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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

७० मनुस्मृति ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यौ स्मृताविह ।
पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ॥ २५ ॥
पृथक् पृथग्वा मिश्रौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव धर्म्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ॥ २६ ॥
ब्राह्मण को क्रम से पहले के छः विवाह धर्म हैं अन्त के चार
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को धर्म हैं पर राक्षस विवाह किसी के लिए
अच्छा नहीं है। ब्राह्मण के लिए पहले चार विवाह श्रेष्ठ हैं। क्षत्रिय
के लिए एक राक्षस, वैश्य और शूद्र के लिए आसुर विवाह श्रेष्ठ
माना गया है। पांच विवाहों में तीन-प्रजापत्य, गान्धर्व और
राक्षस, धर्म कहा है। और दो-पैशाच और आसुर अधर्म हैं।
इस लिए इन दोनों को न करना चाहिए । पहले कहे विवाह
अलग अलग या मिले हुए गान्धर्व और राक्षस क्षत्रियों के धर्म-
सम्बन्धी हैं ॥ २३-२६ ॥
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ २७ ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ २८ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ २९ ॥
वेदज्ञ और सुशील वर को बुलाकर उसका पूजन सत्कार करके
कन्यादान को ब्राह्म विवाह कहते हैं। बड़े यज्ञ में ऋत्विक् ब्राह्मण
को, वस्त्र-आभूषण से सुशोभित कन्या का दान 'दैव विवाह'
कहाजाता है। एक एक या दो दो गौ, बैल यज्ञ के लिए, वर से
लेकर, जो कन्यादान होता है उसको आर्षविवाह कहते हैं ॥२७-२९॥
सहैव चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥३०॥

तीसरा अध्याय । ७१

तीसरा अध्याय । ७१
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥ ३१ ॥
इच्छयान्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च ।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ ३२ ॥
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् ।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३३ ॥
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ ३४ ॥
'तुम दोनों साथ धर्माचरण करो' ऐसा कहकर वर कन्या का
पूजन करके जो कन्यादान होता है उसको 'प्राजापत्य विवाह'
कहते हैं। वर के माता पिता और कन्या को यथाशक्ति धन देकर
जो इच्छापूर्वक कन्यादान है उसको 'आसुर विवाह' कहते हैं।
कन्या और वर की इच्छा से जो संयोग होता है उसको गान्धर्व
विवाह कहते हैं, यह कामवश भोगमात्र के लिए है, धर्मार्थ नहीं
है। मारकर, दुःख देकर, रोती हुई कन्या को ज़बरदस्ती हरलेजाना,
'राक्षस विवाह' कहलाता है। सोती, नशे में और बेसुध कन्या
के साथ एकान्त में संभोग करना 'पैशाच विवाह' होता है। यह
महाअधम और पापपूर्ण विवाह है ॥ ३०-३४ ॥
अद्भिरेव द्विजाग्र्याणां कन्यादानं विशिष्यते ।
इतरेषां तु वर्णानामितरेतरकाम्यया ॥ ३५ ॥
यो यस्यैषां विवाहानां मनुना कथितो गुणः ।
सर्वं शृणुत तं विप्राः सम्यक् कीर्तयतो मम ॥ ३६ ॥
वर के हाथ में जल देकर कन्यादान ब्राह्मणों के लिए उत्तम पक्ष
है। दूसरे वर्णों में इच्छानुसार विनाजल, वचनमात्र से ही विवाह
होजाता है। भृगु ने ब्राह्मणों से कहा-इन सब विवाहों में जिसका
जो गुण मनु ने कहा है वह आप लोग सुनिए ॥ ३५-३६ ॥

७२ · मनुस्मृति । ·
दश पूर्वान्परान्वंश्यानात्मानं चैकविंशकम् ।
ब्राह्मीपुत्रः सुकृतकृन्मोचयेदेनसः पितॄन् ॥ ३७ ॥
दैवोढाजः सुतश्चैव सप्त सप्त परावरान् ।
आर्षोढाजः सुतस्त्रींस्त्रीन् षट्षट् कायोढजः सुतः ॥३८॥
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्ष्वेवानुपूर्वशः ।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमताः ॥ ३६ ॥
ब्राह्म विवाह से पैदा हुआ पुत्र सुकर्म करे तो अपने पिता-
पितामह आदि दश पूर्वपुरुषों को और पुत्र-पौत्र आदि दश आगे
के वंशजों को और इक्कीसवें अपनी आत्मा को पाप से मुक्त
करता है। दैव विवाह का पुत्र सात पीढ़ी पहली और सात आगे
की, आर्ष विवाह का तीन पीढ़ी पहली और तीन आगे की, और
प्राजापत्य का छः पीढ़ी पहली और छः आगे की-और अपने को
तारता है। क्रम से ब्राह्म आदि चार विवाहों से जो सन्तान होती
है वह तेजस्वी और शिष्ट पुरुषों में मान्य होती है ॥ ३७-३६ ॥
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः ।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥ ४० ॥
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसाऽनृतवादिनः ।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः ॥ ४१ ॥
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा ।
निन्दितैर्निन्दिता नॄणां तस्मान्निन्द्यान्विवर्जयेत्॥४२॥
पाणिग्रहणसंस्कारः सवर्णासूपदिश्यते ।
असवर्णास्वयं ज्ञेयो विधिरुद्वाहककर्मणि ॥ ४३ ॥
ब्राह्म आदि विवाहों से पैदा हुए पुत्र, सुरूप, सत्त्वगुणी, धनवान्,
यशस्वी, भोगी, धार्मिक होते हैं और सौ वर्ष जीते हैं। और दूषित
विवाहों से पैदा हुए, कुकर्मी, झूठे और धर्मनिन्दक होते हैं। अच्छे

तीसरा अध्याय । ७३

तीसरा अध्याय । ७३
विवाहों से अच्छी और बुरे से बुरी सन्तान पैदा होती हैं। इसलिए
निन्दित विवाहों को न करना चाहिए। विवाह-संस्कार अपने
वर्ण-जाति की कन्या के साथ करना उत्तम है और दूसरे वर्ण की
कन्या के साथ विवाहविधि इसप्रकार जाननी चाहिए ॥४०-४३॥
शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।
वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्टवेदने ॥ ४४ ॥
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा ।
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया ॥ ४५ ॥
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडशः स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्भिर्गर्हितैः ॥ ४६ ॥
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या ।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दशरात्रयः ॥ ४७ ॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ॥ ४८ ॥
ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय कन्या का विवाह हो तो वर का हाथ
न पकड़ कर उसके हाथ का बाण पकड़े। वैश्य की कन्या प्रतोद-
पशु हांकने का दण्डा, को और शूद्र कन्या पहने वस्त्र का किनारा
पकड़ लेवे। ऋतुकाल में अपनी स्त्री से संभोग करे और अमा-
वास्या आदि पांच पर्व दिनों को छोड़ देवे। स्त्रियों की स्वाभाविक
ऋतुरात्रि सोलह हैं। उन में शुरू के चार दिन निन्दित हैं। उन
सोलह रात्रियों में शुरू की चार रात्रि, ग्यारहवीं और तेरहवीं भोग
के लिए निन्दित हैं बाकी दशरात्रि अच्छी हैं। युग्म-सम-छठी,
आठवीं—दशवीं आदि रात्रि में भोग करने से पुत्र और अयुग्म-
पांचवीं, सातवीं-नवीँ रात्रि में कन्या उत्पन्न होती है। इसलिए
पुत्र की इच्छा से युग्म रात्रि में भोग करना चाहिए ॥ ४४-४८ ॥
१०

९. मनुस्मृति।
पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः ।
समे पुमान्पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥ ४६ ॥
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् ।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ५० ॥
पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुत्र और स्त्री के अधिक में
कन्या होती है। और दोनों के समान होने पर नपुंसक सन्तान या
जोड़ा पैदा होता है। वीर्य क्षीण होने से सन्तान नहीं होती।
पहले की दूषित आठ रात्रियों को छोड़कर, बाकी रात्रि में, जिस
आश्रम का पुरुष स्त्रीभोग करता है, वह ब्रह्मचारी के समान
माना जाता है ॥ ४६-५० ॥
न कन्यायाः पिता विद्वान् गृह्णीयाच्छुल्कमण्वपि ।
गृह्णञ्शुल्कं हि लोभेन स्यान्नरोऽपत्यविक्रयी ॥ ५१ ॥
स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवाः ।
नारीयानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम् ॥५२॥
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् ।
अल्पोऽप्येवं महान् वापि विक्रयस्तावदेव सः ॥५३॥
यासां नाददते शुल्कं ज्ञातयो न स विक्रयः ।
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं च केवलम् ॥ ५४ ॥
विद्वान् पिता, कन्यादान में, कुछ भी उसके बदले में मूल्य न
लेवे, यदि लोभ से कुछ ले लेता है तो वह सन्तान बेंचनेवाला है।
कन्या का धन वाहन, वस्त्र आदि जो पिता, भाई आदि अपने भोग
में लाते हैं वे नरक में पड़ते हैं । आर्ष-विवाह में जो एक एक वा
दो दो गौ बैल वर से लिया जाता है-कोई आचार्य कहते हैं-वह
मूल्य है, पर यह मिथ्या है। क्योंकि विक्रय का मूल्य कभी अधिक
कभी कम होता है पर वह नियत है, इसलिये मूल्य नहीं है । जिस

तीसरा अध्याय। ७५

तीसरा अध्याय। ७५
कन्या का, वर का दिया हुआ धन पिता आदि न लें, कन्या को ही
दे देवें, वह भी विक्रय नहीं है। क्योंकि वह कन्याका पूजन-सत्कार
मात्र है ॥ ५१-५४ ॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥ ५५ ॥
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ५६ ॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥ ५७ ॥
स्त्रियों का आदर ।
पिता, भाई, पति और देवर को स्त्रियों का सत्कार
और आभूषण आदि से उनको भूषित करना चाहिए। इससे
बड़ा शुभ फल होता है। जिस कुल में स्त्रियों का सत्कार किया
जाता है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं। जहां नहीं वहां सब
धर्म, कर्म निष्फल होते हैं। जिस कुल में स्त्रियां शोक में रहती हैं,
वह कुल शीघ्र ही बिगड़ जाता है और जहां प्रसन्न रहती हैं, वह
सदा बढ़ता जाता है ॥ ५५-५७ ॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः ।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥ ५८ ॥
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ॥ ५६ ॥
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ ६० ॥
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्तते ॥ ६१ ॥

१६ मनुस्मृति ।
जिस कुल में स्त्रियों का सत्कार नहीं है वह उनके शाप से नष्ट
होजाता है जैसे मारण करने से होजाता है। इस कारण सत्कार
के मौके पर और उत्सवों पर सदा गहना, वस्त्र और भोजन से
स्त्रियों को सन्तुष्ट करना चाहिए। जिस कुल में स्त्री अपने पति से
और पति स्त्री से सन्तुष्ट रहते हैं, उस कुल में अवश्य कल्याण
होता है। यदि स्त्री शोभित न हो तो पति को प्रसन्न नहीं कर
सकती और बिना खुशी, सन्तान नहीं हो सकती ॥ ५८-६१॥
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम् ।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ६२ ॥
कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ ६३ ॥
शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः ।
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥ ६४ ॥
स्त्री भूषित हों तो सारे कुल की शोभा है, नहीं तो परिवार की
शोभा नहीं होती। दूषित विवाहों से, कर्म के लोप से, वेद के न
पढ़ने से और ब्राह्मणों का अपमान करने से उत्तम कुल भी अधम हो
जाता है। शिल्प-भांति भांति की कारीगरी करने से, लेन देन
करने से, सिर्फ शूद्रा स्त्री में सन्तान पैदा करने से, गौ, घोड़ा,
सवारी आदि के खरीद-बिक्री करने से, खेती और राजा की
चाकरी करने से उत्तम कुल बिगड़ जाता है ॥ ६२-६४ ॥
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् ।
कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः॥ ६५ ॥
मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि ।
कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥ ६६ ॥
वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधि ।
पञ्चयज्ञविधानं च पंक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ६७ ॥

तीसरा अध्याय। ७७

तीसरा अध्याय। ७७
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।
कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ॥ ६८ ॥
पञ्चयज्ञ, हवन आदि।
अनधिकारी को यज्ञ कराने से, श्रौत-स्मार्त कर्मों में अश्रद्धा से
और वेद न पढ़ने से उत्तम कुल भी शीघ्र नष्ट होजाते हैं। जो कुल
निर्धन भी वेदाध्ययन रूप सम्पत्तिवाले हैं, वे बड़े कुलों में गिने
जाते हैं और यशभागी होते हैं। जिस अग्नि की साक्षी में विवाह
किया जाता है उसको वैवाहिक कहते हैं। उसमें सायं प्रातः होम,
वैश्वदेव, शान्ति-पौष्टिक कर्म, नित्य पाक आदि वैदिक कर्म गृहस्थ
को करना चाहिए। गृहस्थों के यहां हिंसा के पाँच स्थान होते हैं-
चूल्हा, चक्की, बुहारी, ओखली, और जल का घड़ा इनको काम में
लाने से पाप लगता है ॥ ६५-६८ ॥
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।
पञ्च कॢप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनः ॥ ६९ ॥
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ७० ॥
पञ्चैतान् यो महायज्ञान्न हापयति भक्तितः ।
स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ॥ ७१ ॥
इन दोषों को मिटाने के लिए महर्षियों ने गृहस्थ के लिए पांच
महायज्ञ नित्य करने को रचा है। उनके नाम ये हैं-ब्रह्मयज्ञ-पढ़ाना,
पितृयज्ञ-पितरों का तर्पण, देवयज्ञ-होम, भूतयज्ञ-प्राणियों को
बलि देना, मनुष्ययज्ञ-अतिथि सत्कार करना । इन पाँच महायज्ञों
को जो गृहस्थ, शक्ति भर न छोड़े वह हिंसा दोष का भागी
नहीं होता ॥ ६९-७१ ॥
देवतातितिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः ।
न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्रसन्न स जीवति ॥ ७२ ॥

७८ मनुस्मृति ।
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
ब्राह्मं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ॥ ७३ ॥
जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः ।
ब्राह्मं हुतं द्विजाग्र्यार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ ७४ ॥
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दैवे चैवेह कर्मणि ।
दैवकर्माणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥ ७५ ॥
जो पुरुष, देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता आदि, और
आत्मा इन पाँचों को अन्न नहीं देता वह जीता भी मरा सा है।
कोई ऋषि पाँच महायज्ञों को अहुत, हुत, प्रहुत, ब्राह्महुत और
प्राशित नाम से भी कहते हैं। अहुत-जप, हुत-होम, प्रहुत-भूत
बलि, ब्राह्महुत-ब्राह्मणकी पूजा, प्राशित-नित्य श्राद्ध को कहते हैं।
द्विज, वेदाध्ययन और अग्निहोत्र में सदा लगा रहे। जो देवकर्म
में लगा रहता है, वह इस जगत का पोषण करता है ॥ ७२--७५ ॥
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ७६ ॥
यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ ७७ ॥
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् ।
गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ७८ ॥
क्योंकि—अग्नि में आहुति देने से सूर्य को मिलती है, सूर्य से
वर्षा होती है, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा का पालन होता है।
जैसे सब प्राणी प्राणवायु के सहारे जीते हैं वैसेही सब आश्रम
गृहस्थ के सहारे रहते हैं। तीनों आश्रमों को विद्या और अन्न
दान से गृहस्थही धारण करता है इसलिए सब आश्रमवालों से
गृहस्थाश्रमवाला बड़ा है ॥ ७६-७८ ॥

तीसरा अध्याय । ७६

तीसरा अध्याय । ७६
स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता ।
सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः ॥ ७९ ॥
ऋषयः पितरो देवा भूतान्यतिथयः तथा ।
आशासते कुटुम्बिभ्यस्तेभ्यः कार्यं विजानता ॥ ८० ॥
स्वाध्याये नार्चयेदृषीन् होमैर्देवान्यथाविधि ।
पितॄन् श्राद्धैश्च नॄनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ॥ ८१ ॥
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा ।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ ८२ ॥
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पाञ्चयज्ञिके ।
न चैवात्राशयेत्किंचिद्वैशवदेवं प्रतिद्विजम् ॥ ८३ ॥
इस लोक में और परलोक में सुख चाहनेवालों को गृहस्थाश्रम
का धारण सावधानी से करना चाहिए । क्योंकि ऋषि, पितर,
देवता, प्राणी, और अतिथि सब गृहस्थों से आशा रखते हैं । वेदा-
ध्ययन से ऋषियों का, होम से देवताओंका, श्राद्ध से पितरों का,
अन्न से मनुष्यों का, और बलि से भूत-जीवों का सत्कार करे ।
गृहस्थ को, पितरों की प्रसन्नता के लिए जल, तिल, यव आदि
अन्नों से या दूध, कंद, फलों से नित्य श्राद्ध करना चाहिए। पञ्च-
महायज्ञों में, पितृयज्ञ के लिए एक ब्राह्मण को भी भोजन देना
काफ़ी है, लेकिन वैश्वदेव में सामर्थ्य न हो तो न भोजन दे, पर
एक ब्राह्मण को न खिलाना चाहिए ॥ ७९-८३ ॥
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम् ।
आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् ॥ ८४ ॥
अग्नेः सोमस्य चैवादौ तयोश्चैव समस्तयोः ।
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो धन्वन्तरय एव च ॥ ८५ ॥

८० मनुस्मृति ।
विश्वेदेव के निमित्त गृहाग्निमें द्विजोंको नित्य होमकरना चाहिए
वह आहुति पहले अग्नि और सोम को फिर दोनों को एक वार में,
फिर विश्वेदेवको उसके बाद धन्वन्तरिको देनी चाहिए*॥८४-८५॥
कुह्वै चैवानुमत्यै च प्रजापतय एव च ।
सहद्यावापृथिव्योश्च तथा स्विष्टकृतेऽन्ततः ॥ ८६ ॥
एवं सम्यग्घविर्हुत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।
इन्द्रान्तकाप्यतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥८७॥
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि ।
वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ॥ ८८ ॥
उच्छीर्षके श्रियै कुर्याद्भद्रकाल्यै च पादतः ।
ब्रह्मवास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये बलिं हरेत् ॥ ८६ ॥
कुहू-अमावास्या, अनुमति-पूर्णिमा और प्रजापति को आहुति
दे । द्यावा और पृथिवी को साथ में दे और अन्त में स्विष्टकृत को
आहुति देना चाहिये । इस प्रकार, अच्छी विधि से होम करके सब
दिशाओं में प्रदक्षिणा करे । इन्द्र, यम, वरुण, चन्द्र और इनके
अनुचरों को बलि देय । घर के द्वार में मरुत को बलि देय, जल,
मूसल-ओखली और वनस्पति को बलि देय । वास्तु पुरुष के शिर
पर अर्थात् घर के ईशान कोण में-श्रियै नमः कह कर बलि देय ।
वास्तु के चरण में-भद्रकाल्यै नमः, मध्य में-घर के बीच में-ब्रह्म-
वास्तोष्पतीभ्यां नमः कहकर बलि देय ॥ ८६-८६ ॥
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो बलिमाकाश उत्क्षिपेत् ।
दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नक्तं चारिभ्य एव च ॥ ६० ॥
पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये ।

  • इस प्रकार आहुति करने में यों बोलना-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नी-
    सोमाभ्यां स्वाहा, विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा ।

तीसरा अध्याय। ८१

तीसरा अध्याय। ८१
पितृभ्यो बलिशेषं तु सर्व दक्षिणतो हरेत् ॥ ९१ ॥
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।
वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥ ९२ ॥
विश्वेदेव के निमित्त आकाश में बलि देवे। दिन देवता और रात्रि
देवता को बलि देवे। घर के सब से ऊंचे भाग में 'सर्वात्मभूतये
नमः' कहकर बलि देवे और बलिशेष को 'पितृभ्यो नमः' कहकर
दक्षिण दिशा में पितरों को बलि देना चाहिए। कुत्ता, पतित,
चाण्डाल, कोढ़ी, पापी, रोगी, कौआ, कीड़ों को धीरे से ज़मीन में
ही बलि देना चाहिए ॥ ९०-९२ ॥
एवं यः सर्वभूतानि ब्राह्मणो नित्यमर्चति ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्त्तिः पथर्जुना ॥ ९३ ॥
कृत्वैतद्बलिकर्मैवमतिथिं पूर्वमाशयेत् ।
भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद्ब्रह्मचारिणे ॥ ९४ ॥
यत्पुण्यफलमाप्नोति गां दत्त्वा विधिवद्गुरोः ।
तत्पुण्यफलमाप्नोति भिक्षां दत्त्वा द्विजो गृही ॥ ९५ ॥
भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ।
वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ९६ ॥
नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।
भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद्दत्तानि दातृभिः ॥ ९७ ॥
विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु ।
निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषात् ॥ ९८ ॥
इस प्रकार जो गृहस्थ ब्राह्मण बलि देकर प्राणियों का सत्कार
करता है, वह तेजस्वी परमधाम को प्राप्त होता है। बलिकर्म के
बाद अतिथिसत्कार करे फिर संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा
दान करना चाहिए। गुरु को गोदान करने से जो पुण्य फल
११

८२ मनुस्मृति ।
मिलता है, वही संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा देने से मिलता
है। वेदविशारद ब्राह्मण का आदर करके भिक्षा वा एक जलपात्र
देवे। वेदपाठरहित, मूर्ख ब्राह्मण को अज्ञान से जो भोजन दान
दियाजाता है वह सब निष्फल होजाता है । विद्या और तपसे युक्त
ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में जो हवन-भोजन कराता है, वह महा-
दुःख और पापों से उबारता है ॥ ६३-६८ ॥
संप्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके ।
अन्नं चैव यथाशक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६६ ॥
अतिथि-सत्कार ।
गृहस्थ को आये हुए अतिथि का आसन, जल और अन्नसे यथा-
शक्ति सत्कार करना चाहिए ॥ ६६ ॥
शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः ।
सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥ १०० ॥
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ॥
एकरात्रं तु निवसंन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १०२ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गतिकं तथा ।
उपस्थितं गृहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ १०३ ॥
जो उञ्छवृत्ति 'खेतों से अन्न बीनकर निर्वाह' करता हो और
पञ्चाग्नि में हवन करता हो वह भी यदि अतिथि का सत्कार न
करे तो अतिथि उसके सब पुण्य को ले लेता है । अन्न न हो तोभी
तृणासन, भूमि, जल और मीठी बात ये सत्पुरुषों के यहां सदा
रहते हैं। जो ब्राह्मण एक रात्रि गृहस्थ के यहां निवास करता है
उसको अतिथि कहते हैं । वह नित्य नहीं रहता इसी लिए अतिथि
कहाजाता है। एक गांव में रहनेवाला, हँसी, मज़ाक करके साथ

तीसरा अध्याय। ८३

तीसरा अध्याय। ८३
रखनेवाला स्त्री और अग्निहोत्री ब्राह्मण को अतिथि न मानना
चाहिए ॥ १००-१०३ ॥
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १०४ ॥
अप्रणोद्योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिना ।
काले प्राप्तस्त्याकाले वा नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥१०५॥
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं वातिथिपूजनम् ॥ १०६॥
जो मूर्ख दूसरे के यहां खाने के लोभ से अतिथि बनता है,
वह मरकर अन्न देनेवाले का पशु होता है। जो गृहस्थ के घर
सूर्यास्त के बाद अतिथि आवे समय में या असमय में, तोभी
उसको भूखा न रक्खे। जो अतिथि को न खिलाया हो वह पदार्थ
खुद भी न खावे। अतिथि का सत्कार यश, आयु और स्वर्ग
देनेवाला है ॥ १०४-१०६ ॥
आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम् ।
उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीने हीनं समे समम् ॥ १०७॥
वैश्वदेवे तु निर्वृत्ते यद्यन्योऽतिथिराव्रजेत् ।
तस्याप्यन्नं यथाशक्ति प्रदद्यान्न बलिं हरेत् ॥ १०८ ॥
न भोजनार्थं स्वे विप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत् ।
भोजनार्थं हि ते शंसन्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः ॥१०९॥
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते ।
वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ ११० ॥
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् ।
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ १११ ॥

८४ मनुस्मृति ।
शासन, स्थान, शय्या, सेना और अरदली में जाना, इन सबका
उत्तम अतिथि उत्तम, मध्यम को मध्यम और साधारण से उसके
लायक बर्ताव करना चाहिए । वैश्वदेव के बाद जो कोई अतिथि
आपड़े तो उसको भी भोजन बनाकर खिलावे, पाक में से बलि न
देवे । विप्र को भोजनार्थ अपना कुल, गोत्र न बतलाना चाहिए ।
यदि बतलावे तो वह, वान्ताशी 'उगलन खानेवाला' कहा जाता
है । ब्राह्मण के घर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपना मित्र, जातीय पुरुष
और गुरु ये सब अतिथि नहीं माने जाते । अगर क्षत्रिय अतिथि
बनकर आवे तो ब्राह्मणभोजन के बाद उसको भी खूब खिला
देवे ॥ १०७-१११ ॥
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन् ॥ ११२ ॥
इतरानपि सख्यादीन् संप्रीत्या गृहमागतान् ।
संस्कृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ ११३ ॥
सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीस्तथा ।
अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण के घर वैश्य, शूद्र भी अतिथि रूप से आजाय
तो उनको भी नौकरों के साथ खिला देना चाहिए । और भी
मित्र-सम्बन्धी आदि प्रेम से अपने घर आवें तो स्त्री के साथ
उनको भी अच्छा भोजन देना चाहिए । नवीन विवाहवाली,
कन्या, रोगी और गर्भवती इनको अतिथि के पहिले ही बिना विचार
किये भोजन करा देना चाहिए ॥ ११२-११४ ॥
अदत्त्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्क्ते विचक्षणः ।
स भुञ्जानो न जानाति श्वगृध्रैर्जग्धिमात्मनः॥११५॥
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि ।
भुञ्जीयातां ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ॥ ११६ ॥

तीसरा अध्याय। ८५

तीसरा अध्याय। ८५
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः ।
पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ॥११७॥
अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् ।
यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते ॥ ११८ ॥
इस प्रकार सबको भोजन दिये बिना जो पहले आपही खा
लेता है। मरने पर उसके मांस को कुत्ते और गीध खाते हैं ।
ब्राह्मण, अतिथि, सम्बन्धी आदि को खिलाकर पीछे बचा अन्न
आप और स्त्री खावे । देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घर के
पूज्य देवताओं का पूजन करके शेष अन्न गृहस्थ को खाना चा-
हिए । जो अपनेही लिए भोजन तैयार करता है वह केवल पाप
को ही खाता है, क्योंकि उत्तम पुरुषों को पञ्च महायज्ञ से बचे
अन्न काही भोजन फलदायक होता है ॥ ११५-११८ ॥
राजर्त्विक्स्नातकगुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् ।
अर्हयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ॥ ११९ ॥
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण संपूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ १२० ॥
सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत् ।
वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातर्विधीयते ॥ १२१ ॥
राजा, ऋत्विक्, स्नातक, गुरु, मित्र, जामाता, प्रिय पुरुष और
श्वशुर, मामा, एक साल के बीतने पर घर आवें तो मधुपर्क से
पूजन करना चाहिए। राजा और वेदज्ञ ब्राह्मण साल के भीतर भी
यदि यज्ञ के मौक़े पर आजांयें तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए।
अगर यज्ञमें न आवें तो न पूजन करे। स्त्री को शाम को पकाये अन्न
में से बिना मन्त्र पढ़े ही बलि देना चाहिए । इस बलि को
वैश्वदेव कहते हैं । यह सायंकाल और प्रातःकाल करना
चाहिए ॥ ११९-१२१ ॥

८६ मनुस्मृति ।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चेन्दुक्षयेऽग्निमान् ।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥१२२॥
पितॄणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तच्चामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ १२३ ॥
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥१२४॥
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनैकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ १२५ ॥
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः ।
पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ १२६ ॥
श्राद्ध-प्रकरण ।
अग्निहोत्री द्विज अमावास्या को पितृयज्ञ पूरी करके प्रतिमास
पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध को करे । पितरों का हर मास में जो श्राद्ध
होता है उसको अन्वाहार्यक श्राद्ध कहते हैं । वह उत्तम मांस से
करना चाहिए । उसमें जो ब्राह्मण ग्राह्य हैं और जो त्याज्य हैं
जितने भोजन कराने चाहिएं और जो अन्न चाहिए उसका विस्तार
इस प्रकार है—
देवकर्म में दो ब्राह्मण और पितृकर्म में तीन ब्राह्मण या दोनों में
एक एक ही भोजन कराना चाहिए । धनी पुरुष भी अधिक
ब्राह्मणों के भोजन में न लगे । विस्तार करने से ब्राह्मणों का
सत्कार, देश, काल, पवित्रता और श्रेष्ठ ब्राह्मण इन पाँचों को नष्ट
करता है। इसलिए ज्यादा फैलाव कभी न करना चाहिए।१२२-१२६॥
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये ।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी ॥ १२७ ॥
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ॥ १२८ ॥

तीसरा अध्याय। ८७

तीसरा अध्याय। ८७
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये च भोजयेत् ।
पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ॥ १२६ ॥
अमावास्या के प्रेतकर्म को पितृकर्म कहते हैं। उसको जो करता
है वह नित्य लौकिक फल को पाता है। वेदपाठी, सदाचारी,
ब्राह्मण को ही देव और पितृकर्म का अन्न आदि देना चाहिए, ऐसा
दान महाफल को देता है। देवकर्म और पितृकर्म में एक एक भी
विद्वान् ब्राह्मण को भोजन देने से बड़ा फल मिलता है। पर बहुत
से मूर्खों को भी खिलाने से वह फल नहीं मिलता ॥ १२७-१२६ ॥
दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिःस्मृतः ॥१३०॥
सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते ।
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ १३१ ॥
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च ।
न हि हस्तावरुग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुद्ध्यतः ॥ १३२ ॥
यावतो ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् ।
तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलर्ष्ट्ययोगुडान् ॥ १३३ ॥
वंशपरम्परा से ही वेदज्ञ ब्राह्मण को जान रक्खे क्योंकि वह
ब्राह्मण हव्य, कव्य देने का पात्र है। उसको देने से अतिथि के
समान फल होता है। जिस श्राद्ध में वेद न जाननेवाले दस लाख
ब्राह्मण भोजन करते हों, उसका फल एकही वेदविशारद ब्राह्मण
को भोजन कराने से होता है। हव्य और कव्य ज्ञानवृद्ध ब्राह्मण
को देना चाहिए, मूर्ख को नहीं। क्योंकि रुधिर से सनेहुए हाथ
रुधिर से ही शुद्ध नहीं होते। वेदहीन ब्राह्मण देव और पितृकर्म
में जितने हव्य-कव्य के ग्रास खाता है, उतने ही जलते हुए शूल,
ऋष्टि और लोहगोला यजमान को निगलने पड़ते हैं ॥ १३०-१३३ ॥
ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे ।

८८ मनुस्मृति ।
तपःस्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ॥ १३४ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः ।
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि ॥ १३५ ॥
अश्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः ।
अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ॥१३६॥
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्रियः पिता ।
मन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ॥ १३७ ॥
कोई ब्राह्मण आत्मज्ञानी, कोई तप में तत्पर, कोई तप और
स्वाध्याय में तत्पर और कोई कर्मनिष्ठ ही होते हैं । इनमें ज्ञानी
को श्राद्ध में ग्रहण करे, और देवकर्म में इन चारों को ग्रहण करना
चाहिए । जिसका पिता वेदज्ञ न हो, पर पुत्र वेदपारंगत हो
अथवा पुत्र वेदवेत्ता न हो, पिता वेदपारंगत हो इन दोनों में
जिसका पिता वेदपारगामी हो वह श्रेष्ठ है और दूसरा भी मान्य
होता है ॥ १३४-१३७ ॥
न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः ।
नारिं न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद् द्विजम् ॥ १३८ ॥
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥ १३६ ॥
यः संगतानि कुरुते मोहाच्छ्राद्धेन मानवः ।
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधमः ॥ १४०॥
श्राद्ध में मित्र को भोजन न करावे, मित्रों का संग्रह धन से
करना चाहिए । जो अपना शत्रु वा मित्र न हो उसी ब्राह्मण को
भोजन देना चाहिए । जो श्राद्ध और यज्ञ कर्म में केवल मित्रों को
ही भोजन देता है, उसका फल परलोक में नहीं मिलता । जो
अज्ञानी पुरुष श्राद्ध के द्वारा मैत्री बांधता है उसको स्वर्ग नहीं
होता ॥ १३८-१४० ॥

तीसरा अध्याय । ८६

तीसरा अध्याय । ८६
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतॄंश्च कुरुते फलभागिनः।
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह 'पैशाची द-
क्षिणा' कहलाती है । यह दक्षिणा—जैसे भोजन आदि अंधी गौ
एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।
परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज बो-
कर, बोनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही-मूर्ख-वेदहीन ब्राह्मण
को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से
भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोक में
फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भििरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।
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