सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

तीसरा अध्याय। १०३
तद्धिप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ॥ २२५ ॥
गुणांश्च सूपशाकाद्यान् पयो दधि घृतं मधु ।
विन्यसेत् प्रयतः पूर्वं भूमावेव समाहितः ॥ २२६ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलानि च फलानि च ।
हृद्यानि चैव मांसानि पानानि सुरभीणि च ॥ २२७ ॥
उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः ।
परिवेषयेत प्रयतो गुणान्सर्वान् प्रचोदयन् ॥ २२८ ॥
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के हाथ में कुश और तिलोदक देकर
पिण्ड का अग्रभाग पिता आदि तीन ब्राह्मणों को 'पित्रे स्वधास्तु'
कहकर देवे । फिर अन्न का पात्र दोनों हाथ से उठाकर ब्राह्मणों
के पास लाकर धीरे से रख देवे । यदि दोनों हाथों से अन्न न
लाया जाय तो दुष्ट राक्षस उसको हर लेते हैं—रस चूस लेते हैं ।
श्राद्धकर्ता सावधानी से शाक, दाल आदि सब व्यञ्जन और दूध,
दही, घी और मधु वगैरह पदार्थों को लाकर भूमि पर रक्खे ।
भक्ष्य, भोज्य, भांति भांति के कंद, फल, मांस * और सुगन्धित
जल लाकर सब पदार्थों के गुणों की प्रशंसा करके ब्राह्मणों को
परोसे ॥ २२३-२२८ ॥
नास्रमापातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत् ।
न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ २२६ ॥
श्राद्ध के दिन कभी आँसू न गिराना चाहिए । कोप न करे,
झूठ न बोले, पैर से अन्न को न छुवे और अन्न को उछालकर
भी न परोसना चाहिए ॥ २२६ ॥

  • मांसपिण्ड की विधि वा निषेध एकदेशीमत है । शास्त्र की व्यवस्था
    सर्वदेशी है । प्रवृत्ति के अधीन होकर संसार में सब बातों को करनेवाले मौजूद हैं ।
    इसलिए ऋषियों ने सब लिख दिया है । शास्त्र का रहस्य गहन है ।