मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ मनुस्मृति ।
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥ १५० ॥
यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता चानुमते पितुः ।
तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत् ॥ १५१ ॥
स्त्रीधर्म ।
स्त्री, बालक, युवती या वृद्ध हो, पर उसको घर में कोई काम
स्वतन्त्रता से न करना चाहिए । स्त्री बालकपन में पिता की आज्ञा
में, जवानी में पति की आज्ञा में और पति के बाद पुत्रों की आज्ञा
में रहे परन्तु स्वतन्त्रता का कभी न भोग करे । स्त्री पिता,
पति वा पुत्रों से जुदा रहने की इच्छा न करे । अलग रहने से
पिता और पति दोनों कुलदोषी होते हैं । सदा प्रसन्नचित्त और
घर के कामों में चतुर रहे, घर के सामान को पवित्र रक्खे और
खर्च संभाल कर करे । पिता या पिता की संमति से भाई जिसके
साथ विवाह कर देय, उस पति की सेवा जीवन भर स्त्री को करनी
चाहिए और उसके मृत्यु होनेपर ब्रह्मचर्य से रहे ॥ १४७-१५१ ॥
मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः ।
प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वाम्यकारणम् ॥ १५२ ॥
अनृतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्पतिः ।
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितः ॥ १५३ ॥
विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः ।
उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिः ॥ १५४ ॥
विवाह में जो प्रजापतियज्ञ किया जाता है वह स्त्रियों के मङ्ग-
लार्थ है । और पति होने में वाग्दान ही कारण है । मन्त्रों से
विवाह-संस्कार करनेवाला पति, ऋतुकाल में या उससे भिन्न
काल में सदा स्त्री को सुख देनेवाला है । पति लोक-परलोक
दोनों में सुखदाता है। पति चाहे कुशील हो, मन माना हो, अच्छे