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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 649 में से

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पृष्ठ 310

का मांस भक्षण मैं करता हूं 'सः' अर्थात् वह परलोक में 'मां'
अर्थात् मेरा भक्षण करेगा। यही 'मांस' शब्द का अर्थ विद्वानों
ने कहा है। मांस खाना, मद्य पीना और मैथुन इन कामों में मनुष्यों
की प्रवृत्ति स्वाभाविक हुआ करती है, इस कारण इनमें दोष नहीं
है। परन्तु इनको छोड़ देने से बड़ा पुण्य होता है ॥ ५३-५६ ॥
प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च।
चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ॥ ५७ ॥
दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते ।
अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥ ५८ ॥
दशाशं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
अर्वाक् संचयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ ५६ ॥
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते ।
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥ ६० ॥
आशौच-व्यवस्था ।
अब चारों वर्णों की सूतक व्यवस्था और धातु पात्रों की शुद्धि
को क्रम से कहते हैं। दांत निकल आये हों, या दांत निकलने के बाद
और चूड़ा कर्म होजाने पर मृत्यु होने से सब बान्धवों को अशुद्धि
और सूतक लगता है। सपिण्ड अर्थात् सात पुस्त तक मरणाशौच
दश दिन तक रहता है। किसी को अस्थि संचयन के पूर्व ॥५७-६०॥
यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ॥ ६१ ॥
सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम्।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ ६२ ॥
निरस्य तु पुमान् शुक्रमुपस्पृश्यैव शुध्यति ।