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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 649 में से

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पृष्ठ 300

अथ पञ्चमोऽध्यायः ।
श्रुत्वैतादृषयो धर्मान् स्नातकस्य यथोदितान् ।
इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ १ ॥
एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।
कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ २ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ३ ॥
अनभ्यासेन वेदानांमाचारस्य च वर्जनात् ।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ४ ॥
पांचवां अध्याय ।
भक्ष्याभक्ष्य-व्यवस्था ।
इस प्रकार स्नातक ब्राह्मणों के धर्मों को सुनकर, अग्नि से
उत्पन्न * महात्मा भृगु से ऋषियों ने कहा—हे प्रभो ! इन विधियों
से धर्माचरण करनेवाले ब्राह्मणों को मृत्यु कैसे मार सकता है । यह
सुनकर, मनुपुत्र भृगु ने कहा—वेदाभ्यास न करना, सदाचार
को छोड़ना सदा आलसी रहना और अपवित्र भोजन से मृत्यु
मार लेता है ॥ १-४ ॥

  • पहले अध्याय में, दश प्रजापतियों की सृष्टि में मनु से भृगुसृष्टि कही है । यहाँ
    कल्पभेद से, अग्नि से उत्पन्न भृगु को लिखा है । मनु का अग्नि भी नाम कहीं
    लिखा मिलता है । कहीं प्रजापति नाम से भी लेख है ।