मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चौथा अध्याय । १५७
चौथा अध्याय । १५७
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथामयदक्षिणाम् ॥ २४७ ॥
आहृतामभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् ।
मेने प्रजापतिर्ग्राह्यामपि दुष्कृतकर्मणः ॥ २४८ ॥
नाश्नन्ति पितरस्तस्य दश वर्षाणि पञ्च च ।
न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ २४६ ॥
अच्छे पुरुषों के साथ सम्बन्ध करना और नीचों से सम्बन्ध
छोड़ता हुआ पुरुष श्रेष्ठता पाता है, नहीं तो शूद्र के समान होजाता
है। कर्तव्यमें अचल, कोमल स्वभाव, इन्द्रियोंको वश रखकर, दुराचार
से बचकर, हिंसा न करके पुरुष स्वर्ग को जीत लेता है। समिधा,
जल, कन्द, फल, पक्वान्न, कच्चा अन्न, मधु और अभयदान इन
पदार्थों में कोई भी वस्तु विना मांगे आजाय तो उसको स्वीकार
करलेना चाहिए। विना प्रेरणा के यदि दुराचारी भी भिक्षा ले आवे
तो उसे ग्रहण करलेना चाहिए यह प्रजापति की आज्ञा है। जो उस
भिक्षा का अपमान करता है, उसके पितर पन्द्रह वर्ष तक उसकी
श्राद्ध नहीं लेते और अग्नि हव्य नहीं ग्रहण करता ॥ २४५-२४६ ॥
शय्यागृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि ।
धाना मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत् ॥ २५० ॥
गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन् ।
सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ २५१ ॥
गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वातैर्गृहे वसन् ।
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ २५२॥
पलँग, घर, कुश, सुगंध की चीज़, जल, फूल, मणि, दही, भुना
अन्न, मछली, दूध, मांस और शाक यह कोई देने आवे तो लौटाना
न चाहिए। अतिथि देवता गुरु आदि के सत्कार की सामग्री न
होय तो उसे मांग भी लेवे, पर अपने काम में न लगाना चाहिए।
१५८ मनुस्मृति ।
माता, पिता, गुरु न वर्तमान हों या उनसे जुदा रहता हो तो ब्राह्मण
अपनी जीविका के लिए सत्पुरुषों से दान ले लेवे ॥ २५०-२५२ ॥
आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ ।
एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥ २५३॥
यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशश्च चिकीर्षितम् ।
यथा चोपचरेदेनं तथात्मानं निवेदयेत् ॥ २५४ ॥
योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते ।
स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः ।
तां तु यःस्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥
अपना साथी, कुलपरम्परा का मित्र, अहीर, दास, नापित और
अपने को अर्पण करनेवाले शूद्र का अन्न ग्रहण करना चाहिए ।
आत्मसमर्पण करनेवाला अपना कुल, देश, जो काम करके पास
रहना चाहे और जैसे सेवा करना चाहे-सब निवेदन करे । जो
अपनी असलियत छिपाकर सज्जनों के सामने दूसरे ढंग का बनता
है वह महापापी, चोर, अपने को छिपानेवाला माना जाता है,
सब अर्थ वाणी में रहते हैं, उनका मूल भी वाणी ही है और वाणी
में से निकले हैं, ऐसी वाणी को जो चुराता है अर्थात् झूठ बोलता
है वह सब वस्तुओं की चोरी करता है ॥ २५३-२५६ ॥
महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि ।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमाश्रितः ॥ २५७॥
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनः ।
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ २५८ ॥
एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती ।
चौथा अध्याय । १५६
चौथा अध्याय । १५६
स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ॥ २५६ ॥
अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन् वेदशास्त्रवित् ।
व्यपेत कल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६० ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
चतुर्थोऽध्यायः ॥
महर्षि, पितर और देवताओं के ऋण से गृहस्थ को छुटकारा
लेकर और पुत्र के ऊपर घर का भार छोड़कर उदासीन वृत्ति से
जीवन बिताना चाहिए । एकान्त में अकेला बैठकर, अपना हित
चिन्तन करना। एकान्त में विचार करने से पुरुष मोक्ष पाता है।
इस प्रकार गृहस्थ ब्राह्मण की जीवननिर्वाह की रीति कही है और
स्नातक के आचरण का हाल भी कहा गया है । इस प्रकार के
आचरण को करता हुआ ब्राह्मण, निष्पाप होकर ब्रह्मलोक में पूजित
होता है ॥ २५७-२६० ॥
चौथा अध्याय पूरा हुआ।
अथ पञ्चमोऽध्यायः ।
श्रुत्वैतादृषयो धर्मान् स्नातकस्य यथोदितान् ।
इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ १ ॥
एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।
कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ २ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ३ ॥
अनभ्यासेन वेदानांमाचारस्य च वर्जनात् ।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ४ ॥
पांचवां अध्याय ।
भक्ष्याभक्ष्य-व्यवस्था ।
इस प्रकार स्नातक ब्राह्मणों के धर्मों को सुनकर, अग्नि से
उत्पन्न * महात्मा भृगु से ऋषियों ने कहा—हे प्रभो ! इन विधियों
से धर्माचरण करनेवाले ब्राह्मणों को मृत्यु कैसे मार सकता है । यह
सुनकर, मनुपुत्र भृगु ने कहा—वेदाभ्यास न करना, सदाचार
को छोड़ना सदा आलसी रहना और अपवित्र भोजन से मृत्यु
मार लेता है ॥ १-४ ॥
- पहले अध्याय में, दश प्रजापतियों की सृष्टि में मनु से भृगुसृष्टि कही है । यहाँ
कल्पभेद से, अग्नि से उत्पन्न भृगु को लिखा है । मनु का अग्नि भी नाम कहीं
लिखा मिलता है । कहीं प्रजापति नाम से भी लेख है ।
पांचवां अध्याय । १६१
पांचवां अध्याय । १६१
लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च ।
अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च ॥ ५ ॥
लोहितान्वृक्षनिर्यासान् व्रश्चनप्रभवांस्तथा ।
शेलुं गव्यं च पेयूषं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ६ ॥
वृथा कृसरसंयावं पायसापूपमेव च ।
अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च ॥ ७ ॥
लहसुन, प्याज़, भूपुष्प-कुकुरमुत्ता और दूसरे अपवित्र खाद
से पैदा होनेवाले पदार्थ द्विजों को न खाना चाहिए । वृक्षों से
आप ही निकला, या काटने से निकला लाल गोंद, गूलर, लह-
सोड़ा और दश दिन के भीतर में गौ के दूध का पाक इन पदार्थों
को ज़रूर छोड़ना चाहिए । तिल, चावल की खिचड़ी, दूध, गुड़,
आटा की लपसी, दूध का पाक, मालपुआ, बिना संस्कार का मांस,
देवनििमत्त बना अन्न, यज्ञ का हविष्य इन पदार्थों को देवार्पण
बिना किये खाना न चाहिए ॥ ५-७ ॥
अनिर्दशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमैकशफं तथा ।
आाविकं सन्धिनीक्षीरं विवत्सायाश्च गोःपयः ॥ ८ ॥
आरण्यानां च सर्वेषां मृगाणां माहिषं विना ।
स्त्रीक्षीरं चैव वर्ज्यानि सर्वशुक्तानि चैव हि ॥ ९ ॥
दधि भक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् ।
यानि चैवाभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः ॥ १० ॥
क्रव्यादाञ्छकुनान्सर्वांस्तथा ग्रामनिवासिनः ।
अनिर्दिष्टांश्चैकशफांटिट्टिभं च विवर्जयेत् ॥ ११ ॥
कलविंकं प्लवं हंसं चक्राङ्गं ग्रामकुक्कुटम् ।
२१
प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान् ।
१६२ मनुस्मृति ।
सारसं रज्जुवालं च दात्यूहं शुकसारिके ॥ १२ ॥
प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान् ।
निमज्जतश्च मत्स्यादान् शौनं वल्लूरमेव च ॥ १३ ॥
बकं चैव बलाकां च काकोलं खंजरीटकम् ।
मत्स्यादान् विड्वराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः ॥१४॥
यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते ।
मत्स्यादःसर्वमांसादस्तस्मान्मत्स्यान्विवर्जयेत्॥१५॥
दश दिन के भीतर ब्याई गौ का दूध, ऊंटनी का दूध, एक खुर
वाली गधी, घोड़ी आदि का दूध, भेंड़ का दूध, गर्भवती गौका
दूध और जिसका बच्चा मरगया हो उस गौ का दूध न पीना चा-
हिए। भैंस को छोड़कर, सब जंगली पशुओं का दूध और स्त्री का
दूध और बिगड़कर खट्टा हुआ पदार्थ न खाना। खट्टे पदार्थों में
दही, मट्ठा, अच्छे फूल फल के अर्क गुलाब, केवड़ा आदि खाना
पीना चाहिए। कच्चा मांस खानेवाले पक्षी, शकुनवाले पक्षी, गांव-
वासी पक्षी, अभक्ष्य पक्षी, एक खुरवाले ऊंट, घोड़ा और टिड्डी ये
सब अभक्ष्य हैं। बतक, हंस, चकवा, गांव का मुरग़ा, सारस, जल-
काक, पपीहा, तोता और मैना ये सब अभक्ष्य हैं। चोंच से मार
कर खानेवाले, पैरों में जालवाले (बाज़ वगैरह) कोयल, नखसे
फाड़कर खानेवाले, जल में गोता लगाकर मछली खानेवाले,
कसाईखाने का मांस और सूखा मांस ये सब अभक्ष्य हैं। बगला,
बतक, काला कौआ, खंजन, मछली खानेवाले पक्षी, सुअर और
सब भांति की मछली ये सब अभक्ष्य हैं। जो जिसका मांस खाता
है वह उस मांस का खानेवाला कहलाता है। पर मछली खाने
वाला सब का मांस खानेवाला कहा जाता है। इस लिए मछली
न खाना चाहिए। क्योंकि मछली सबका मांस खाती है ॥८-१५॥
पाठीनरोहितावाद्यौ नियुक्तौ हव्यकव्ययोः ।
पाँचवां अध्याय । १६३
पाँचवां अध्याय । १६३
राजीवान् सिंहतुण्डांश्च सशल्कांश्चैव सर्वशः ॥१६॥
न भक्षयेदेकचरानज्ञातांश्च मृगद्विजान् ।
भक्ष्येष्वपि समुद्दिष्टान्सर्वान्पञ्चनखांस्तथा ॥ १७॥
श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा ।
भक्ष्यान्पञ्चनखेष्वाहुरनुष्ट्रांश्चैकतोदतः ॥ १८ ॥
छत्राकं विड्वराहं च लशुनं ग्रामकुक्कुटम् ।
पलाण्डुं गृञ्जनं चैव मत्या जग्ध्वा पतेद्विजः ॥ १९ ॥
अमत्यैतानि षड् जग्ध्वा कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ।
यतिचान्द्रायणं वापि शेषेषूपवसेदहः ॥ २० ॥
पढ़न, रोहू आदि सब मछलियां हव्य-कव्य में ग्रहण के लायक
होती हैं। राजीव सिंहतुण्ड और मोटी खाल की मछली भी ग्राह्य
हैं। अकेले घूमनेवाले और अनजान पक्षी, मृग अभक्ष्य हैं और जो
भक्ष्य पांच नखवाले पशु हैं उनमें भी सब भक्ष्य नहीं हैं । साही,
शल्यक, गोधा, गैंडा, कछुआ, खरगोश ये पांच नखवालों में भक्ष्य
हैं। और ऊंट को छोड़ कर, एक दांतवाले दूसरे पांच नखवाले भी
भक्ष्य हैं। धरती का फूल, गांव का सुअर, लहसुन, गांव का मुरगा,
शलगम, प्याज़ इनको जानकर खानेवाला द्विज पतित होजाता
है। और ये छ पदार्थ अनजान में खालेय तो सान्तपननामक वा
यतिचान्द्रायणनामक प्रायश्चित्त करे । और लाल गोंद आदि खा-
लेय तो एक दिन उपवास करे ॥ १६-२० ॥
संवत्सरस्यैकमपि चरेत्कृच्छ्रं द्विजोत्तमः ।
अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ २१ ॥
यज्ञार्थं ब्राह्मणैर्वध्याः प्रशस्ता मृगपक्षिणः ।
भृत्यानां चैव वृत्त्यर्थमगस्त्यो ह्यचरत्पुरा ॥ २२ ॥
१६४ मनुस्मृति ।
विना जाने कोई अभक्ष्य पदार्थ खालेय तो उसकी शुद्धि के
लिए ब्राह्मण को एक वर्ष में एक कृच्छ्रव्रत अवश्य करना चाहिए।
और जानकर खालिया हो तो विशेष प्रायश्चित्त करना उचित है।
आपत्ति, दुर्भिक्ष के समय में अपने कर्म की पूर्णता के लिए
ब्राह्मणों को उत्तम मृग—पक्षियों का वध करना चाहिए। या
जिनका पालन भार अपने ऊपर हो उनकी तृप्ति के लिए मृग-
पक्षियों को मारना चाहिए क्योंकि पूर्व समय में अगस्त्य मुनि ने
ऐसा काम किया था ॥ २१-२२ ॥
बभूवुर्हि पुरोडाशा भक्ष्याणां मृगपक्षिणाम् ।
पुराणेष्वपि यज्ञेषु ब्रह्मक्षत्रसवेषु च ॥ २३ ॥
यत्किञ्चित्स्नेहसंयुक्तं भक्ष्यं भोज्यमगर्हितम् ।
तत्पर्युषितमप्याद्यं हविःशेषं च यद्भवेत् ॥ २४ ॥
चिरस्थितमपि त्वाद्यमस्नेहाक्तं द्विजातिभिः ।
यवगोधूमजं सर्वं पयसश्चैव विक्रियाः ॥ २५ ॥
एतदुक्तं द्विजातीनां भक्ष्याभक्ष्यमशेषतः ।
मांसस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणवर्जने ॥ २६ ॥
प्राचीन काल में ऋषि, ब्राह्मण और क्षत्रियों के यज्ञ में भक्ष्य
मृग पक्षियों के पुरोडाश हुआ करते थे। जो भक्ष्य, भोज्य पदार्थ
निन्दित नहीं हैं, वे बासी होने पर भी घी आदि मिला हो तो खाने
लायक हैं और जो हवन शेष है वह भी खाने योग्य होता है। जौ,
गेहूं के पदार्थ, दूध के पदार्थ अधिक दिन के बने हों पर घी से तर
न हों तो उनको भी न खाना चाहिए। इस प्रकार द्विजों के भक्ष्य
और अभक्ष्य सब पदार्थ कहे गये हैं अब मांसभक्षण और उसके
त्याग की विधि कहते हैं ॥ २३-२६ ॥
प्रोक्षितं भक्षयेन्मांसं ब्राह्मणानां च काम्यया ।
यथाविधि नियुक्तस्तु प्राणानामेव चात्यये ॥ २७ ॥
पांचवां अध्याय । १६५
पांचवां अध्याय । १६५
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं प्रजापतिरकल्पयत् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ २८ ॥
चराणामन्नमचरा दंष्ट्रिणामप्यदंष्ट्रिणः ।
अहस्ताश्च सहस्तानां शूराणां चैव भीरवः ॥ २६ ॥
मांसभक्षण-व्यवस्था।
यज्ञ में वेदमन्त्रों से प्रोक्षण किया मांस खाना और ब्राह्मणों की
इच्छा से हुआ हो तो खाना। देवकार्य और पितृकार्य में, निमन्त्रण
होने पर या प्राण जाने का भय हो तो खाना उचित है । ब्रह्मा ने
इस जगत् के प्राण को अन्नरूप से बनाया है। इसलिए चराचर
जगत् सब प्राण का भोजन है। स्थावर, घास आदि जङ्गमों का
भोजन है, विना दाढ़वाले दाढ़वालों का भोजन है। विना हाथवाले,
हाथवालों का जैसे मनुष्यों का मछली भोजन है और मृग आदि
सिंहादि के भोजन हैं ॥ २७-२६ ॥
नात्तादुष्यत्यदन्नद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि ।
धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च ॥ ३० ॥
यज्ञाय जग्धिर्मांसस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः ।
अतोऽन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३१ ॥
क्रीत्वा स्वयं वाप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा ।
देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दोषभाक् ॥३२॥
नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः ।
जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रेत्य तैरद्यतेऽवशः ॥ ३३ ॥
न तादृशं भवत्येनो मृगहन्तुर्धनार्थिनः ।
यादृशं भवति प्रेत्य वृथा मांसानि खादतः ॥ ३४ ॥
१६६ मनुस्मृति ।
नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः ।
स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥ ३५ ॥
असंस्कृतान्पशून्मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन ।
मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥ ३६ ॥
कुर्याद्घृतपशुं सङ्गे कुर्यात् पिष्टपशुं तथा ।
न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ॥ ३७ ॥
जो भक्षण के योग्य प्राणी हैं उनको प्रतिदिन खाने से, खाने
वाला दोषभागी नहीं होता । क्योंकि, भक्षण करने योग्य प्राणी
और उनके भक्षकों को, परमात्मा ने ही रचा है । यज्ञ के निमित्त
से मांसभक्षण दैवी विधि कहलाती है। लेकिन देवार्पण के बिना
मांस खाना राक्षसविधि कही जाती है । मोल लेकर, या आप
ही मारकर, या दूसरे ने लाकर दिया हो, ऐसे मांस को देवता
और पितरों को अर्पण करके खाने से दोष नहीं होता । आपत्ति-
काल न हो तो विधि को जाननेवाला द्विज कभी मांसभक्षण
अविधि से न करे—क्योंकि बिना विधि से जो मांसभक्षण करता
है, उसके मरने पर उसका मांस वे प्राणी खाते हैं । रोज़गार के
लिए जो पशु मारते हैं उनको वैसा पाप नहीं होता जैसा बिना
देवता और पितरों को चढ़ाये मांस खानेवाले को होता है। श्राद्ध
आदि में विधि से जो मांसभक्षण नहीं करता, वह मरके इक्कीस
वार पशुयोनि में जन्म लेता है। मन्त्रों से जिनका संस्कार नहीं
हुआ उन पशुओं को ब्राह्मण कभी न खावे । पर सनातन वेद
विधि के अनुसार संस्कार किया गया हो तो अवश्य खोवे । मांस
खाने ही की इच्छा हो तो घृत का पशु या मैदा का पशु बनाकर
विधि से मांस खावे । पर देव निमित्त के बिना पशु मारने की
इच्छा कभी न करना चाहिए ॥ ३०-३७ ॥
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् ।
वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥ ३८ ॥
पाँचवाँ अध्याय । १६७
पाँचवाँ अध्याय । १६७
यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यज्ञस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥ ३९ ॥
ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यञ्चः पक्षिणस्तथा ।
यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्सृतीः पुनः ॥ ४० ॥
मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि ।
अत्रैव पशवो हिंस्या नान्यत्रेत्यब्रवीन्मनुः ॥ ४१ ॥
विना देवनििमित्त के जो वृथा पशुहिंसा करता है, वह मरने
पर जितने पशुरोम हैं, उतने जन्मों तक उस पशु के हाथ से मारा
जाता है । ब्रह्मा ने स्वयं ही यज्ञ के लिए पशुओं को बनाया है और
सब यज्ञ जगत् के कल्याण के लिए हैं, इसलिए यज्ञ में जो पशुवध
होता है वह वध नहीं है । ओषधि, पशु, वृक्ष, पक्षी आदि यज्ञ
के अर्थ मारे जाने से उत्तम गति को पाते हैं । मधुपर्क, यज्ञ, श्राद्ध
और दैवकर्म में पशुवध करना, दूसरे कामों में न करना यह मनु
जी की आज्ञा है ॥ ३८-४१ ॥
एष्वर्थेषु पशून् हिंसन् वेदतत्त्वार्थविद्द्विजः ।
आत्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम् ॥ ४२ ॥
गृहे गुरावरण्ये वा निवसन्नातवान् द्विजः ।
नावेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत् ॥ ४३ ॥
या वेदविहिता हिंसा नियताऽस्मिंश्चराचरे ।
अहिंसामेव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ ॥ ४४ ॥
योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥ ४५ ॥
वेदविशारद् द्विज, मधुपर्क आदि में पशुवध करके अपनी
आत्मा और पशु को उत्तम गति को पहुँचाता है । गृहस्थ, ब्रह्मचर्य
या वानप्रस्थ आश्रम में रहकर, द्विज को वेदविरुद्ध हिंसा कभी
आपत्ति में भी न करनी चाहिए। इस जगत् में जो वेदानुसार हिंसा
नियत है उसको हिंसा न माननी चाहिए। क्योंकि धर्म वेद से ही
प्रकट हुआ है। जो पुरुष अहिंसक प्राणियों को अपने सुख की
इच्छा से मारता है, वह जीता या मरा हुआ कहीं सुख नहीं
पाता ॥ ४२-४५ ॥
यो बन्धनवधक्लेशान्प्राणिनां न चिकीर्षति ।
स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ४६ ॥
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च ।
तदेवाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किंचन ॥ ४७ ॥
नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्॥ ४८ ॥
समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् ।
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ॥ ४९ ॥
जो पुरुष प्राणियों को बांधने या मारने का दुःख नहीं देना
चाहता, वह सबका हित चाहनेवाला पुरुष अनन्त सुख पाता है।
ऐसा पुरुष जो कुछ सोचता है, जो कुछ करता है और जिसमें
अभिलाषा रखता है वह सब सहज में ही उसको प्राप्त होजाता है।
प्राणियों की हिंसा बिना मांस उत्पन्न नहीं होता और प्राणियों के
वध से स्वर्ग भी नहीं मिलता, इसलिए मांस खाना छोड़ देना
चाहिए। मांस की उत्पत्ति और प्राणियों के वध आदि कर्मों को
देखकर सब प्रकार के मांस भक्षण से चित्त को हटा लेना
चाहिए ॥ ४६-४९ ॥
न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत् ।
स लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते ॥५०॥
पांचवां अध्याय । १६६
पांचवां अध्याय । १६६
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५१ ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्यपितॄन्देवांस्ततोऽन्योनास्त्यपुण्यकृत्॥५२॥
जो विधि छोड़कर, पिशाच के भांति मांस भक्षण नहीं करता
वह सबका प्रिय होजाता है। और रोगों से दुःखी नहीं होता है।
जिसकी राय से मारा जाता है, अङ्गों को काटकर अलग अलग
करनेवाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला,
परोसनेवाला और खानेवाला ये सब घातक-मारनेवाले होते हैं ।
जो पुरुष, देवता और पितरों का पूजन बिना किये, दूसरे के मांस
से अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर कोई पाप करने
वाला नहीं है ॥ ४६-५२ ॥
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥ ५३ ॥
फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नानां च भोजनैः ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ॥ ५४ ॥
मांसभक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्मयहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५५ ॥
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ५६ ॥
जो सौ वर्ष तक प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जन्म
भर मांस भक्षण नहीं करता, इन दोनों को समान पुण्य फल मि-
लता है। पवित्र फल, मूल और मुनि अन्नों के खाने से वह फल
नहीं मिलता जो मांस छोड़ने से प्राप्त होता है। इस लोक में जिस
२२
का मांस भक्षण मैं करता हूं 'सः' अर्थात् वह परलोक में 'मां'
अर्थात् मेरा भक्षण करेगा। यही 'मांस' शब्द का अर्थ विद्वानों
ने कहा है। मांस खाना, मद्य पीना और मैथुन इन कामों में मनुष्यों
की प्रवृत्ति स्वाभाविक हुआ करती है, इस कारण इनमें दोष नहीं
है। परन्तु इनको छोड़ देने से बड़ा पुण्य होता है ॥ ५३-५६ ॥
प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च।
चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ॥ ५७ ॥
दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते ।
अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥ ५८ ॥
दशाशं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
अर्वाक् संचयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ ५६ ॥
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते ।
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥ ६० ॥
आशौच-व्यवस्था ।
अब चारों वर्णों की सूतक व्यवस्था और धातु पात्रों की शुद्धि
को क्रम से कहते हैं। दांत निकल आये हों, या दांत निकलने के बाद
और चूड़ा कर्म होजाने पर मृत्यु होने से सब बान्धवों को अशुद्धि
और सूतक लगता है। सपिण्ड अर्थात् सात पुस्त तक मरणाशौच
दश दिन तक रहता है। किसी को अस्थि संचयन के पूर्व ॥५७-६०॥
यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ॥ ६१ ॥
सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम्।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ ६२ ॥
निरस्य तु पुमान् शुक्रमुपस्पृश्यैव शुध्यति ।
पांचवां अध्याय । १७१
पांचवां अध्याय । १७१
बैजिकादभिसंबन्धादनुरुन्ध्यादघं त्र्यहम् ॥ ६३ ॥
अह्ना चैकेन रात्र्या च त्रिरात्रैरेव च त्रिभिः ।
शवस्पृशो विशुध्यन्ति त्र्यहादुदकदायिनः ॥ ६४ ॥
जैसा मरने पर सपिण्डों को यह आशौच कहा है, वैसा ही पुत्र
आदि उत्पन्न होने में भी अच्छी शुद्धता की इच्छा करनेवालों को
आशौच होता है। मरण आशौच सब सपिण्डों को और जन्मा-
शौच माता पिता को ही होता है। उसमें भी पिता स्नान करने से
शुद्ध होता है। माता को ही सूतक रहता है। पुरुष जानकर वीर्य-
पात करे तो स्नान से शुद्ध होता है । और दूसरी स्त्री में
संतान पैदा करने पर उसको तीन दिन तक आशौच रहता है।
शव (मुर्दा) को छूनेवाले दश दिन में शुद्ध होते हैं और समानो-
दक अर्थात् सात पीढ़ी से ऊपर के पुरुष तीनदिन में शुद्ध
होते हैं ॥ ६१-६४ ॥
गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् ।
प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुध्यति ॥ ६५ ॥
रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्राने विशुध्यति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥ ६६ ॥
नृणामकृतचूड़ानां विशुद्धिर्नैशिकी स्मृता ।
निर्वृत्तचूडकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ६७ ॥
ऊनद्विवार्षिकं प्रेतं निदध्युर्बान्धवा बहिः ।
अलंकृत्य शुचौ भूमावस्थिसंचयनादृते ॥ ६८ ॥
शिष्य, अपने गुरु की अन्त्येष्टि करता हुआ, शव उठाने वालों के
साथ दशवें दिन शुद्ध होता है। जितने मास का गर्भपात हो उतनी
ही रात्रि में स्त्री शुद्ध होती है। और रजस्वला स्त्री रजंबंद होनेपर
स्नान करके शुद्ध होती है। जिन बालकों का चूड़ाकर्म नहीं हुआ
१७२ मनुस्मृति ।
उनके मरने से एक दिन में और चूड़ा कर्म होजाने पर तीन दिन
में, सपिण्ड पुरुष की शुद्धि होती है। दो वर्ष से कम उमर
का बालक मर जाय तो उसको पुष्पमाला, चंदन आदि से
भूषित करके, नगर के बाहर पवित्र भूमि में गाड़ देवे और उसका
अस्थि संचयन न करे ॥ ६५-६८ ॥
नास्य कार्योऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया ।
अरण्ये काष्ठवत्त्यक्त्वा क्षपेयुस्त्र्यहमेव च ॥ ६९ ॥
नात्रिवर्षस्य कर्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया ।
जातदन्तस्य वा कुर्युर्नाम्नि वापि कृते सति ॥ ७० ॥
सब्रह्मचारिण्येकाहमतीते क्षपणं स्मृतम् ।
जन्मन्येकोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ७१ ॥
और इस बालक का अग्नि संस्कार, जलदान आदि कुछ न
करना। सिर्फ़ जंगल में, काठ की भांति गढ़े में, छोड़ कर तीन दिन
सूतक मानना चाहिए। तीन वर्ष से कम अवस्था का बालक होने
पर, सपिण्डों को जलदान न करना चाहिए। अथवा, दांत निकले
हों, नामकरण होगया हो तो जलदान कर भी सकते हैं। सहाध्यायी
के मरने पर एक दिन आशौच होता है और समानोदक के यहां
सन्तति होने पर तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ ६६-७१ ॥
स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्र्यहाच्छुध्यन्ति बान्धवाः ।
यथोक्तेनैव कल्पेन शुध्यन्ति तु सनाभयः ॥ ७२ ॥
अक्षांरलवणाश्राः स्युर्निमज्जेयुश्च ते त्र्यहम् ।
मांसाशनं च नाश्नीयुः शयीरंश्च पृथक् क्षितौ ॥ ७३ ॥
संनिधावेष वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः ।
असंनिधावयं ज्ञेयो विधिः सम्बन्धिवान्धवैः ॥ ७४ ॥
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विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो ह्यनिर्देशम् ।
यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ७५ ॥
जिस कन्या का विवाह न भया हो, सगाई भई हो, उसके निधन
में ससुराल वाले और पितृकुल के तीन रात में शुद्ध होते हैं।
मृत्यु सूतक वाले को क्षार, अलोना भोजन करना चाहिए। तीन
दिन तक नदी में स्नान करे और मांस भक्षण न करे, भूमि में अलग
सोवे। जो सपिण्ड और समानोदक पुरुष, मरणकाल में समीप
हों उनके लिए यह आशौचविधि कही गई है। और जो पास न
हों उनके लिए आगे कही विधि जाननी चाहिए। विदेश में मरने
का हाल दश दिन के भीतर जाने तो जितने दिन बाकी हों उतने
ही दिन सूतक होता है ॥ ७२-७५ ॥
अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्रै वापो विशुद्ध्यति ॥ ७६ ॥
निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च ।
सवासा जलमाप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ॥ ७७ ॥
बाले देशान्तरस्थे च पृथक् पिण्डे च संस्थिते ।
सवासा जलमाप्लुत्य सद्य एव विशुद्ध्यति ॥ ७८ ॥
अन्तर्दशाहे स्यातां चेत्पुनर्मरणजन्मनी ।
तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्देशम् ॥ ७९ ॥
त्रिरात्रमाहुराशौचमाचार्ये संस्थिते सति ।
तस्य पुत्रे च पत्न्यां च दिवारात्रमिति स्थितिः॥८०॥
दश दिन बीतने पर मृत्यु सुने तो तीनदिन का आशौच होता
है और एक वर्ष बीतने पर स्नानमात्र सेही शुद्धि होजाती है।
१७४ मनुस्मृति ।
अपने समानोदक का मरण और पुत्र का जन्म सुनकर सचैल
स्नान से शुद्धि होती है । सगोत्र बालक का और असपिण्ड मामा,
साला आदि का विदेश में मृत्यु सुनकर, सचैल स्नान से शुद्धि
होती है । यदि दशाह के भीतर फिर कोई पैदा हो या मरे, तो
ब्राह्मण दश दिन पूरे होने तक शुद्ध न होगा । आचार्य के मरने में,
शिष्य को तीन दिन आशौच रहता है और आचार्य के पुत्र या
स्त्री के मरण में एक दिन का होता है ॥ ७६-८० ॥
श्रोत्रिये तूपसंपन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
मातुले पक्षिणीं रात्रिं शिष्यर्त्विग्बान्धवेषु च ॥ ८१ ॥
प्रेते राजनि सज्ज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः ।
अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरौ ॥ ८२ ॥
शुद्ध्येद्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति ॥ ८३ ॥
श्रोत्रिय की मृत्यु में तीन दिन, मामा, शिष्य, ऋत्विक् और
बान्धवों की मृत्यु में दिन-रात आशौच रहता है । जिस राजा के
देश में निवास हो उसकी मृत्यु, दिन में होने पर सूर्यास्त तक
और रात में रातभर, सूतक रहता है । अश्रोत्रिय ब्राह्मण, वेदपाठी
और गुरु के मरण में, एक दिन का आशौच होता है । ब्राह्मण दश
दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक
मास में शुद्ध होता है ॥ ८१-८३ ॥
न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्निषु क्रियाः ।
न च तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ ८४ ॥
दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।
शवं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ॥ ८५ ॥
पाँचवां अध्याय । १७५
पाँचवां अध्याय । १७५
आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने ।
सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानींश्च शक्तितः ॥ ८६ ॥
नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुध्यति ।
आचम्यैव तु निःस्नेहं गामा लभ्यार्कमीक्ष्य वा ॥ ८७ ॥
आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् ।
समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ ८८ ॥
अग्निहोत्री को सूतक के दिन बढ़ाकर, अग्निहोत्र में विघ्न न
करना चाहिए। अग्निहोत्री सपिण्ड होने पर भी सूतकी नहीं
होता । चाण्डाल, रजस्वला, पतित, प्रसूता, मुरदा और मुरदे
को छूने पर स्नान से शुद्धि होती है। अपवित्र वस्तु का दर्शन
होने पर, पवित्र होकर आचमनपूर्वक सौर मन्त्र 'उदुत्यं जात-
वेदसम्-' और पवमान मन्त्रों का जप करना चाहिए। मनुष्य
की गीली हड्डी छूने पर स्नान करके और सूखी हो तो आचमन
से विप्र शुद्ध होता है। अथवा गौ का स्पर्श या सूर्यदर्शन से पवि-
त्रता होती है। ब्रह्मचारी व्रत की समाप्ति तक जलदान न करे।
उसके बाद जलदान करे और तीन रात में ही शुद्ध भी हो
जाता है ॥ ८४-८८ ॥
वृथा संकरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् ।
आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ॥ ८६ ॥
पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।
गर्भभर्तृद्रुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ ६० ॥
आचार्यं स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् ।
निर्हृत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ ६१ ॥
वर्णसंकर, संन्यासी और आत्मघाती को जलदान की ज़रूरत
नहीं है। पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने-
१७६ मनुस्मृति ।
नहीं है। पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने-
वाली और मद्य पीनेवाली स्त्री को जलदान न करना। अपने आ-
चार्य, उपाध्याय, पिता, माता और गुरु के शव को उठाने और
दाह करने से, ब्रह्मचारी अपने व्रत से पतित नहीं होता है ॥८६-९१॥
दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् ।
पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥ ६२ ॥
न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम् ।
ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हिते सदा ॥ ६३ ॥
राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते ।
प्रजानां परिरक्षार्थमासनञ्चात्र कारणम् ॥ ६४ ॥
डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च ।
गोब्राह्मणस्य चैवार्थे यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥६५॥
शूद्र के मृत शरीर को, नगर के दक्षिण द्वार से और ब्राह्मण-
क्षत्रिय-वैश्य के शव को क्रम से पश्चिम, उत्तर और पूर्व द्वार से
श्मशान में लेजाना चाहिए। राजा, ब्रह्मचर्य व्रत करनेवाला और
यज्ञ करनेवाला सूतकी नहीं होता। क्योंकि-राजा इन्द्र के पद पर
है। ब्रह्मचारी और याज्ञिक सदा ब्रह्मरूप ही है। जो पुरुष राजा के
यहां श्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त होता है। वह कार्य करने के निमित्त
तुरंत ही अशौच से मुक्त होता है। क्योंकि प्रजारक्षा के लिए
न्यायासन पर बैठना ही इसमें कारण है। बिना राजा की लड़ाई
में, बिजली से, राजाज्ञा फांसी से और गौ-ब्राह्मण के रक्षा के
लिए मरे हुए का और जिसको राजा अपने कार्य के लिए चाहे,
उसकी तत्काल शुद्धि होती है ॥ ६२-६५ ॥
सोमाग्न्यर्कानिलेन्द्राणां वित्तापत्योर्यमस्य च ।
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥ ६६ ॥