मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय । ८६
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतॄंश्च कुरुते फलभागिनः।
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह 'पैशाची द-
क्षिणा' कहलाती है । यह दक्षिणा—जैसे भोजन आदि अंधी गौ
एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।
परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज बो-
कर, बोनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही-मूर्ख-वेदहीन ब्राह्मण
को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से
भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोक में
फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भििरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।
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