मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
‘ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते ।
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२२ मनुस्मृति ।
‘ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते ।
तृतीयं वैष्णवं प्रोक्तं चतुर्थं शैवमुच्यते ॥
ततो भागवतं प्रोक्तं भविष्यदाख्यं ततः परम् ।
सप्तमं नारदीयं च मार्कण्डेयं तथाष्टमम् ॥
आग्नेयं नवमं पश्चाद् ब्रह्मवैवर्तमेव च ।
ततो लैङ्गं वराहं च ततः स्कान्दमनुत्तमम् ॥
वामनाख्यं ततः कौर्मं मात्स्यं तत्परमुच्यते ।
गरुडाख्यं ततः प्रोक्तं ब्रह्माण्डं तत्परं विदुः ॥
ग्रन्थतश्च चतुर्लक्षं पुराणं मुनिपुङ्गवाः ।
अष्टादशपुराणानां कर्ता सत्यवतीसुतः ॥’
सूतसंहिता ।
उपपुराण । मुनियों के बनाये उपपुराण हैं उनके नाम—
१ सनत्कुमारपुराण, २ नारसिंह, ३ नान्दपुराण, ४ शिव-
धर्म, ५ दौर्वासस, ६ नारदीय, ७ कापिल, ८ मानव, ९ औश-
नस, १० ब्रह्माण्ड, ११ वारुण, १२ कालीपुराण, १३ वासिष्ठ-
लैङ्ग, १४ माहेश्वर, १५ साम्ब, १६ सौर, १७ पाराशर,
१८ मारीच, १९ भार्गव ।
‘ अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कीर्त्तितानि तु ।
आद्यं सनत्कुमारेण प्रोक्तं वेदविदां वराः ॥
द्वितीयं नारसिंहाख्यं तृतीयं नान्दमेव च ।
चतुर्थं शिवधर्माख्यं दौर्वासं पञ्चमं विदुः ॥
षष्ठं तु नारदीयाख्यं कापिलं सप्तमं विदुः ।
.....मानवं प्रोक्तं ततश्चोशनसेरितम् ॥
..... वारुणाख्यं ततः परम् ।
.....वासिष्ठं मुनिपुङ्गवाः ॥
[Header] भूमिका । २३
ततो वासिष्ठलैङ्गाख्यं प्रोक्तं माहेश्वरं परम् ।
ततः साम्बपुराणाख्यं ततः सौरं महाद्भुतम् ॥
पाराशरं ततः प्रोक्तं मारीचाख्यं ततः परम् ।
भार्गवाख्यं ततः प्रोक्तं सर्वधर्मार्थसाधकम् ॥'
सूतसंहिता ।
पुराण और उपपुराण।
विष्णुपुराण के गणनानुसार भी यही पुराण हैं केवल
इतना भेद है—छठा नारदीय, सातवां मार्कण्डेय, आठवां
आग्नेय, नववां भविष्य । और देवीभागवत के अनुसार वायु-
पुराण, पुराणों में शिवपुराण, उपपुराणों में है । प्रमाणवाक्य
स्मरण रखने योग्य है—
'मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।
अनापलिङ्कस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक् ॥'
भागवत दो प्रकार के हैं । एक विष्णुभागवत, दूसरा
देवीभागवत । इनमें से एक पुराण, दूसरा उपपुराण है;
क्योंकि दोनों के पुराण होने में कोई प्रमाण वाक्य नहीं प्राप्त
होता । इस दशा में कौन पुराण है ? कौन उपपुराण है ?
इस निर्णय के लिये महाभारत का आश्रय लेकर दोनों
भागवतों का पूर्वापर देख उनके प्रारम्भिक श्लोकों को देखो
और एक को पुराण दूसरे को उपपुराण मान लो ।
सिद्धान्त से जब ब्रह्म के विष्णु-शिव आदि नाम हैं तब
पुराण अथवा उपपुराण में कहीं किसी देव के प्रतिपादन से
उसका उत्कर्ष वा अपकर्ष नहीं है । और यहां— हीं है
'ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् प्रधानाब्रह्मशक्तयः । वचनानुसार
ततो न्यूनाश्च मैत्रेय देवा दक्षादयस्ततः' १ मनु, २ अङ्गिरा,
२४ मनुस्मृति ।
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां यः परः स महेश्वरः ॥ '
इत्यादि वचन भी सूक्ष्मदृष्टि से विचारणीय हैं ॥
उपपुराणों के विषय में कौर्म वचन—
' आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहं ततः परम् ।
तृतीयं नान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥
चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम् ।
दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदीयमतः परम् ॥
कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् ।
ब्रह्माण्डं वारुणं चैव कालिकाद्वयमेव च ॥
माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसंचयम् ।
पाराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम् ॥'
तथा ब्रह्मवैवर्त वचन—
' आद्यं सनत्कुमारं च नारदीयं द्वितीयकम् ।
तृतीयं नारसिंहाख्यं शैवधर्मं चतुर्थकम् ॥
दौर्वासं पञ्चमं षष्ठं कापिलेयमतः परम् ।
सप्तमं मानवं प्रोक्तं शौक्रमष्टममेव च ॥
वारुणं नवमं प्राहुर्ब्रह्माण्डं दशमं स्मृतम् ।
कालीपुराणं च तत एकादशमुच्यते ॥
वासिष्ठलैङ्गं द्वादशं माहेशं तु त्रयोदशम् ।
साम्बं चतुर्दशं प्रोक्तं सौरं पञ्चदशं स्मृतम् ॥
पाराशर्यं षोडशमं मारीचं तु ततः परम् ।
अष्टादशं भार्गवाख्यं सर्वधर्मप्रवर्तकम् ॥'
...नसंहिता के अनुसार १६ उपपुराण हैं। कूर्म के अनु-
द्वपुराण हैं उनमें 'वासिष्ठलैङ्ग' की गणना नहीं
परन्त्र कूर्म के अनुसार भी १८ उपपुराण हैं उनमें...
भूमिका । ६५
‘ नान्द ’ की गणना नहीं की। देवीभागवत में ‘वायुपुराण ’
पुराणों में परिगणित है, परंतु सूतसंहिता आदि के अनुसार
वायुपुराण न तो पुराणों में और न उपपुराणों में है। इसी
प्रकार एक ‘ भागवत ’ की दशा है। विचार करने से उप-
पुराणों की संख्या अष्टादशमात्र नहीं है इस कारण उक्त
और तादृश अनुक्त उपपुराण ही हैं। और उपपुराणों के
अन्तर्गत ‘नारदीय ’ तथा ‘ब्रह्माण्ड’ भिन्न हैं। उपपुराण पुराण ही
से निकले हैं यह मात्स्यपुराण में लिखा है—
‘ पाद्मे पुराणे यत्प्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम् ।
तदष्टादशसाहस्रं नारसिंहमिहोच्यते ॥
नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्तिकेयेन वर्णितम् ।
नन्दापुराणं तल्लोके नन्दाख्यमिति कीर्तितम् ॥
यत्तु साम्बं पुरस्कृत्य भविष्येऽपि कथानकम् ।
प्रोच्यते तत्पुनर्लोके साम्बमेव मुनिव्रताः ॥
एवमादित्यसंज्ञं च तत्रैव परिगण्यते ।
अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणं यत्तु दृश्यते ॥
विजानीध्वं द्विजश्रेष्ठास्तदेतेभ्यो विनिर्गतम् ॥ ’
धर्मशास्त्र वा स्मृति ।
४ । धर्मशास्त्र । ‘ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै
स्मृतिः ’ इस मनु वचन के अनुसार धर्मशास्त्र का दूसरा नाम
स्मृति है। मनु आदि कई एक स्मृतियां अपने अपने कर्ता के
नाम से प्रसिद्ध हैं। स्मृतियों के नामों का क्रम नियत नहीं है
वह भिन्न भिन्न प्राप्त होता है। यहां पैठीनसि के वचनानुसार
छत्तीस स्मृतियों का उल्लेख करते हैं- १. मनु, २ अङ्गिरा,
.६ मनुस्मृति ।
३ व्यास, ४ गौतम, ५ अत्रि, ६ उशना, ७ यम, ८ वशिष्ठ,
९ दक्ष, १० संवर्त, ११ शातातप, १२ पराशर, १३ विष्णु,
१४ आपस्तम्ब, १५ हारीत, १६ शङ्ख, १७ कात्यायन, १८ भृगु,
१९ प्रचेता, २० नारद, २१ याज्ञवल्क्य, २२ बौधायन,
२३ पितामह, २४ सुमन्तु, २५ काश्यप, २६ बभ्रु, २७ पैठीनसि,
२८ व्याघ्र, २९ सत्यव्रत, ३० भरद्वाज, ३१ गार्ग्य, ३२ कार्ष्णा-
जिनि, ३३ जाबालि, ३४ जमदग्नि, ३५ लौगाक्षि और
३६ ब्रह्मगर्भ-स्मृति ।
‘ तेषां मन्वङ्गिरोव्यासगौतमात्र्युशनोयमाः ।
वशिष्ठदक्षसंवर्तशातातपपराशराः ॥
विष्ण्वापस्तम्बहारीताः शङ्खः कात्यायनो भृगुः ।
प्रचेता नारदो योगी बौधायनपितामहौ ॥
सुमन्तुः कश्यपो बभ्रुः पैठीनो व्याघ्र एव च ।
सत्यव्रतो भरद्वाजो गार्ग्यः कार्ष्णाजिनिस्तथा ॥
जावालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिर्ब्रह्मसंभवः ।
इति धर्मप्रणेतारः षट्त्रिंशदृषयस्तथा ॥’
पैठीनसिस्मृति ।
याज्ञवल्क्य ने जो बीस स्मृतिकर्त्ताओं का नाम क्रम लिखा
है वह पैठीनसि लिखितक्रम से निराला है और याज्ञवल्क्योक्त
स्मृतिकर्त्ताओं में ‘बृहस्पति’ तथा ‘लिखित’ के नाम हैं वे दोनों
पैठीनसि के वाक्य में नहीं हैं उनको लेने से ३८ स्मृति हुईं।
- मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ।
यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥
[Header] भूमिका । २७
पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ।
शातातपो वशिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः ॥'
याज्ञवल्क्यस्मृति ।
प्रयोगपारिजात में स्मृतिकर्त्ताओंका नामक्रम पैठीनसि तथा
याज्ञवल्क्य लिखित नाम क्रम से निराला है और अठारह
स्मृति तथा अठारह उपस्मृति का विभाग करके इक्कीस स्मृतिकारों
के नाम और लिखे हैं, जिनमें १ नाचिकेत, २ स्कन्द,
३ काश्यप, ४ सनत्कुमार, ५ शांतनु, ६ जनक, ७ जातूकर्ण्य,
८ कपिञ्जल, ९ कणाद, १० विश्वामित्र, ११ गोभिल,
१२ देवल, १३ पुलस्त्य, १४ पुलह, १५ क्रतु, १६ आग्नेय,
१७ गवेय, १८ मरीचि, १९ वत्स, २० पारस्कर, २१ ऋष्यशृङ्ग
और २२ वैजावाप ये वाईस नाम अधिक हैं इनको पहले
लिखी ३८ स्मृतियों में मिलाने से ६० स्मृति हुईं ।
'मनुर्वृहस्पतिर्दक्षो गौतमोथ यमोङ्गिराः ।
योगीश्वरः प्रचेताश्च शातातपपराशरौ ॥
संवर्त्तोशनसौ शङ्खलिखितावत्रिरेव च ।
विष्ण्वापस्तम्बहारीता धर्मशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥
एते ह्यष्टादश प्रोक्ता मुनयो नियतव्रताः ।
जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकाश्यपौ ॥
व्यासः सनत्कुमारश्च शांतनुर्जनकस्तथा ।
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातूकर्ण्यः कपिञ्जलः ॥
बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च ।
पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥
वशिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः ।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥
२८ मनुस्मृति ।
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्चर्ष्यशृंगो वैजावापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ '
प्रयोगपारिजात ।
कल्पतरु से १ बुध, २ सोम, ३ छागलेय, ४ जाबाल
और ५ च्यवन ये पांच नाम और ज्ञात होते हैं । इनको
६० में मिलाने से ६५ स्मृति हुईं। साधुचरणप्रसाद-महोदयसंगृ-
हीत धर्मशास्त्रसंग्रह से १ आश्वलायन, २ मार्कण्डेय, ३ शौनक,
४ कण्व, ५ उपमन्यु, ६ शाण्डिल्य ये छः स्मृतियां और
प्राप्त होती हैं । इनको मिलाने से ७१ एकहत्तर स्मृति हुई ॥
वृद्ध आदिपद-विशिष्टस्मृति ।
वृद्ध मनु, वृद्ध याज्ञवल्क्य, वृद्ध वशिष्ठ और वृद्ध. शातातप;
इस प्रकार कतिपय स्मृतिकारों के नाम वृद्धपद विशिष्ट प्राप्त
होते हैं । बृहद्विष्णुस्मृति, बृहद्यमस्मृति, बृहत्पाराशरीय धर्म-
शास्त्र; इस प्रकार कई एक स्मृति बृहत्पदविशिष्ट मिलती हैं ।
तथा लघुहारीतस्मृति, लघुशंखस्मृति; एवं कोई कोई स्मृति लघु-
पद विशिष्ट प्राप्त होती हैं । साधुचरणप्रसाद संगृहीत धर्मशास्त्र-
संग्रह से द्विविध आङ्गिरसस्मृति, द्विविध शातातपस्मृति, द्विविध
देवलस्मृति, त्रिविध औशनसस्मृति उपलब्ध होती हैं । इनके
भी कर्ता वही वही ऋषि-मुनि माने जाते हैं और ग्रन्थसंख्या
के बृहत् तथा लघु होने के कारण ग्रन्थकर्ता वा ग्रन्थ बृहत्-लघु-
पद से अङ्कित हुए, वा वृद्ध पद ऋषि-मुनि के नाम में
गौरव के लिये लगाया गया, इसी प्रकार योगिपद । जैसा-
योगि-याज्ञवल्क्य ।
भूमिका । २६
वर्णाश्रमधर्मविचार, शास्त्रप्रकोप और परीक्षा ।
भगवान् मनु ने कहा है कि—
'अर्थे कामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते ।
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥'
.. अर्थ और काम में असक्तों (अलोलुपों) के लिये धर्मोप-
देश है और धर्म खोजनेवालों को धर्मनिर्णयार्थ श्रुति (वेद)
ही सर्वोपरि प्रमाण है । वेद का प्रतिपाद्य कर्म, उपासना और
ज्ञान है । यद्यपि वेदार्थ, ऋग्-यजुः-साम भेद से तथा शाखा-
भेद से अपरिच्छिन्न है; तौभी भगवान् जैमिनि और भगवान्
वेदव्यास के निरूपित सूत्रों से वह परिच्छिन्न हो गया है ।
भलेही कालवश से वेदशाखाओं का लोप हो जाय परंतु
उक्त सूत्रों से वेद-रहस्य रक्षित हो रहा है; इस कारण वर्त-
मान काल में भी अधिकारी के लिये अभ्युदय-निःश्रेयस (भुक्ति-
मुक्ति) का द्वार खुला है । इससे स्पष्ट है कि श्रौत तथा स्मार्त
वाङ्मयमात्र का रहस्य पूर्वोत्तरमीमांसा है और उनके कर्ता
जैमिनि-व्यास वेदपारदृश्वा हैं । इस विषय में पाराशरीय
प्रमाणवचन पहिले लिखा जा चुका है ।
वेद के शब्द और अर्थ-ये दो शरीर हैं। उसमें शब्द-शरीर
की रक्षा-शिक्षा-व्याकरण-निरुक्त और छन्द से है, अर्थ-शरीर
की रक्षा ज्योतिष कल्पसूत्र और उपाङ्ग से है। इस प्रकार
ऋग्-यजुः-सामरूप वेद के शब्दार्थरूप शरीर के अङ्ग तथा
उपाङ्ग सहायक हैं। अङ्ग-उपाङ्ग कहने से यह अभिप्राय नहीं
है कि जैसे लोक में अङ्गोपाङ्ग का समुदायरूप अङ्गी है, वा
अङ्गोपाङ्ग के नाश होजाने से अङ्गी नष्ट होजाता है; किंतु वेद
३० मनुस्मृति ।
के अङ्गोपाङ्ग, वेद के शब्दार्थरूप शरीर के परिचायक-प्रदर्शक-
बोधक माने जाते हैं । जैसे किसी पाठ्य के देवदत्तआदि बोधक
हैं; किंवा किसी दृश्य के सौर आदि प्रकाश प्रकाशक हैं। और
जैसे देवदत्त के अभाव में यज्ञदत्त आदि तथा सौर प्रकाश के
अभाव में आग्नेय-प्रकाश आदि कार्य के साधक हैं, वैसेही
कालवश अङ्गोपाङ्ग के नष्ट हो जाने पर दूसरे अङ्गोपाङ्ग वेद के
सहायक होते हैं । इससे स्पष्ट है कि अङ्गोपाङ्ग के अधि-
कार नित्य हैं और वे स्वरूप से अनित्य हैं और वेद तो
स्वरूप से भी नित्य है । इसीलिये वेद का नाम श्रुति है
‘ श्रूयते गुरुपरम्परया, न तु केनचित् क्रियते इति श्रुतिः ’ जो
गुरुपरम्परा से सुनी जावै और बनाई न जावै वह श्रुति है ।
और अङ्गोपाङ्ग का साधारण नाम स्मृति है ‘स्मर्यते इति स्मृतिः’
जो वेदार्थानुकूल स्मरण की जावै वह स्मृति है । स्मरण के
न्यूनाधिक भाव से ही स्मृतियों के प्रामाण्य में न्यूनाधिक भाव
माना गया है इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
‘ वेदार्थोपनिबन्धत्वात्प्राधान्यं हि मनोःस्मृतम् ।
मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥ ’
वेदार्थ के संकलन करने से मनु का प्राधान्य है और
मनुस्मृति से विरुद्ध जो कोई स्मृति है वह प्रशंसनीय नहीं है ।
यहां यद्यपि मनुस्मृति सजातीय स्मृतियों के लक्ष्य से यह
बृहस्पति का वचन है तोभी वलावल विचार से यथासंभव
अङ्ग और उपाङ्ग भर में प्रामाण्य का न्यूनाधिक भाव मानना
पड़ता है। और यह स्मरण रहे कि अङ्ग और उपाङ्ग की संज्ञा
वलावल विचार में प्रयोजनीय नहीं है, वह वैदिक शब्दार्थ
शरीर के अनुसार की गई है ।
भूमिका। ३१
यह अवश्य विज्ञेय है कि शब्द और अर्थ का नित्य संबन्ध
है, तथा शब्द का दोष अर्थ में संक्रान्त होता है। अतएव
शब्दनिष्ठ स्वर के भेद से अर्थ का भेद हो जाता है। यह बात
शिक्षा-निरुक्त लिखित इस मन्त्र से स्पष्ट है। जैसा—
' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा
मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति
यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ '
स्वर अथवा वर्ण से हीन, अतएव दोषग्रस्त होने से
मिथ्या उच्चारित, मन्त्र-वाक्य; वास्तविक अर्थ को नहीं कहता
है। वह मन्त्ररूप वज्र यजमान को मार देता है। जैसे स्वर
के दोष से इन्द्रशत्रु मारा गया। आशय यह है कि पूर्व
काल में इन्द्रने त्वष्टा के विश्वरूप नामक पुत्र को मारा, तब
त्वष्टा क्रुद्ध होकर इन्द्रको मारनेवाले वृत्र नामक दूसरे पुत्र
की कामना से आभिचारिक यज्ञ किया और ' इन्द्र का
शत्रु होकर बढ़ो ' इस इच्छा से 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' इस वाक्य का
उच्चारण किया। उसमें षष्ठीतत्पुरुष समास के अनुसार
अन्तोदात्त का उच्चारण करना था, परंतु प्रमाद से बहुव्रीहि
समास के अनुसार आद्युदात्त का उच्चारण हो गया, जिसका
विपरीत फल हुआ कि वृत्र को इन्द्रने मारा। अर्थात् ' इन्द्र-
शत्रुः' इस पद का ' इन्द्रस्य शत्रुः ' ऐसा तत्पुरुष समास
करने से ' इन्द्र का शत्रु.' यह अर्थ होता है; और ' इन्द्रः शत्रु-
र्यस्य सः ' ऐसा बहुव्रीहि करने से ' इन्द्र है शत्रु (मारने
वाला) जिसका ' यह अर्थ होता है। यह विषय वैयाकरणों
में अति प्रसिद्ध है।
४२ मनुस्मृति ।
इसी प्रकार–" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " इत्यादिक श्रुति में
विज्ञान-पद में मतुबर्थीय अच्प्रत्यय कल्पना करके 'विज्ञानरूप '
ऐसा परम्परा गत अर्थ को न मानकर ' विज्ञानवान् ' ऐसा नवीन
अर्थ कल्पना करते हैं। अर्थात् विज्ञान-पद से ' विज्ञानवान् ' यह
अर्थ निकालने के लिये जब ' विज्ञानमस्यातीति विज्ञानम्=जिस
के विज्ञान है वह विज्ञान=विज्ञानवान्' ऐसी व्याख्या की जाती है
तब ' विज्ञान ' पद अन्तोदात्त होगा, परंतु ' विज्ञायते यत् तत्=
जो जाना जाय ' ऐसी परम्परागत व्याख्या से ' विज्ञान ' पद
स्वरित स्वरान्त है। आशय यह है कि जो गुरुपरम्परा से सस्वर-
वेद पढ़े हैं वे लोग ' विज्ञान ' पद को स्वरित ही पढ़ते हैं, तब
पूर्वयुक्ति से ' विज्ञान ' पद को अन्तोदात्त बना डालना कैसा
अनर्थ का काम है ? शिव शिव, हरे हरे । एवं साहस करने
ही से वेददूषक-ब्रह्मघ्न आदि उपाधि के पात्र बनते हैं।
इसी प्रकार–" कृष्णोऽस्याखरेष्ठोऽग्नये " इस सुप्रसिद्ध
यजुर्वेदीय-मन्त्र में ' कृष्ण ' पद आद्युदात्त पढ़ाजाता है
जिससे वहां ' कृष्ण ' पद का मृग अर्थ परम्परा प्राप्त है।
यदि ' कृष्ण ' पद अन्तोदात्त पढ़ा जाय तो वर्णवाची हो
जायगा इत्यादि ।
इन बातों से साफ जाहिर होता है कि वेदों में थोड़े ही
हेरफेर से अर्थ का अनर्थ होजाता है इसी भय से पूर्वकाल
में वेद अयातयाम ( ताजे ) बनारक्खे जाते थे उनके यथार्थ
धारण करनेवाले ' ऋषि ' तथा ' मन्त्रद्रष्टा ' कहलाते ,
थे और गुरुमुख से यथावत् उनको पढ़नेवाले ' अनूचान ' नाम
से विख्यात होते थे । मनु ने लिखा है–
भूमिका । ३३
‘ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ ’
बड़ी अवस्था होने से या बाल पकने से या धनवान् होनेसे
या सुयोग्य बान्धवों से महत्त्व नहीं प्राप्त होता है। ऋषियों ने
नियम किया है कि जो अनूचान ( साङ्गवेद का अध्येता ) है
वही हमारे महान् है।
कालवश जब क्षत्रियसम्म्राट् का अभाव हुआ, वर्णाश्रम की
शिक्षाप्रणाली शिथिल होगई, वैदिक शुद्धज्ञान लुप्तप्राय होगया;
तभी से वर्णाश्रमव्यवस्था में चलनेवाले मनुष्यों की वृत्तियां
बदल गईँ, नानाप्रकार की धार्मिकशिक्षा चलपड़ीं, ब्राह्मण धर्म-
ध्वज बन गये, मनमानी धार्मिक व्यवस्थाएं करने लगे, अपने
अपने मतों के पुष्टि के लिये श्रुति स्मृतियों के यथेष्ट व्याख्यान
होने लगे, ग्रन्थों में नानाविध वाक्य मिला दिये गये, श्रुति
स्मृति के नाम से कितने एक नवीन ग्रन्थ बना डाले गये,
यहां तक, कि कईएक स्थलों में आर्ष और पौरुष विवेक संदेह-
सागर में डूब गया।
काल की महिमा है कि जो व्याकरण-न्याय वेदार्थ की
रक्षा के लिये पढ़े पढ़ाये जाते थे, जिनके बदौलत वेद के
शब्द और अर्थ से शरीर में किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं पहुँ-
चती थी वही ( व्याकरण-न्याय ) अब विपरीतभाव के लिये
उपस्थित किये कराये जाते हैं। व्याकरण-भाष्य में वारंवार
दिखलाया है कि वेदों के रक्षार्थ व्याकरण है। परंतु अब
वेदों का मनमाना अर्थ करने के लिये व्याकरण-चीर तयार
किया जाता है। और न्यायदर्शन में कहा है कि तत्त्वनिर्णय
३४ मनुस्मृति ।
के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा हैं । परंतु इस समय अपने अपने
मतों के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा का प्रयोग होता है ।
प्रसङ्गवश यह कहना पड़ता है कि चार्वाक, बौद्ध और जैन
वेददूषक अवश्य हुये हैं, पर उनसे वैदिक धर्म पर ऐसा आघात
नहीं पहुँचा कि जिसका प्रतीकार न हुआ हो। क्योंकि वे सब
खुल्लमखुल्ला वेददूषक हुए इस कारण समय समयपर उनकी
चिकित्सा भी होती गई । पर इस दुर्बल धार्मिक-संस्था में जो
प्रच्छन्न (गुप्त) चार्वाक आदि प्रबल हो रहे हैं इनका शासन
अतिकठिन क्या, बल्कि अशक्य सा होरहा है । इस शोचनीय
दशा का उल्लेख विद्याँ (दार्शनिकनिबन्ध) में यों आया है—
'प्रत्यक्षीक्रियतेऽद्य वेदपुरुषो व्याख्याकशालाञ्चितो
दृश्यन्ते स्मृतयोऽपि दुर्बलदशाः स्वेच्छा 'नियोगाङ्किताः ।'
तर्कोद्भावनया पुराणघटनोपन्यासतां नीयते
'क्षुभ्यद्धर्ममृगान्तरेषु वलते शार्दूलविक्रीडितम् ॥
साध्यन्ते परमोहनाय शतधा साध्यानि वेदादितो
वेदार्थेष्वपि साध्यभङ्गसमये श्रद्धाऽन्यथोत्पाद्यते ।
आपातामलवस्तुसंगतिकथाव्याजृम्भणाडम्बरै-
राशूपाजितगौरवं प्रतिसभं निःशङ्कमाभाष्यते ॥
आस्तिक्यं प्रथयन्ति धर्मविषये भस्मोर्ध्वपुण्ड्रादिकै-
रन्तर्ध्वस्तसमस्तशास्त्रविधयो नास्तिक्यमध्यासते ।
मन्ये प्राग्यत एव वेदविटपी शाखासहस्रं दधौ
तस्मादेव धरामरेन्द्रकुलतः संप्रत्युपैत्यत्ययम् ॥ '
१ 'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जलपवितण्डे बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखा-
वरणवत्' गौ० सू०
२ यह निबन्ध उक्त पूज्यपाद श्रीद्विवेदी जी कृत है ।