर्मूत्रैः पुरीषैर्वा ष्ठीवनैः पूयशोणितैः ।
संस्पृष्टं नैव शुद्ध्येत पुनः पाकेन मृन्मयम् ॥१२३॥
संमार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च ।
गवां च परिवासेन भूमिः शुध्यति पञ्चभिः ॥ १२४ ॥
पक्षिजग्धं गवाघ्रातमवधूतमवक्षुतम् ।
दूषितं केशकीटैश्च मृत्प्रक्षेपेण शुध्यति ॥ १२५ ॥
यावन्नापैत्य मेध्याद्गन्धो लेपश्च तत्कृतः ।
तावन्मृद्वारि वादेयं सर्वासु द्रव्यशुद्धिषु ॥ १२६ ॥
त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।

१८२ मनुस्मृति ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ १२७ ॥
आपः शुद्धा भूमिगता वैतृष्णं यासु गोर्भवेत् ।
अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ १२८ ॥
नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्ये यच्च प्रसारितम् ।
ब्रह्मचारिगतं भैक्षं नित्यं मेध्यमिति स्थितिः ॥ १२६ ।
नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनिः फलपातने ।
प्रस्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ १३० ॥
श्वभिर्हतस्य यन्मांसं शुचि तन्मनुरब्रवीत् ।
क्रव्याद्भिश्च हतस्यान्यैश्चाण्डालाद्यैश्च दस्युभिः॥१३१॥
जिस मृत्पात्र में मद्य-मल-चरबी आदि का संपर्क होजाता है
उसका पुनः अग्निसंस्कार करने पर भी वह शुद्ध नहीं होता।
झाडू देना, लीपना, जल छिड़कना, खोदना और गौ का निवास
इन पांच प्रकारों से भूमि पवित्र होती है। पक्षी का खाया, गौ का
सूंघा, पैर से दवा और जिसके ऊपर छींक दिया हो, जहां बाल या
कीड़ा पड़ा हो ऐसा स्थान मिट्टी डालने से पवित्र होता है । जब
तक पदार्थों से अपवित्र वस्तु का गंध या लेप दूर न हो तबतक
उन पदार्थों को मिट्टी और जल से शुद्ध करे। देवताओं ने ब्राह्मणों
के तीन पदार्थ पवित्र कहे हैं—एक अदृष्ट, दूसरा जो पानी से धो
लिया हो, तीसरा जिसको ब्राह्मणों ने वाणी से पवित्र कहा हो।
जिस जल में गौ की प्यास दूर होजाय, पवित्र हो, गन्ध, रस
और वर्ण से ठीक हो, ऐसा पानी भूमि में शुद्ध होता है । कारी-
गर का हाथ, जो पदार्थ बाज़ार में बेंचने को रक्खे हों और ब्रह्मचारी
की भिक्षा ये सदा पवित्र होते हैं। रतिसमय में स्त्रियों का मुख,
फल गिराने में पक्षीका चोंच, दूध निकालते समय बछड़ा का मुख
और शिकार में कुत्ता का मुख पवित्र माना गया है । कुत्ता के
मारे हुए का मांस पवित्र होता है । और मांसाहारी पशु, चाण्डाल

पांचवां अध्याय। १८३

पांचवां अध्याय। १८३
आदि के मारे जीवों का भी मांस पवित्र होता है यह मनुजी
की आज्ञा है ॥ १३०-१३१॥
ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः ।
यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्च्युताः॥१३२॥
मक्षिका विप्रुषश्छाया गौरश्वः सूर्यरश्मयः ।
रजो भूर्वायुरग्निश्च स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत् ॥ १३३॥
विण्मूत्रोत्सर्गशुद्ध्यर्थं मृद्वार्यादेयमर्थवत् ।
दैहिकानां मलानां च शुद्धिषु द्वादशस्वपि ॥ १३४ ॥
वसाशुक्रमसृङ्‌मज्जामूत्रं विड् घ्राणकर्णविद् ।
श्लेष्माश्रु दूषिकास्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥१३५॥
जो इन्द्रियां नाभि के ऊपर हैं वे सब पवित्र हैं और जो नाभि
के नीचे हैं वे सब अशुद्ध हैं। देह से निकला मल सब अपवित्र हैं।
मक्खी, मुख से निकली जल की छींट, छाया, गौ, घोड़ा, सूर्य की
किरण, धूलि, भूमि, वायु और अग्नि इन सब का स्पर्श पवित्र
होता है। देह मल की शुद्धि के लिए उतनी मिट्टी और जल लेवे
जिसमें दुर्गन्ध आदि शुद्ध होजाय। चरबी, वीर्य, रुधिर, मज्जा,
मूत्र, विष्ठा, नाक-कान का मैल, खखार, आँसू, आँखों का मैल,
और पसीना ये बारह मनुष्यदेह के मल हैं ॥ १३२-१३५ ॥
एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।
उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥१३६॥
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ।
त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनां तु चतुर्गुणम् ॥ १३७॥
कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत् ।

१८४ मनुस्मृति।
वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा ॥ १३८ ॥
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् ।
शारीरं शौचमिच्छन् हि स्त्रीशूद्रस्तु सकृत्सकृत् ॥ १३९॥
मल और मूत्र का त्याग करने पर लिङ्ग और योनि को एक
बार, गुदा को तीन बार, वाम हाथ को दशवार, फिर दोनों हाथों
को सातवार मिट्टी से धोना चाहिए । यह आचार-शौच गृहस्थों
के लिए है । ब्रह्मचारियों को इससे दूना शौच करना चाहिए । वान-
प्रस्थ आश्रमवालों को तिगुना और संन्यासियों को चौगुना क-
रना चाहिए । मल-मूत्र करने के पीछे शुद्ध होकर, आचमन करे
और नेत्र वगैरह का जल से स्पर्श करे । वेदपाठ के आरम्भ में
और भोजन के समय में आचमन करे । पहले तीनबार आचमन,
फिर दोबार मुख धोवे स्त्री और शूद्र एकवारही जल से आचमन
करें। इस प्रकार शरीरशुद्धि होती है ॥ १३६-१३९ ॥
शूद्राणां मासिकं कार्यं वपनं न्यायवर्त्तिनाम् ।
वैश्यवच्छौचकल्पश्च द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ॥ १४०॥
नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गे पतन्ति याः ।
न श्मश्रूणि गतान्यास्यान्न दन्तान्तरधिष्ठितम् ॥१४१॥
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।
भौमिकैस्ते समा ज्ञेया न तैराप्रयतो भवेत् ॥ १४२॥
उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथञ्चन ।
अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ १४३॥
वान्तो विरिक्तः स्नात्वा तु घृतप्राशनमाचरेत् ।
आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नं स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्॥१४४॥
सुप्त्वा श्रुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्वानृतानि च ।

पांचवां अध्याय । १८४

पांचवां अध्याय । १८४
पीत्वापोऽध्येष्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपिसन्॥ १४५॥
एष शौचविधिः कृत्स्नो द्रव्यशुद्धिस्तथैव च।
उक्तो वः सर्ववर्णानां स्त्रीणां धर्मान्निबोधत ॥ १४६ ॥
न्यायानुसार चलनेवाला शूद्र महीना में बाल को चनवावे, मृत्यु-
सूतक और जन्मसूतक में वैश्य के समान व्यवहार करे और
ब्राह्मण का जूॅठा अन्न खावे। मुख से शरीर पर जो छीटें पड़ती हैं
वे शरीर को जूॅठा नहीं करतीं। मुख में गया मूंछ का बाल और
दांतों की झिरियों में रहा अन्न भी जूॅठा नहीं करता । दूसरे को
कुल्ला करानेवाले के पैर पर जो छीटें पड़ती हैं उनको भूमि के जल-
बिन्दु समान मानना चाहिए। उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता । हाथ
में अन्न वगैरह हो और जूॅठे अपवित्र वस्तु का स्पर्श होजाय तो
उसको बिना भूमि में रक्खे ही, आचमन से पवित्र होजाता है।
घमन और दस्त होजाने पर, स्नान करके घी का आचमन करे,
भोजन करके कुल्ला करे और मैथुन के बाद स्नान करे तब शुद्धि
होती है। सोकर, छींककर, खाकर, थूककर, झूठ बोलकर, जल
पीकर और पढ़ने के समय पवित्र होनेपरभी आचमन करना चा-
हिए। यह सब संपूर्ण वर्णों की शौचविधि कही गई है, अब
स्त्रियों के धर्म सुनो ॥ १४०-१४६ ॥
बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता ।
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित्कार्यं गृहेष्वपि ॥ १४७ ॥
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने ।
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्॥ १४८॥
पित्रा भर्त्रा सुतैर्वापि नेच्छेद्विरहमात्मनः ।
एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले ॥ १४६ ॥
सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया ।
२४

१७६ मनुस्मृति ।
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥ १५० ॥
यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता चानुमते पितुः ।
तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत् ॥ १५१ ॥
स्त्रीधर्म ।
स्त्री, बालक, युवती या वृद्ध हो, पर उसको घर में कोई काम
स्वतन्त्रता से न करना चाहिए । स्त्री बालकपन में पिता की आज्ञा
में, जवानी में पति की आज्ञा में और पति के बाद पुत्रों की आज्ञा
में रहे परन्तु स्वतन्त्रता का कभी न भोग करे । स्त्री पिता,
पति वा पुत्रों से जुदा रहने की इच्छा न करे । अलग रहने से
पिता और पति दोनों कुलदोषी होते हैं । सदा प्रसन्नचित्त और
घर के कामों में चतुर रहे, घर के सामान को पवित्र रक्खे और
खर्च संभाल कर करे । पिता या पिता की संमति से भाई जिसके
साथ विवाह कर देय, उस पति की सेवा जीवन भर स्त्री को करनी
चाहिए और उसके मृत्यु होनेपर ब्रह्मचर्य से रहे ॥ १४७-१५१ ॥
मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः ।
प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वाम्यकारणम् ॥ १५२ ॥
अनृतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्पतिः ।
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितः ॥ १५३ ॥
विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः ।
उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिः ॥ १५४ ॥
विवाह में जो प्रजापतियज्ञ किया जाता है वह स्त्रियों के मङ्ग-
लार्थ है । और पति होने में वाग्दान ही कारण है । मन्त्रों से
विवाह-संस्कार करनेवाला पति, ऋतुकाल में या उससे भिन्न
काल में सदा स्त्री को सुख देनेवाला है । पति लोक-परलोक
दोनों में सुखदाता है। पति चाहे कुशील हो, मन माना हो, अच्छे

पांचवां अध्याय। १८७

पांचवां अध्याय। १८७
गुणों से रहित हो तोभी उसकी सेवा देवता के समान करनी
चाहिए ॥ १५२-१५४ ॥
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषितम् ।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥ १५५ ॥
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा ।
पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत् किञ्चिदप्रियम् ॥१५६॥
कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः ।
नतु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ॥ १५७ ॥
आसीतामरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी ।
यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम् ॥ १५८॥
स्त्रियों के लिए अलग यज्ञ, व्रत वा उपवास कुछ भी नहीं हैं,
उनके लिए पति की सेवा ही स्वर्ग देनेवाली है। जो पतिव्रता स्त्री
अपने पतिलोक की इच्छा करे, वह पति के जीवन में, या मरण में
उसके विरुद्ध कोई आचरण न करे । विधवा स्त्री को फूल, फल
खाकर शरीर क्षीण करना चाहिए। पति के मरने पर, व्यभिचार
के ख्याल से पर पुरुष का नाम भी न लेय । एक पति की सेवा
करनेवाली स्त्री, विधवा होने पर, अपनी मनकामनाओं को छोड़
देय, मरण तक ब्रह्मचर्य से रहे और पतिसेवा के फल की
इच्छा रक्खे ॥ १५५-१५८ ॥
अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ॥ १५९॥
मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता ।
स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥ १६० ॥
अपत्यलोभाद्या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते ।

१८८ मनुस्मृति ।
सेह निन्दामवाप्नोति पतिलोकाच्च हीयते ॥ १६१ ॥
नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे ।
न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्भर्त्तोपदिश्यते ॥ १६२ ॥
हज़ारों लाखों बालब्रह्मचारी, ब्राह्मण कुल की वृद्धि के लिए,
बिना सन्तान के ही स्वर्ग को प्राप्त भए हैं। पति की मृत्यु के बाद,
जो स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य से रहती हैं, वे पुत्रहीन भी स्वर्ग को पाती हैं,
जैसे ब्रह्मचारियों को मिला है। परन्तु जो स्त्रियाँ पुत्र की लालसा से
व्यभिचार करती हैं, वे लोक में निन्दा पाकर, अन्त में पतिलोक से
भ्रष्ट होजाती हैं। पति के सिवा दूसरे से उत्पन्न सन्तान उस स्त्री
की सन्तान नहीं गिनी जाती। पतिव्रता स्त्रियों के लिए दूसरे पति
की व्यवस्था कहीं नहीं है। अर्थात् विवाहित पति ही उसको सब
सुख और स्वर्गलोक देने में समर्थ होता है ॥ १५६-१६२ ॥
पतिं हित्वापकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते ।
निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते ॥ १६३ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ १६४ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिःसाध्वीति चोच्यते ॥ १६५ ॥
अनेन नारी वृत्तेन मनोवाग्देहसंयता ।
इहाग्र्यां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च ॥ १६६ ॥
जो स्त्री रूप, धन आदि से रहित अपने पति को छोड़कर दूसरे
पुरुष की सेवा करती है वह संसार में निन्दा पाती है और इसका
अमुक पति पहला है अमुक दूसरा है इस प्रकार लोग कहते हैं।
जो स्त्री पति को छोड़कर व्यभिचार करती है वह जगत् में निन्दा

पाँचवां अध्याय । १८६

पाँचवां अध्याय । १८६
पाती है और मरकर शृगाल की योनि में जन्म लेती है । पाप रोग
कोढ़ वगैरह से पीड़ित होती है। और जो स्त्री शरीर, वाणी और मन
को वश में रखकर पतिसेवा करती है। वह पतिलोक पाती है
और संसार में पतिव्रता कहलाती है। मन, वाणी और शरीर से
नियम और सदाचार से रहनेवाली स्त्री उत्तम कीर्ति और
स्वर्ग पाती है ॥ १६३-१६६ ॥
एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् ।
दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ॥ १६७ ॥
भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीनन्त्यकर्मणि ।
पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ॥ १६८ ॥
अनेन विधिना नित्यं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १६६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार साध्वी, सवर्णा स्त्री पति से पूर्व मर जाय तो उसका
दाह अग्निहोत्र की अग्नि और यज्ञपात्रों के साथ करना चाहिए।
पति से पूर्व स्त्रीका मरण होने पर, उसकी अन्त्येष्टि क्रियापूर्वक
दाह देकर, फिर विवाह करके, स्मार्ताग्नि या श्रौताग्नि का धारण
करना चाहिए। द्विजातियों को उक्त विधि के अनुसार, नित्य
पञ्चमहायज्ञ करना और विवाह करके आयु का दूसरा भाग
गृहस्थाश्रम में बिताना चाहिए ॥ १६७-१६६ ॥
पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।

अथ षष्ठोऽध्यायः ।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः ।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ १ ॥
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ २ ॥
संत्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ।
पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ ३ ॥
अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् ।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा ।
एतान्येव महायज्ञान्निर्वपेद्विधिपूर्वकम् ॥ ५ ॥
छठवां अध्याय ।
वानप्रस्थाश्रम-धर्म ।
इस प्रकार स्नातक द्विज गृहस्थाश्रम में विधिपूर्वक निवास
करके, शुद्ध और जितेन्द्रिय होकर वानप्रस्थाश्रम का स्वीकार करे।
जब गृहस्थ अपने शरीर की खाल ढीली, बाल पका और पुत्र के
भी पुत्र अर्थात् पौत्र देखे, तब वन में निवास करे । ग्राम का
आहार और घर का सामान छोड़कर, स्त्री को पुत्रों के पास छोड़
या साथ ही लेकर, वन यात्रा करे । अग्निहोत्र और उसकी सामग्री
साथ रखे और जितेन्द्रिय होकर निवास करे । नानाभांति के
मुनि अन्न, शाक, कन्द, फलों से पञ्चमहायज्ञ विधिपूर्वक
किया करे ॥ १-५ ॥

छठवां अध्याय । १६१

छठवां अध्याय । १६१
वसेत चर्म चीरं वा सायं स्नायात्प्रगे तथा ।
जटाश्च बिभ्रियान्नित्यं श्मश्रुलोमनखानि च ॥ ६ ॥
यद्भक्ष्यं स्यात्ततो दद्याद्बलिं भिक्षां च शक्तितः ।
अम्मूलफलभिक्षाभिरर्चयेदाश्रमागतान् ॥ ७ ॥
मृगचर्म या वल्कल धारण करे और प्रातःकाल-सायंकाल
दोनों समय स्नान करे। जटा, दाढ़ी मूंछ, लोम और नख का
सदा धारण करे। अपने भोजनार्थ जो कुछ हो उसमें से बलि और
भिक्षा देवे और आश्रम में आए मनुष्यों का जल, कन्द, फल और
भिक्षा से सत्कार करे ॥ ६-७ ॥
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तो मैत्रः समाहितः ।
दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ८ ॥
वैतानिकं च जुहुयादग्निहोत्रं यथाविधि ।
दर्शमस्कन्दयन्पर्व पौर्णमासं च योगतः ॥ ९ ॥
ऋक्षेष्ट्याग्रायणं चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत् ।
उत्तरायणं च क्रमशॊ दक्षस्यायनमेव च ॥ १० ॥
वासन्तशारदैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।
पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत्पृथक् ॥ ११ ॥
देवताभ्यस्तु तद्हुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः ।
शेषमात्मनि युञ्जीत लवणं च स्वयंकृतम् ॥ १२ ॥
स्थलजौदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च ।
मेध्यवृक्षोद्भवान्यद्यात्स्नेहांश्च फलसम्भवान् ॥ १३ ॥
वर्जयेन्मधुमांसं च भौमानि कवकानि च ।

१६२ मनुस्मृति ।
भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मान्तकफलानि च ॥ १४ ॥
सदा वेदपाठ में लगा रहे, इन्द्रियाँ वश में रक्खे, सब से मित्रता
रक्खे, मनको स्थिर रक्खे, सदा दान देवे, किसीका दान न लेवे
और सब प्राणियों पर दयादृष्टि रक्खे । वैतानिक अग्निहोत्र सदा
करे, और अमावस—पूर्णिमा को इष्टि भी किया करे । नक्षत्रयाग,
चातुर्मास्य, उत्तरायण और दक्षिणायन याग को क्रम से करे । व-
सन्त और शरद् ऋतु के मुनि अन्नों को खुद लाकर, विधि से चरु
और पुरोडाश बनाकर याग करे । इस पवित्र हवि से देव होम
करके, बाक़ी खुद खा लेवै । भूमि और जल में पैदा होनेवाले शाक,
पवित्र वृक्षों के फूल, फल, कंद और फलों से निकला तेल आदि
खाना । मद्य, मांस, कुकुरमुत्ता, सहँजन, लहसोड़ा वगैरह
न खाना ॥ ८-१४ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि मुन्यन्नं पूर्वसंचितम् ।
जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ १५ ॥
कुआर के महीना में, पहले इकट्ठा किया हुआ मुनि अन्न को
अलग कर दे, नया संग्रह करले और पुराने कपड़े, शाक, कन्द, फल
को भी अलग करदेवे ॥ १५ ॥
न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित् ।
न ग्रामजातान्यार्त्तोऽपि मूलानि च फलानि च ॥ १६ ॥
अग्निपक्काशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा ।
अश्मकुट्टो भवेद्वापि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ॥ १७ ॥
सद्यःप्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा ।
षण्मासनिचयो वा स्यात्समानिचय एव वा ॥ १८ ॥
नक्तं चान्नं समश्नीयाद्दिवा वाहृत्य शक्तितः ।
चतुर्थकालिको वा स्यात्स्याद्वाप्यष्टमकालिकः ॥ १९ ॥

छठवां अध्याय। १६३

छठवां अध्याय। १६३
खेत का अन्न दूसरे का छोड़ा हुआ भी और गाँव का फल, फूल,
शाक आदि दुःखी होनेपर भी न खावे। मुनि अन्नों को आग में
पकाकर खाय, या ऋतु के पके फल खाय, पत्थर से पीसकर
खाय या दांतों से चबाकर खाय। एक दिन के योग्य या एक
महीना के या छः महीना के अथवा एक साल के निर्वाह लायक
अन्न का संग्रह करे। अन्न लाकर रात या दिन में एकबार भोजन
करे या एक दिन उपवास करके दूसरे दिन सायंकाल या तीन
दिन उपवास करके चौथे दिन सायंकाल भोजन करे॥ १६-१९॥
चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्लकृष्णे च वर्तयेत्।
पक्षात्तयोर्वाप्यश्नीयाद्यवागूं कथितां सकृत् ॥ २०॥
पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत्सदा ।
कालपक्कैः स्वयंशीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ २१ ॥
भूमौ विपरिवर्तेत तिष्ठेद्वा प्रपदैर्दिनम् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत्सवनेषूपयन्नपः ॥ २२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्याद्वर्षास्वभ्रावकाशिकः ।
आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २३ ॥
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष में चान्द्रायण व्रत की विधि से रहे
अथवा पूर्णा और अमा को एक बार उबाली हुई यवागू खाय।
अथवा ऋतु में पके और स्वयं गिरे फल, मूल, फूलों से ही नि-
र्वाह करे। भूमि पर बैठा रहे या दिनभर पैरों से खड़ा रहे, अपने
स्थान और आसन में विहार करे। तीनों काल में स्नान किया करे।
गर्मी में पञ्चाग्नि सेवन करे। वर्षा में खुले स्थान में रहे, शीतकाल
में गीला कपड़ा धारण करे, इस प्रकार तपस्या को धीरे धीरे
बढ़ाता रहे ॥ २०-२३ ॥
उपस्पृशंस्त्रिषवणं पितॄन्देवांच्च तर्पयेत् ।
२५