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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 649 में से

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पृष्ठ 314

१७४ मनुस्मृति ।
अपने समानोदक का मरण और पुत्र का जन्म सुनकर सचैल
स्नान से शुद्धि होती है । सगोत्र बालक का और असपिण्ड मामा,
साला आदि का विदेश में मृत्यु सुनकर, सचैल स्नान से शुद्धि
होती है । यदि दशाह के भीतर फिर कोई पैदा हो या मरे, तो
ब्राह्मण दश दिन पूरे होने तक शुद्ध न होगा । आचार्य के मरने में,
शिष्य को तीन दिन आशौच रहता है और आचार्य के पुत्र या
स्त्री के मरण में एक दिन का होता है ॥ ७६-८० ॥
श्रोत्रिये तूपसंपन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
मातुले पक्षिणीं रात्रिं शिष्यर्त्विग्बान्धवेषु च ॥ ८१ ॥
प्रेते राजनि सज्ज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः ।
अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरौ ॥ ८२ ॥
शुद्ध्येद्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति ॥ ८३ ॥
श्रोत्रिय की मृत्यु में तीन दिन, मामा, शिष्य, ऋत्विक् और
बान्धवों की मृत्यु में दिन-रात आशौच रहता है । जिस राजा के
देश में निवास हो उसकी मृत्यु, दिन में होने पर सूर्यास्त तक
और रात में रातभर, सूतक रहता है । अश्रोत्रिय ब्राह्मण, वेदपाठी
और गुरु के मरण में, एक दिन का आशौच होता है । ब्राह्मण दश
दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक
मास में शुद्ध होता है ॥ ८१-८३ ॥
न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्निषु क्रियाः ।
न च तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ ८४ ॥
दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।
शवं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ॥ ८५ ॥