मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय । ७६
स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता ।
सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः ॥ ७९ ॥
ऋषयः पितरो देवा भूतान्यतिथयः तथा ।
आशासते कुटुम्बिभ्यस्तेभ्यः कार्यं विजानता ॥ ८० ॥
स्वाध्याये नार्चयेदृषीन् होमैर्देवान्यथाविधि ।
पितॄन् श्राद्धैश्च नॄनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ॥ ८१ ॥
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा ।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ ८२ ॥
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पाञ्चयज्ञिके ।
न चैवात्राशयेत्किंचिद्वैशवदेवं प्रतिद्विजम् ॥ ८३ ॥
इस लोक में और परलोक में सुख चाहनेवालों को गृहस्थाश्रम
का धारण सावधानी से करना चाहिए । क्योंकि ऋषि, पितर,
देवता, प्राणी, और अतिथि सब गृहस्थों से आशा रखते हैं । वेदा-
ध्ययन से ऋषियों का, होम से देवताओंका, श्राद्ध से पितरों का,
अन्न से मनुष्यों का, और बलि से भूत-जीवों का सत्कार करे ।
गृहस्थ को, पितरों की प्रसन्नता के लिए जल, तिल, यव आदि
अन्नों से या दूध, कंद, फलों से नित्य श्राद्ध करना चाहिए। पञ्च-
महायज्ञों में, पितृयज्ञ के लिए एक ब्राह्मण को भी भोजन देना
काफ़ी है, लेकिन वैश्वदेव में सामर्थ्य न हो तो न भोजन दे, पर
एक ब्राह्मण को न खिलाना चाहिए ॥ ७९-८३ ॥
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम् ।
आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् ॥ ८४ ॥
अग्नेः सोमस्य चैवादौ तयोश्चैव समस्तयोः ।
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो धन्वन्तरय एव च ॥ ८५ ॥