सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ८७

तीसरा अध्याय। ८७
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये च भोजयेत् ।
पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ॥ १२६ ॥
अमावास्या के प्रेतकर्म को पितृकर्म कहते हैं। उसको जो करता
है वह नित्य लौकिक फल को पाता है। वेदपाठी, सदाचारी,
ब्राह्मण को ही देव और पितृकर्म का अन्न आदि देना चाहिए, ऐसा
दान महाफल को देता है। देवकर्म और पितृकर्म में एक एक भी
विद्वान् ब्राह्मण को भोजन देने से बड़ा फल मिलता है। पर बहुत
से मूर्खों को भी खिलाने से वह फल नहीं मिलता ॥ १२७-१२६ ॥
दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिःस्मृतः ॥१३०॥
सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते ।
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ १३१ ॥
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च ।
न हि हस्तावरुग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुद्ध्यतः ॥ १३२ ॥
यावतो ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् ।
तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलर्ष्ट्ययोगुडान् ॥ १३३ ॥
वंशपरम्परा से ही वेदज्ञ ब्राह्मण को जान रक्खे क्योंकि वह
ब्राह्मण हव्य, कव्य देने का पात्र है। उसको देने से अतिथि के
समान फल होता है। जिस श्राद्ध में वेद न जाननेवाले दस लाख
ब्राह्मण भोजन करते हों, उसका फल एकही वेदविशारद ब्राह्मण
को भोजन कराने से होता है। हव्य और कव्य ज्ञानवृद्ध ब्राह्मण
को देना चाहिए, मूर्ख को नहीं। क्योंकि रुधिर से सनेहुए हाथ
रुधिर से ही शुद्ध नहीं होते। वेदहीन ब्राह्मण देव और पितृकर्म
में जितने हव्य-कव्य के ग्रास खाता है, उतने ही जलते हुए शूल,
ऋष्टि और लोहगोला यजमान को निगलने पड़ते हैं ॥ १३०-१३३ ॥
ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे ।

८८ मनुस्मृति ।
तपःस्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ॥ १३४ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः ।
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि ॥ १३५ ॥
अश्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः ।
अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ॥१३६॥
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्रियः पिता ।
मन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ॥ १३७ ॥
कोई ब्राह्मण आत्मज्ञानी, कोई तप में तत्पर, कोई तप और
स्वाध्याय में तत्पर और कोई कर्मनिष्ठ ही होते हैं । इनमें ज्ञानी
को श्राद्ध में ग्रहण करे, और देवकर्म में इन चारों को ग्रहण करना
चाहिए । जिसका पिता वेदज्ञ न हो, पर पुत्र वेदपारंगत हो
अथवा पुत्र वेदवेत्ता न हो, पिता वेदपारंगत हो इन दोनों में
जिसका पिता वेदपारगामी हो वह श्रेष्ठ है और दूसरा भी मान्य
होता है ॥ १३४-१३७ ॥
न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः ।
नारिं न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद् द्विजम् ॥ १३८ ॥
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥ १३६ ॥
यः संगतानि कुरुते मोहाच्छ्राद्धेन मानवः ।
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधमः ॥ १४०॥
श्राद्ध में मित्र को भोजन न करावे, मित्रों का संग्रह धन से
करना चाहिए । जो अपना शत्रु वा मित्र न हो उसी ब्राह्मण को
भोजन देना चाहिए । जो श्राद्ध और यज्ञ कर्म में केवल मित्रों को
ही भोजन देता है, उसका फल परलोक में नहीं मिलता । जो
अज्ञानी पुरुष श्राद्ध के द्वारा मैत्री बांधता है उसको स्वर्ग नहीं
होता ॥ १३८-१४० ॥

तीसरा अध्याय । ८६

तीसरा अध्याय । ८६
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतॄंश्च कुरुते फलभागिनः।
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह 'पैशाची द-
क्षिणा' कहलाती है । यह दक्षिणा—जैसे भोजन आदि अंधी गौ
एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।
परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज बो-
कर, बोनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही-मूर्ख-वेदहीन ब्राह्मण
को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से
भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोक में
फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भििरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।
१२

६० मनुस्मृति ।
दौहित्रं विट् पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्॥१४८॥
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् ।
पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ १४६ ॥
ये स्तेनपतितक्कीबा ये च नास्तिकवृत्तयः ।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननर्हान् मनुरब्रवीत् ॥ १५०॥
यदि योग्य, ब्राह्मण न मिलें तो श्राद्ध में मित्र कोही खिलादे ।
पर शत्रु विद्वान् को भी न भोजन करावे—वह निष्फल होता है।
वेदपारगामी ऋग्वेदी ब्राह्मण को, यजुर्वेदी को, समाप्ति तक
सामवेद जाननेवाले को, श्राद्ध में अच्छीभांति भोजन कराना
चाहिए । इन में से कोई भी ब्राह्मण जिसके श्राद्ध में आदर से
भोजन पाता है, उसके सात पीढ़ी तक के पितर तृप्त होते हैं ।
यह हव्य और कव्य की प्रथम विधि है और सत्पुरुषों से आच-
रित गौण विधि इस प्रकार है-यदि ऊपर कहे ब्राह्मण न मिलें तो
नाना, मामा, भानजा, ससुर, गुरु, जामाता, मौसेरा भाई,
ऋत्विज और यज्ञ करानेवालों को भोजन देना । देवकर्म में
ब्राह्मण की परीक्षा न करे ओर पितृकर्म में यत्न से परीक्षा करनी
चाहिए । जो चोर पतित वा नपुंसक हों, नास्तिकभाव से
जीविका करता हो उन ब्राह्मणों को मनुजी ने देवकर्म और
पितृकर्म में अयोग्य कहा है॥ १४४-१५० ॥
जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा ।
याजयन्ति च ये पूगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत्॥ १५१॥
चिकित्सकान् देवलकान् मांसविक्रयिणस्तथा ।
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ॥ १५२॥
प्रेष्यो ग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः ।
प्रतिरोद्धा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वार्धुषिस्तथा ॥ १५३ ॥

तीसरा अध्याय। ६१

तीसरा अध्याय। ६१
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृतिः ।
ब्रह्मद्विट् परिवित्तिश्च गणाभ्यन्तर एव च ॥ १५४ ॥
कुशीलवोऽवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च ।
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ १५५ ॥
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा ।
शूद्रशिष्यो गुरुश्चैव वाग्दुष्टः कुण्डगोलकौ ॥ १५६ ॥
अकारणपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
ब्राह्मैर्योनैश्च सम्बन्धैः संयोगं पतितैर्गतः ॥ १५७ ॥
अपढ़, जटाधारी, दुर्बल, जुआरी, बहुत यजमानों को एक साथ
बैठाकर यज्ञ करानेवाला, द्रव्य लेकर पूजा करानेवाला, इन को
श्राद्ध में न खिलाये । वैद्य, पुजारी, मांस बेचनेवाला और वाणिज्य
से जीविका करनेवाला इनको हव्य-कव्य में न भोजन देवे । ग्राम
और राजा का हलकारा, खराब नखवाला, काले दाँतवाला, गुरु-
विरोधी, अग्निहोत्रत्यागी, व्याजखोर, क्षयरोगी, चरवाह, बड़े
भाई के विवाह बिना पूर्व ही विवाहित, पञ्चमहायज्ञ न करनेवाला,
ब्राह्मणद्वेषी, छोटे भाई के विवाह होने पर अविवाहित बड़ा भाई,
धर्मार्थ इकट्ठा किये धन से जीवन करनेवाला, नाच, गान से जी-
विका करनेवाला, ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, शूद्रा से विवाहित, पुनर्विवाह
का लड़का, काना, जिस के घर स्त्री का उपपति-जार रहता हो,
'वेतन लेकर पढ़ानेवाला, वेतन देकर पढ़ा हुआ । शूद्र का गुरु,
कटुभाषी, कुण्ड-पति के जीते जार से पैदा, गोलक-पति के मरने
पर जार से पैदा, बिना कारण माता, पिता और गुरु को त्यागने
वाला, पतितों को पढ़ानेवाला, पढ़नेवाला और पतितों से कन्या-
सम्बन्ध करनेवाला इन सब को श्राद्ध में कभी भोजन न कराना
चाहिए ॥ १५१-१५७ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।

६२ मनुस्मृति ।
समुद्रयायी वन्दी च तैलिकः कूटकारकः ॥ १५८ ॥
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशस्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ॥ १५६ ॥
धनुःशराणां कर्ता च यश्चाग्रे दिधिषूपतिः ।
मित्रध्रुक् द्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ १६० ॥
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यथो पिशुनस्तथा ।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ १६१ ॥
घर में आग लगानेवाला, ज़हर देनेवाला, जार से पैदा हुए
का अन्न खानेवाला, सोमलता बेचनेवाला, समुद्र पार जानेवाला,
राजा की स्तुति करनेवाला, तेल का व्यापारी, झूठी गवाही देने
वाला, पिता से लड़नेवाला, धूर्त, शराबखोर, कोढ़ी आदि पाप-
रोगी, निन्दित, पाखण्डी, दूध, दही बेचनेवाला, धनुष् और बाण
बनानेवाला, जो बड़ी बहिन के क्वारी रहते छोटी का पति बन
गया हो, मित्रद्रोही, जुवा से जीविका करनेवाला, अपने पुत्र से
विद्या पढ़नेवाला, मृगीरोगी, गण्डमालारोगी, श्वेतकुष्ठ, चुगल-
खोर, पागल, अन्धा, वेदनिन्दक इतने प्रकार के ब्राह्मण श्राद्ध में
वर्जित हैं ॥ १५८-१६१ ॥
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिणां पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ १६२ ॥
स्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः ।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एव च ॥ १६३ ॥
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च ।
हिंस्रो वृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ॥ १६४ ॥
हाथी, बैल, घोड़ा और ऊँटों का सिखानेवाला, नक्षत्र से

तीसरा अध्याय । ६३

तीसरा अध्याय । ६३
जीविका करनेवाला जोशी, पक्षी पालनेवाला, युद्धशिक्षा देने
वाला, नहर आदि तोड़नेवाला, उसको बंद करनेवाला, घर
बनानेवाला, दूत, मज़दूरी लेकर वृक्ष लगानेवाला, खेल के लिए
कुत्ता पालनेवाला, बाज पक्षी से जीविका करनेवाला, कन्या को
दूषित करनेवाला, हिंसक, शूद्र आचरण करनेवाला, और भूत,
पिशाच पुजानेवाला ये सब कर्म करनेवाले ब्राह्मण श्राद्ध में
भोजन न पावें ॥ १६२-१६४ ॥
आचारहीनः क्लीबश्च नित्यं याचनकस्तथा ।
कृषिजीवी श्लीपदी च सद्भिर्निन्दित एव च ॥ १६५ ॥
औरभ्रिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा ।
प्रेतनिर्यातकश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ १६६ ॥
एतान् विगर्हिताचारानपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् ॥ १६७ ॥
आचाररहित, नपुंसक, रोज़ भीख मांगनेवाला, खेती से जीने
वाला, पीलपांव रोगवाला, सत्पुरुषों से निन्दित, मेंड़ा और भैंस
से जीनेवाला, जो दूसरे की होचुकी हो उसके साथ विवाह
करनेवाला और प्रेत का धन लेनेवाला इनको श्राद्ध में वर्जित
करना चाहिए । इन सब दूषित आचारवाले और पंक्तिबाह्य
अधम ब्राह्मणों को देव और पितृकार्य में विद्वान् पुरुष त्याग
देवे ॥ १६५-१६७ ॥
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ १६८ ॥
अपांक्तदाने यो दातुर्भवत्यूर्ध्वं फलोदयः ।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १६६ ॥
अव्रतैैर्यद्द्विजैर्भुक्तं परिवेत्रादिभिस्तथा ।

६४ मनुस्मृति ।
अपांक्तेयैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ १७० ॥
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते ।
परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥ १७१ ॥
वेद न पढ़नेवाला ब्राह्मण फूस के आग की तरह निर्जीव हो
जाता है। ऐसे को हव्य और कव्य न देना चाहिए। क्योंकि, राख,
में होम नहीं किया जाता है। पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को हव्य, कव्य देने
से, जो दाता को फल होता है, वह सब कहता हूं। वेदव्रतरहित
ब्राह्मण और परिवेत्ता आदि और पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को जो देव,
पितृकार्य में भोजन कराया जाता है वह राक्षसभोजन है। जो
छोटा भाई बड़े भाई के रहते, उसके पहले विवाह और अग्निहोत्र
करता है उसको परिवेत्ता कहते हैं। और बड़े भाई को परिवित्ति
कहते हैं ॥ १६८-१७१ ॥
परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते ।
सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ १७२ ॥
भ्रातुर्मृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः ।
धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥ १७३ ॥
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ ।
पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥ १७४ ॥
तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च ।
दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम् ॥ १७५॥
परिवित्ति, परिवेत्ता और ये जिस कन्या से विवाह करते हैं वह
पांचवां कन्या देनेवाला और विवाह करनेवाला सब नरक को
जाते हैं। भाई की मृत्यु होनेपर उसकी स्त्री से कामवश जो नियोग
करता है उसको 'दिधिषूपति' कहते हैं। दूसरे की स्त्री से उत्पन्न
दो पुत्रों की कुण्ड और गोलक संज्ञा है। पति के जीते, जार सें

तीसरा अध्याय। ६५

तीसरा अध्याय। ६५
पैदा हुआ कुण्ड और मरने पर पैदा हुआ गोलक कहलाता है।
ये दोनों परस्त्री से पैदा होकर, लोक और परलोक में हव्य, कव्य
देनेवाले का नाश करते हैं ॥ १७२-१७५ ॥
अपांक्त्यो यावतः पांक्त्यान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावतां न फलं प्रेत्य दाता प्राप्नोति बालिशः ॥ १७६ ॥
वीक्ष्यान्धो नवतेः काणः षष्टेः श्वित्री शतस्य तु ।
पापरोगी सहस्रस्य दातुर्नाशयते फलम् ॥ १७७ ॥
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्ब्राह्मणान्छूद्रयाजकः ।
तावतां न भवेद्दातुः फलं दानस्य पौर्तिकम् ॥ १७८ ॥
पंक्तिबाह्य पुरुष श्राद्ध में जितने योग्य ब्राह्मणों को भोजन करते
देखता है उनका फल परलोक में उस मूर्ख भोजन देनेवाले को नहीं
मिलता। अन्धा देखकर नव्वे श्रोत्रिय ब्राह्मणों के भोजन का फल
नष्ट करता है, काना साठ ब्राह्मणों का, सफेद कोढ़ का सौका,
पापरोगी एक हज़ार का फल नष्ट कर देता है । शूद्रों को यज्ञ
करानेवाला जितने ब्राह्मणों को अपने अङ्गों से छूता है अर्थात्
श्राद्ध में जितने ब्राह्मणों की पाँत में बैठता है, उतनों के पूर्तस-
म्बन्धी श्राद्ध का फल दाता को नहीं मिलता है ॥ १७६-१७८ ॥
वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् ।
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥ १७६ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ।
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धुषौ ॥ १८० ॥
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥ १८१ ॥
इतरेषु त्वपांक्तेयेषु यथोद्दिष्टेष्वसाधुषु ।

६६ मनुस्मृति।
मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२॥
वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में
कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता बेंचने
वाले को जो हव्य, कव्य देवे वह विष्ठा होती है । वैद्य को देने से
पीव-रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से
निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया
जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के
को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित
मनुष्य हैं उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए-
मेद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६-१८२ ॥
अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कात्स्न्र्येनद्विजाग्र्यान्पंक्तिपावनान्॥ १८३॥
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १८४॥
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ।
ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥
दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार
के होने चाहिएं-जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके अङ्गों
के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति
पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने
वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामक ऋग्वेद के भाग को
पढ़नेवाला, शिक्षा आदि छः अङ्गों का ज्ञाता, ब्राह्मविवाह से पैदा
पुत्र और साम गान करनेवाला ये छः पंक्तिपावन जानना
चाहिए ॥ १८३-१८५ ॥
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः ।
शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥

तीसरा अध्याय। ५७

तीसरा अध्याय। ५७
पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते।
निमन्त्रयेतऽयवरान्सम्यग्विप्रान्यथोदितान्॥१८७॥
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥१८८॥
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथा सीनानुपासते ॥ १८६ ॥
वेदार्थ का ज्ञाता, उसका अध्यापक, ब्रह्मचारी, हज़ार गोदान
करनेवाला और सौ वर्षका ये पंक्तिपावन होते हैं । श्राद्ध के
पहले दिन वा उसी दिन उक्त गुणवाले ब्राह्मणों को आदर से
तीन वा कम को निमन्त्रण देवे । श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण
उस दिन नियम से रहे और वेदाध्ययन न करे । और यही
नियम श्राद्ध करानेवाले को भी पालन करना चाहिए । पितर
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के पास आते हैं और वायु के समान पीछे
चलते और बैठते हैं ॥ १८६-१८६ ॥
केतितस्तु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः ।
कथंचिदप्यतिक्रामन् पापः शूकरतां व्रजेत् ॥ १६० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते ।
दातुर्यद्दुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ १६१ ॥
अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महाभागाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ १६२ ॥
हव्य और कव्य में नेवता पाकर किसी कारण भोजन न करने
से उस ब्राह्मण को दूसरे जन्म में शूकर होना पड़ता है । निम-
न्त्रण पाकर कामुक स्त्री से जो भोग करता है, वह दाता के पाप
का भागी होता है । क्रोधरहित, पवित्र-रागद्वेषरहित, सदा
ब्रह्मचारी, युद्धत्यागी, महाभाग-दया, शील आदि युक्त, देवता
रूप पितर हैं। इसलिए भोजन करनेवालों को आचार, विचार से

६८ मनुस्मृति ।
यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः ।
ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ॥ १९३ ॥
मनोर्हैरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः ।
तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥१९४॥
विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः ।
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः॥ १९५॥
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽद्विजाः ॥ १९६ ॥
इन सब पितरों की जिससे उत्पत्ति हुई है और जो पितर जिन
नियमों से जिसके पूज्य हैं वह सुनो । हिरण्यगर्भ के पुत्र मनु के
जो मरीचि आदि पुत्र हैं, उनके पुत्र सोमपा आदि पितृगण हैं।
विराट् के पुत्र सोमसद्‌नामक साध्यों के पितर हैं और मरीचि
के पुत्र अग्निष्वात्त देवताओं के पितर कहे जाते हैं । दैत्य,
दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, पक्षी और किन्नरों के बर्हिषद्‌नामक
पितर हैं ॥ १९३–१९६ ॥
सोमपानाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः ।
वैश्यानामाज्यपानाम शूद्राणां तु सुकालिनः ॥१९७॥
सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः ।
पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १९८॥
अग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्र्वाहिषदस्तथा ।
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत्॥१९६॥
य एते तु गणा मुख्याः पितॄणां परिकीर्त्तिताः ।
तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ २०० ॥
सोमपा ब्राह्मणों के, हविर्भुज क्षत्रियों के, आज्यपा वैश्यों के
और सुकालिन‌नामक शूद्रों के पितर हैं । सोमपा भृगु के पुत्र,

तीसरा अध्याय । ६६

तीसरा अध्याय । ६६
हविष्मन्त अङ्गिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका-
लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं। अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्,
अग्निष्वात्त और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं। ये पितरों के मुख्य
गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर
जानना चाहिए ॥ १६७-२०० ॥
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः ।
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २०१ ॥
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥
देवकार्याद्द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते ।
दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥
तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ॥२०४॥
मरीचि आदि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और
मनुष्य हुए हैं। देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत्
उत्पन्न हुआ है। इन सब पितरों को चांदी के पात्र से वा चांदी
लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है। देवकार्य से
पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है। पितृश्राद्ध प्र-
धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है। देवकर्म
पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है। पितृकर्म का रक्षक देव-
कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश कर
देते हैं ॥ २०१-२०४ ॥
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्र्याद्यन्तं न तद्भवेत् ।
पित्र्याद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥२०५॥
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥

१०० मनुस्मृति।
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि ।
विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ २०७ ॥
आसनेषूपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् ।
उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रान्स्तानुपवेशयेत् ॥ २०८ ॥
इस कारण श्राद्ध में आरम्भ और समाप्ति देवतापूर्वक करे,
पित्रादिपूर्वक न करे । उसको करनेवाला वंशसहित नष्ट होजाता
है । एकान्त और पवित्र देश में गोबर से भूमि लीपकर उसमें
दक्षिण को झुकी वेदी बनावे । खुला स्थान, पवित्र देश, नदीतीर
या निर्जन देश में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। उस स्थान
में अलग अलग बिछे हुए कुशासनों पर निमन्त्रित ब्राह्मणों को
बैठाना चाहिए ॥ २०५-२०८ ॥
उपवेश्य तु तान् विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् ।
गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेद्देवपूर्वकम् ॥ २०६ ॥
येषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि ।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ॥ २१० ॥
अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादितः ।
हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्संतर्पयेत् पितॄन् ॥ २११ ॥
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥२१२॥
उन सदाचारी ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाकर सुगन्ध, चन्दन,
पुष्प, धूप आदि से पहिले विश्वेदेव फिर पितरों का पूजन करे।
उसके बाद कुश और तिल मिला अर्घ्यजल दान करे और सब
की आज्ञा लेकर श्राद्ध करनेवाला ब्राह्मणों के साथ अग्नि में हवन
करे । पहले हवन से अग्नि, सोम और यम को तृप्त करे फिर अन्न
आदि हवि से पितरों को तृप्त करना चाहिए । यदि अग्नि न हो तो

तीसरा अध्याय।

तीसरा अध्याय।
ब्राह्मण के हाथ में ही तीन आहुति देवे, ब्राह्मण अग्निरूप है
ऋषियों का मत है ॥ २०६-२१२ ॥
अक्रोधनान् सुप्रसादान् वदन्त्येतान् पुरातनान् ।
लोकस्याप्यायने युक्ताञ्छाद्धेदेवान् द्विजोत्तमान्॥२१३॥
अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृतपरिक्रमम् ।
अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदकं भुवि ॥ २१४ ॥
त्रींस्तु तस्माद्धविःशेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः ।
औदकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः ॥ २१५ ॥
क्रोधरहित, प्रसन्नचित्त, वृद्ध और लोक की वृद्धि में तत्पर,
श्रेष्ठ ब्राह्मण श्राद्ध के पात्र होते हैं । अपसव्य होकर पितरों के
निमित्त अग्नि में दो आहुति देकर अपसव्य ही पूर्व दिशा से
दक्षिण को पिण्ड छोड़ने की भूमि पर जल छोड़े । हवन की बाक़ी
सामग्री का तीन पिण्ड बनाकर दक्षिणमुख दाहने हाथ से कुशों
के ऊपर पिण्ड छोड़ना चाहिए ॥ २१३-२१५ ॥
न्युप्य पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम् ।
तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम् ॥ २१६ ॥
आचम्योदक्परावृत्य त्रिरायम्य शनैरसून् ।
षडृतूंश्च नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ २१७॥
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः ।
अवजिघ्रेच्च तान्पिण्डान्यथान्युप्तान्समाहितः॥२१८॥
पिण्डेभ्यस्त्वल्पिकां मात्रां समादायानुपूर्वशः ।
तानेव विप्रानासीनान् विधिवत्पूर्वमाशयेत् ॥ २१९ ॥
पिण्डों के रखने के बाद वृद्ध प्रपितामह से लेकर ऊपर के
तीन लेपभागी पुरुषों की तृप्ति के लिए उन कुशों के पास ही हाथ
धोवे । फिर उत्तराभिमुख आचमन और तीन प्राणायाम धीरे से

१०२ मनुस्मृति ।

करके छ ऋतुओं को और पितरों को नमस्कार करे। फिर पिण्ड-
दान के पात्र में शेष जल बचा हो उसको पिण्डों के पास धीरे
धीरे छोड़े और जिस क्रम से पिण्डों को रक्खा था उसी क्रम
से उठाकर सूंघे । पिण्डों में से थोड़ा थोड़ा भाग लेकर
प्रथम ब्राह्मणों को विधि से खिलावे अर्थात् जिस पिता के नि-
मित्त जो पिण्ड छोड़ा हो उस पिण्ड का भाग उसी पितर के
स्थान में बैठे हुए ब्राह्मण को खिलाना चाहिए ॥ २१६-२१९ ॥
ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् ।
विप्रवद्वापि तं श्राद्धे स्वकं पितरमाशयेत् ॥ २२० ॥
पिता यस्य निवृत्तः स्याज्जीवेच्चापि पितामहः ।
पितुः स नाम संकीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम् ॥ २२१ ॥
पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यब्रवीन्मनुः ।
कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत् ॥ २२२ ॥
यदि पिता जीता हो तो श्राद्ध करनेवाला मरे हुए पितामह
आदि तीन पुरुषों का श्राद्ध करे या पितृ ब्राह्मण के स्थान में
अपने पिता को ही भोजन करादे। जिसका पिता मरगया हो और
पितामह जीता हो, वह पिता का नाम बोलकर प्रपितामह का
नाम बोले अर्थात् पिता और प्रपितामह दोनों का श्राद्ध करे।
या जीवित पितामह उस श्राद्ध का भोजन करे, यह मनुजी की
आज्ञा है । अथवा श्राद्धकर्ता पितामह की आज्ञा से आपही
प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का श्राद्ध करे ॥ २२०-२२२ ॥
तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम् ।
तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन् ॥ २२३ ॥
पाणिभ्यां तूपसंगृह्य स्वयमन्नस्य वर्द्धितम् ।
विप्रान्तिके पितॄन्ध्यायञ्छनकैरुपनिक्षिपेत् ॥ २२४ ॥
उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते ।

तीसरा अध्याय। १०३

तीसरा अध्याय। १०३
तद्धिप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ॥ २२५ ॥
गुणांश्च सूपशाकाद्यान् पयो दधि घृतं मधु ।
विन्यसेत् प्रयतः पूर्वं भूमावेव समाहितः ॥ २२६ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलानि च फलानि च ।
हृद्यानि चैव मांसानि पानानि सुरभीणि च ॥ २२७ ॥
उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः ।
परिवेषयेत प्रयतो गुणान्सर्वान् प्रचोदयन् ॥ २२८ ॥
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के हाथ में कुश और तिलोदक देकर
पिण्ड का अग्रभाग पिता आदि तीन ब्राह्मणों को 'पित्रे स्वधास्तु'
कहकर देवे । फिर अन्न का पात्र दोनों हाथ से उठाकर ब्राह्मणों
के पास लाकर धीरे से रख देवे । यदि दोनों हाथों से अन्न न
लाया जाय तो दुष्ट राक्षस उसको हर लेते हैं—रस चूस लेते हैं ।
श्राद्धकर्ता सावधानी से शाक, दाल आदि सब व्यञ्जन और दूध,
दही, घी और मधु वगैरह पदार्थों को लाकर भूमि पर रक्खे ।
भक्ष्य, भोज्य, भांति भांति के कंद, फल, मांस * और सुगन्धित
जल लाकर सब पदार्थों के गुणों की प्रशंसा करके ब्राह्मणों को
परोसे ॥ २२३-२२८ ॥
नास्रमापातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत् ।
न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ २२६ ॥
श्राद्ध के दिन कभी आँसू न गिराना चाहिए । कोप न करे,
झूठ न बोले, पैर से अन्न को न छुवे और अन्न को उछालकर
भी न परोसना चाहिए ॥ २२६ ॥

  • मांसपिण्ड की विधि वा निषेध एकदेशीमत है । शास्त्र की व्यवस्था
    सर्वदेशी है । प्रवृत्ति के अधीन होकर संसार में सब बातों को करनेवाले मौजूद हैं ।
    इसलिए ऋषियों ने सब लिख दिया है । शास्त्र का रहस्य गहन है ।

पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥

१०४ मनुस्मृति ।
अस्रं गमयति प्रेतान् कोपोऽरीननृतं शुनः ।
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥
यद्यद्रोचेत विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः ।
ब्रह्मोद्याश्च कथाः कुर्यात् पितॄणामेतदीप्सितम् ॥ २३१ ॥
स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि ।
आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च ॥ २३२॥
हर्षयेद्ब्राह्मणांस्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः ।
अन्नाद्येनासकृच्चैतान् गुणैश्च परिचोदयेत् ॥ २३३ ॥
आँसू गिराने से श्राद्धफल प्रेतों को होता है। कोप करने से
शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर से ठोकर देने से राक्षसों
को और उछालने से पापियों को फल पहुँचता है। जो जो पदार्थ
ब्राह्मणों को प्रिय लगे उसको अच्छीतरह परोसे और ईश्वर
सम्बन्धी कथाएं कहे, क्योंकि वह पितरों को प्रिय होती हैं। ब्रा-
ह्मणों को वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान, इतिहास, पुराण आदि सुनावे।
खूब प्रसन्न करे, धीरे धीरे भोजन करावे और वारंवार पदार्थों के
गुण वर्णन करके भोजन में उन लोगों को प्रवृत्त करे ॥ २३०-२३३ ॥
व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ।
कुपतं चासने दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम् ॥ २३४ ॥
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ २३५ ॥
अत्युष्णं सर्वमन्नं स्याद्भुञ्जीरंस्ते च वाग्यताः ।
न च द्विजातयो ब्रूयुर्दात्रा पृष्टा हविर्गुणान् ॥ २३६ ॥
दौहित्र—कन्या का पुत्र, ब्रह्मचर्य व्रत में भी हो, तोभी उसको
यत्न करके श्राद्ध में खिलावे। उसको बैठने के लिए कुपत—हिमा-
लय के समीप का बना कम्बल देवे और श्राद्धभूमि में तिलछीट

तीसरा अध्याय । १०५

तीसरा अध्याय । १०५
देवे । श्राद्ध में दौहित्र, कुतप और तिल ये तीन पवित्र होते हैं।
पवित्रता, क्रोध न करना और धीरज इन तीन बातों की प्रशंसा
है। सब अन्न को खूब गरम रक्खे और उसको ब्राह्मण मौन
होकर भोजन करें। यदि देनेवाला भोजन के गुण पूछे तो भी
ब्राह्मणों को न कहना चाहिए। अर्थात् भोजन के समय व्यर्थ
बकवाद न करना चाहिए ॥ २३४-२३६ ॥
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः ।
पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ २३७ ॥
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ २३८॥
चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षरन्नश्नतो द्विजान् ॥ २३६ ॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ॥ २४० ॥
घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः ।
श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ॥ २४१ ॥
जबतक अन्न गरम रहता है और जबतक मौन होकर ब्राह्मण
भोजन करते हैं और भोजन के गुण नहीं बयान किए जाते तबतक
ही पितर अन्नका ग्रहण करते हैं। जो शिर में वस्त्र बांधकर द-
क्षिणमुख होकर और जूता पहनकर खाता है, ऐसे भोजन का
फल राक्षसों को पहुँचता है। चाण्डाल, शूकर, मुरगा, कुत्ता,
रजस्वला स्त्री, और नपुंसक ये लोग भोजन करते हुए ब्राह्मणों को
न देखने पावें। हवन में, दान में, ब्राह्मणभोजन में, देवकर्म में वा
पितृकर्म में यदि चाण्डाल आदि की नज़र पड़े तो वह कर्म निष्फल
होजाता है। शूकर सूंघने से, मुरगा पंख की हवा से, कुत्ता देखने से
और शूद्र स्पर्श से श्राद्ध के अन्न को दूषित करदेता है ॥ २३७-२४१॥
१४

१०६ मनुस्मृति ।
खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् ।
हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः ॥ २४२ ॥
ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ॥ २४३ ॥
श्राद्धकर्ता का सेवक भी यदि लूला, काना, या कम ज्यादा
अङ्गवाला हो तो उसे भी ब्राह्मणभोजन के समय हटा देना चा-
हिए। उस समय यदि कोई ब्राह्मण वा भिक्षुक भोजन के लिए
आजाय तो ब्राह्मणों की आज्ञा से उसका भी भरशक आदर
करना चाहिए ॥ २४२-२४३ ॥
सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संनीयाप्लाव्य वारिणा ।
समुत्सृजेद्भुक्तवतामग्रतो विकिरेद्भुवि ॥ २४४ ॥
असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् ।
उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्च यः ॥ २४५ ॥
उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्याशठस्य च ।
दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते ॥ २४६ ॥
भोजन से बचा हुआ सब प्रकार का अन्न इकट्ठा करके जल से
गीला करे और ब्राह्मणों के आगे रक्खे और थोड़ासा कुशों पर
छींट देवे । यह कुशों पर बिखेरा और जूॅठा बचा अन्न बिना सं-
स्कार मृत बालक, त्यागी और कुलस्त्रियों का माना जाता है।
श्राद्ध में भूमि पर पड़ा जूॅठा अन्न सीधे सरल स्वभाव दासों का
भाग है ॥ २४४-२४६ ॥
आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु ।
अद्दैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ २४७ ॥
स ह पिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः ।
अनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपणं सुतैः ॥ २४८ ॥