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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

श्रीकृष्णका गरुड़को कबीर साहबको गुरु बनानेकी आज्ञा देना

( ७० )

गङ्गबोध

श्रवण लगाय गीता उन सुनी । रहनि गहनि एको नहिं गुनी ॥
रहनि गहनि उनहुँ नहिं पायी । अर्थ सुनी सब कान उडायी ॥
सुनि सुनिसो सब जग अरुझावे । सांचा भेद न कोई पावे ॥
उनहुँ अचार विचार न छूटा । ब्रह्मा विनशे यम सो लूटा ॥
श्रवण अवाज सबहिंकी लीन्हे । रहनी गहनी कोइ न चीन्हे ॥
अहमेव कीन्हो अधिकारा । ताते जाहि गले सोहि मारा ॥
करै विचार पाखण्ड छूटे । भर्म विगुर्चन यमकी लूटे ॥
पण्डित बाँचि गीता अथावे । गीता केर अर्थ नहिं पावे ॥
फिर फिर हमहीं को ठहरावे । पंडित अँधरा भेद न पावे ॥
सुनहु गुरुड यक शब्द हमारा । होय निर्गुण जिव केर उवारा ॥
हम कबीर कै निज करिजाना । उनहीं सकल कीन मण्डाना ॥
उन्ही सब अस्थान हटाया । जहाँ ले तीर्थ तिन सबहि गढाया ॥
जहाँ जहाँ उन चरण छुआया । सोइ सोइ तीर्थ अस्थान बनाया ॥
आपु जानिके चर्ण जो दीन्हा । यहि विधि सबको थापन कीन्हा ॥
वही मानि सब काहु लीना । आप गुप्त होय काहु न चीना ॥
इन सबही मिलि बाजी लायी । आप आपकी कीन बढाई ॥
जिनकी आज्ञा सब कछु भयऊ । तिनको छिपाये तीनों दयऊ ॥

सारखी-कहैं कृष्ण कबीरसों, गुरु तुम करो कबीर ।

हंस लै जइहैं लोक के, खेइ लंगैहैं तीर ॥

चौपाई

चरण टेकिके गुरुड रिगायी । कीन्हो भेंट द्वारका जायी ॥
वृन्दावन होय आज्ञा लीन्हा । दर्शन जाइ द्वारका कीन्हा ॥
चरण टेकि प्रदक्षिण दीन्हा । मस्तक नाइ बन्दगी कीन्हा ॥
समरथ कहो मोहि समझायी । आरति साज मैं लेउँ मैगायी ॥
तब हम उनपै पूछे लीन्हा । कहो कृष्ण आज्ञा कस कीन्हा ॥

गरुड़का आरतीका साज इकट्ठा करना

बाधसागर

( ७१ )

गरुड वचन

तबही गरुड कह्यो अर्थाई । अस्तुति कीन्ह बहुत लौ लाई॥
एको बात गोंय नहीं राखी । कृष्ण बहुत कै अस्तुति भाखी॥
निर्गुण के हम गम्य न जाना । बहुत भाँति उन गम्य बखाना॥
उनतो निर्गुण गम्य बतावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा॥
औ हम उन कहँदल जो दीन्ह। उन आवे की आज्ञा कीन्ह। ॥

सत्गुरु वचन

तब हम उनको भेद बतावा । एकोत्तर से नरियर फरमावा ॥
बहुत जतन कै मंडप छावा । बहु अतुरागी साज सजावा ॥
जेतके साधु द्वारका आया । सबको गरुड कानि बुलवाया ॥
जेतिक साधू तहाँ रहाये । गरुड सबहिंको दल पहुँचाये ॥
जहाँ ले सुनि हैं सहस अठासी । नाग लोकके नाग जो वासी ॥
वासुकि देव जो आपु रहाये । औरो नाग बहुत चलि आये ॥
आय विष्णु ब्रह्मा दोउ भाई । शीव आय बहु तेज जनाई ॥
सब पर तेज महादेव कीन्ह। तुम सब मिलिके गरुडहि चीन्ह। ॥
तबहि गरुड पूछा सहिदानी । जोई कृष्ण कहा मोहि बानी ॥

गरुड वचन

सुनहु ब्रह्मा विष्णु मदेशा । यह मुहि कृष्ण कहा उपदेशा ॥
एति समय बीति जब जायी । तब हम तुमसों कहब बुझायी ॥
जोइ कृष्ण सब कहा विवेकी । सो तुम्हरी मति आँखिन देखी ॥

महादेव वचन

यह सुनि महादेव रिसियाने । हमरी गति तुम काहु न जाने ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमहीं छोड़ि अवर चित लाई ॥
तुम हैं पंछी मतिके हीना । हमहिंछोड़ि औरहिं चित दीना ॥

महादेवका बोध करना और गरुड़का उन्हें समझाना

( ७२ )

गरुडबोध

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । मति हमारि कोइ विरले पायी॥
अजर अमर घर पहुँचे सोई । मती हमार लखै जो कोई ॥
अवसर वीति जबै यह जायी । तब महादेव हम कहब बुझायी॥
सब साधुन की करिये सेवा । यह निज आहि भक्तिको भेवा॥
सबको गरुड जो भोजन दीन्हा । बहुत यतनकै भक्ति सो कीन्हा॥
करि प्रसाद जब माँड मैडायी । हमसे पूछी विन्ती लायी ॥
तबहि गरुड विन्ती अनुसारी । चलिये समरथ चौक विस्तारी॥
धर्मदास सुनि चौका कीन्हा । लोक समान पयाना दीन्हा ॥
संत समाज सब गावहिं गाजी । ऐसी भक्ति भक्त भल साजी ॥
बजो शंख वीन स्वर सोई । झांझन केरी बाजन होई ॥
ताल मृदंग गगन सो बाजै । ऐसी भक्ति भक्त भल छाजै ॥
शब्द स्वरूप तबै हम भयऊ । तुरत जाइ सत्यलोकहि गयऊ॥
सकलो साज वहां ते आना । बहुत भाँतिकी भक्ति जो ठाना ॥
सत्यलोक ते उतरे अंशा । अधम कालका भया विध्वंशा॥
सब समेत साज जो आये । जग मग ज्योति बरनिनहिं जाये
निर्गुण भक्त हो सुरति संजोई । कौतुक देखि रहे सब कोई ॥
नाग लोक को कीना मोही । ऐसी भक्ति न देखी कोही ॥
शेषनाग भये आपु मोहाने । औरकी बातें काहि बखाने ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद मोहे शुकदेव शेशा ॥
गण गंधर्व मोहे सब झारी । निर्गुण भक्ति न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यह समाज सो कैसो आई । ताहि देखि सब रहैं झँवाई ॥
ताते रंग उठे ततकारी । मोहि रहे सब सभा विचारी ॥
मोहे विष्णु वैकुण्ठके वासी । मोहे इन्द्र रुद्र लोक कैलासी ॥

गरुड़की आरतीमें सब देवोंका आना और गरुड़का परवाना लेना

बोधसागर

( ७३ )

मोहे इन्द्र और उरवशी । नौ लख तारा सूरज शशी ॥
यहि विधि कीन्ह भक्ति मनलायी । तनमन सुधि सकलौ बिसरायी ॥

साखी-तेतीस कोटि देवता, गण गन्धर्व सब झार ।
सुर असुर सबही थके, लीला नाम अपार ॥

चौपाई

धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुडजी ध्यान तुम्हारा ॥
धन्य कबीर जिन भक्त उधारा । भक्ति ज्ञान का कीन पसारा ॥
धन्य गुरुड सबही अस कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदय चित दीन्हा ॥
भक्ति मंडान पहर दोय भयऊ । तहैं हम उठिके आरति कियऊ ॥
आरति भइ पुनि बहुते भांती । बरणि न जाय शोभाकी कांती ॥
एकोतर नरियर मालुम कीन्हो । बाँटि प्रसाद सबनको दीन्हो ॥
सत्य सत्य सबन मिलि कीन्हा । धन्य गुरुड तुम यह मति लीन्हा ॥

गुरुड वचन

विन्ती करै गुरुड चित लायी । सबसे करब हम चर्चा जायी ॥
दया करहु हम पैं गुरु देवा । तीनों देव सो कहिहो भेवा ॥
हम तो चरचा करब गुसाई । हमको दो लखाइ सब ठाई ॥

ज्ञानी वचन

अहो गुरुड तुम हौ बड ज्ञानी । विद्या देहु सब घरके जानी ॥
घर आयेसे राड न कीजै । क्षमावंत हो बिदा सब कीजै ॥
बिदा देहु सबही सावधाना । तिनके घर तुम करिहो ज्ञाना ॥
अस्तुति ठानि चले सब देवा । धन्य कबीर देवनके देवा ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि आज्ञा लीन ।

अपने अपने लोक को, सबही प्याना कीन ॥

चौपाई

सबको बिदा जबहि करि दीन्हा । तबहिं गुरुड अस कहबे लीन्हा ॥

गरुड़का त्रिदेवसे चर्चा करने जाना

( ७४ )

गरुडबोध

गरुड वचन

हमको हुक्म तुम देहु गुसाईं । तुव प्रताप करौं बडाईं ॥
तुमरी कृपा काल हम जीता । सबही भांति छुटी मन चीता ॥
तुमरी दया आश सब झूटी । भया निराश तब फन्द़ा टूटी॥
अब मनमें मोहीं यक आवै । चरचा करनकौ मनमें भावै ॥
जो आज्ञा हम तुम तुमरी पावै । फिरि सर्बहिं सो चर्चा लावै॥
त्री देवन सों कहूँ बुझायी । तिन कर फँद सब देहुँ तुडायी ॥

ज्ञानी वचन

तब हम तिनको बहु समझावा । निर्गुण सगुण सब भेद बतावा॥
पाईं भेद गरुड मनसाने । त्रिदेव सो चरचा मन आने ॥
तब हम आज्ञा तेही दीना । हमहू बिदा तहाँ से लीना ॥
साखी-दया लेइ गरुड चले, हृदये धरि गुरु ज्ञान ।
ब्रह्मपुरी ठाढे भये, चर्चा कर मन ठान ॥

चौपाई

हुते द्वारका ज्ञान मडाना । गरुड वहाँते कीन्ह पयाना ॥
जाइ सुमेरु पर बैठे जायी । कीन्हो भेंट ब्रह्म सों आयी ॥
गरुड ब्रह्म लोकहि जब आये । ब्रह्मा आदर कीन्ह बनाये ॥
आदर भाव ब्रह्मा तब कीन्हा । डारि सिंहासन बैठक दीन्हा ॥
जल करजोरि ब्रह्म लइ आये । गरुड के चरण पखारन आये॥

ब्रह्मा वचन

धन्य गरुड यहाँ पगु धारी । अब पूरी सब आश हमारी ॥
तुमतो बाहन कृष्ण के भाई । आज कृष्ण पग धारे आई ॥
जो तुम हमपर दया कीन्हा । कृष्ण बदल हम तुमकर चीन्हा॥
आयसुमौंगिप्रसाद जो भयञ्ज । करि प्रसाद वैकुण्ठमें गयञ्ज ॥
पान फूल जो अगर मैगायञ्ज । इच्छा भोजन तहँवा पायञ्ज ॥

बोधसागर

( ७५ )

बैठे जाय पुनि गरुड समाजा । उठि तब चर्चा निर्गुण साजा॥
ब्रह्मा कह तुम कैसे आये । सो मोहि वचन कहो समुझाये॥
कौन काज यहाँ पगु धारा । कहे ब्रह्मा तुम कृष्णके प्यारा॥

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । तुमहिं चितावन आयउँ भाई ॥
तुमहिं चितावन हौं पगुधारा । आदि पुरुष वह रहै नियारा ॥

साखी-विनु देखे को जाय यह, नहिं पावे कोइ ठाम ।

जन्म अनेक भरमत फिरे, मरे विनु गुरुके नाम ॥

आदि पुरुष आगम है, जाको सकल प्रकाश ।

निर्गुण भेद अपार है, तुम कहैं बांधी आश ॥

चौपाई

कोटिन ब्रह्मा गये सिरायी । अविगतकी गति काहु न पायी॥

कोटिन ब्रह्मा पृथ्वी विलाने । अविगतकी गति काहु न जाने॥

कोटिन विष्णू गये सिरायी । फिरि फिरिकै पृथ्वीहु विलायी॥

कोटिन रुद्र देह धरि लीना । अस्थिर होय जगत्सो कीन्हा॥

कोटिन इन्द्र अवतार जोलीन्हा । अविगति पुरुष काहु नहिं चीन्हा॥

गण गंधर्व नर कौन चलावै । सनक सनन्दन पार न पावै ॥

शेष नाग बहु भांति भुलाने । आदिपुरुषकी खबरि न जाने॥

सब परिवार जो भूले भाई । अवगति की गति काहु न पाई॥

भुला देखि जिव दथा न आई । जीव अनेक घात किहु भाई ॥

सब भूले कोइ लागु न तीरा । महा अधम सो आहि शरीरा॥

देह धरी सब भरमें आई । आपन आप सब करै बडाई ॥

अहमेव कैसे खोजेहु जाई । मांताको कहा न कीनेहु भाई ॥

१ जिन २ पुस्तकों में सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका वर्णन आया है, उन सबोंमें आद्याकी आत्माको न मान कर हठ करके ब्रह्माका निरंजन के खोजमें जानेका वर्णन आया है वहासे जानना चाहिये और यथार्थ भेद गुस्ते ।

( ७६ )

गुरुवोध

कीन्होखोज तुम आपुगुमाना । नहिं पाये तब रहे लजाना ॥
खोजकीन्हो जब अन्त न पावा । तब तुम आप आप ठहरावा ॥
आपु दृढाय थापना कीन्हा । सोई अहम् निर्गुण नहिं चीन्हा ॥
तुमरे भूले जगत भुलाना । आदिपुरुषको मर्म न जाना ॥
यहि विधि जग सब रहत भुलायी । टीका मूल काहु नहिं पायी ॥
तेतीस कोटी देव भुलाये । यहि भूले कोह गम्य न पाये ॥
सारखी-भूले गम्य न पाइया, भूले मूठ गँवार ।
टीका भूल न जानई, अरुझि रहा संसार ॥

चौपाई

तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमतो सब दुनियाँ भरमाये ॥

ब्रह्मा वचन

सुनि ब्रह्मा तबहीं रिसियाने । हमते दूजा केहि को जाने ॥

गुरु वचन

सुनु ब्रह्मा यक वचन हमारा । तुम अस ब्रह्मा कोटि हजार ॥
कोटिन ब्रह्मा ठाढ़े द्वारा । कोटिन वेद सो करहिं उचारा ॥
खोज करन ब्रह्मा तुम गयऊ । कहूँ पिता के अन्त न पयऊ ॥
झूठ कहे मातासों जायी । ताते ब्रह्म शाप तुम पायी ॥
माता ते तुम भये लबारा । आय जीवमें सकल संसारा ॥
सबकी प्रतिमा थीर न आयी । आपु समेत सकलो भरमायी ॥
जो कोह कहै भूलकी वानी । कोटिन जन्म नरककी खानी ॥
यह संसार रहट की घरिया । कइक बार राजा अवतरिया ॥
कइक बार नरक में परई । कइक बार ब्राह्मण औतरई ॥
यहि विधि जीव आवे जायी । भरमि भरमि चौरासी पायी ॥
कोटिन बार अस्थावर जानी । कोटिन बार पिंडज उत्पानी ॥
कोटिन जन्म अंडज अवतारा । यहि विधि भरमहिं जीव विचारा ॥
यहि विधि भरमें जीव विचारा । विनु सतगुरु नहिं होय उबारा ॥

ब्रह्माका विमान भेजकर विष्णु और महादेवको बुलाना

बोधसागर

( ७७ )

साखी-कहे गरुड समझाइके, सुनहु ब्रह्म यह बात ।
अविगत पुरुष सु और है, जाके माय न तात ॥

ब्रह्मा-वचन चौपाई

सुनि ब्रह्मा तब पूछे बानी । कैसे अविगतिकी गति जानी ॥
कौनी युक्ति साच कै मानी । साहिबकी गति कैसे जानी ॥

गरुड वचन

गरुड कहै तुम आपही ज्ञाना । जहाँ गर्व तहाँ पुरुष छिपाना ॥
गर्व गुमान में जो है पूरा । रहै सदा सो धूर अधूरा ॥
साखी-मानुषदेह अपराधि है, देह धरे अभिमान ।
ताते सबै विगुचै, भक्ति मर्म नहिं जान ॥

चौपाई

भक्ति जो आदि अंतसे आयी । जाते सकल माँड निर्मायी ॥
ताकर मर्म जो जाने नायी । ताते काल फांस निरमायी ॥

साखी-लोक वेद जानै नहीं, करै भक्ति अभिमान ।
ताते सबै विगुरचे, भक्ति करन का जान ॥
ध्वजा जो फरके शून्यमें, बाजे अनहद तूर ।
तकिया है मैदान में, पहुंचेगा कोइ शूर ॥

ब्रह्मा वचन-चौपाई

ब्रह्मा कहै गरुड सुनु भाई । अपने मुख तुम करहु बडाई ॥
इतना ब्रह्मा किया विचारा । देव विमान तुरत भये ठाढ़ा ॥
कहे ब्रह्मा तुम जाहु विमाना । लाओ विष्णु बुलाइ सयाना ॥
चला विमान विष्णु पै गयऊ । तबहि विष्णु अस पूछनलयऊ ॥
कहो विमान कहाँ पगु धारे । सत्य सत्य कहो वचन सम्हारे ॥

विमान वचन

गरुड भक्त यक आया देवा । सो नहिं माने तुम्हरी सेवा ॥

( ७८ )

गरुडबोध

सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥
विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥

विष्णु वचन

केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥
हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥
भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥
गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥
सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥
महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥
शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥
ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥
गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥
बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥
तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥
ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥
इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥
सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥
आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥
सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥

गरुड वचन

अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥

ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत

बोधसागर

( ७९ )

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । गुरुडको ज्ञान सुनो विख्याता॥
हम तीनों अवरे नहिं कोई । हमरे परे सुनावै सोई ॥
ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । हमको कहत है परलय घाता॥
हम तो तीन लोकको कीन्हा । हमको सकल देवता चीन्हा ॥

गुरुड वचन

तबहि गुरुड यक वचन उचारा । जब कर्ता तुम सृष्टि सव्वारा ॥
वह साहब सबही ते न्यारा । कस नहिं ताकर करो विचारा॥
जिन साहब तुम्हें निर्मायी । तुम कस ताको नाम छिपाई॥
विष्णु रहत हैं तुम्हरे पास । तिनहुं को पुनि काल गरासा॥
क्रोधवंत ब्रह्मा तब भयेऊ । अचरज बात गुरुड जो कहेऊ॥
जाकी तैं पुनि सेवा करई । सो तो हमरे त्रास महँ डरई ॥
सुर नर सुनि सब काहू चीन्हा । सुनु पंछी तैं मतिका हीना ॥
लोक वेद सब हम कहैं जाने । न जानूं कस आप चित आने॥

गुरुड वचन

सुनु ब्रह्मा तैं गर्व भुलासी । तोहि अस ब्रह्म कोटि मरासी॥
हम तो ब्रह्मा बहुत जो देखा । जी पूछहु तो काढों लेखा ॥
काढों विष्णु कोटि सै चारी । महादेव जाके भंडारी ॥
मैं तो भक्त कवीरका चेला । युगन युगन जिन कीन्हो मेला॥
हमसों कह्यो कवीर बुझायी । ताते आय कह्यो गोहराई ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कोपि उठे तब भाई । विष्णु महादेव सुनहुँ आई ॥

विष्णु वचन

आये दूनों जन ब्रह्मा ठाई । विष्णु कहै कस मता दिढाई ॥
काह आज जिव बहुत उदासा । कीन्हो क्रोध गुरुड के पास ॥
कहो वचन मुख होय प्रकाश । हम अजान है तुम्हरे आसा ॥

( ८० )

गरुडबोध

ब्रह्मा कहै सुनो हो भाई । अविगत की गति गरुड सुनाई॥
हमहीं तीन अवर नहिं कोई । चौथे एक निरंजन सोई ॥
ताको गरुड न माने भाई । ताते मोहि कोध भौ आई ॥
तिहि कारण हम तुम्हें बुलावा । गरुड ज्ञान हमहीं समझावा ॥

विष्णु वचन

विष्णु कहैं सुनो गरुड विचारी । आदि अंत कोई अगम है भारी॥
एक ध्यान हमहूं नहिं कीना । अविगति बात हमहूँ नहिं चीना॥
अहमेव मटी सुरत लगाया । अविगति ध्यान तबहूँ नहिं पाया॥
ध्यान मध्य हम देखा जाही । ब्रह्मा विष्णु महादेव नाहीं ॥
साखी-विष्णु नहीं ब्रह्मा नहीं, माहादेव नहिं कोय ।
ओम्ओंकार तहवाँ नहीं, निरखि देखा हम सोय ॥

ब्रह्मावचन-चौपाई

तब ब्रह्मा अस वचन उचारा । यह है बड़ा काल वटपारा ॥

विष्णु वचन

सुनु ब्रह्म अविगती कहानी । विना तत्त्व मैं निरखा बानी ॥
ताकी का कहिये अब वाता । अगम अपार कहूँ विरुगता ॥
साखी-निःकामी निध्यानि सोई, निज्जेमी निर्वान ।
कहै विष्णु ब्रह्मा सुनो, अविगति यहि विधि जान ॥

चौपाई

ब्रह्मासों कहै विष्णु बखानी । है कोई आदि पुरुष निर्वानी ॥
दुर्वासा संग रहे जब भाई । अविगतिकी गति तब हम पाई ॥
तबका बोल हम कीन्ह परमाना । ताते हम जानहिं निरवाना ॥
दुरवासा गुरुभक्ति दृढाया । तब ते हमहु परम पद पाया ॥

साखी-ब्रह्मा हमकहैं जानहुँ, और न कोई सांच ।
दृढा ज्ञान नहिं आवई, ताते काया कांच ॥

गरुड़ और महादेवका वार्तालाप

बोधसागर

( ८१ )

ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥
हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥
हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥
हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥
हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥
इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥

गुरुड वचन

कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥
सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥
वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥
जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥
जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥
रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥
जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥
तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥
अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥
तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥

महादेव वचन

कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥
सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥
दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥
तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥
गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥
इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥

( ८२ )

गरुडबोध

सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु ।
देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥

चोपाई

निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥
वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥
नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥
वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥
बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥
नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥
सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥

ब्रह्मा वचन

सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥
अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥
सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥
साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ ।
तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥

गरुड वचन चोपाई

ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥
तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥
तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥
सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥
सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥
वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥
वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥

१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।

तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद पूछनेको जाना

बोधसागर

( ८३ )

साखी-कहो ब्रह्मका भूलहू, कहौं तोहि समुझाय ।
मोर मोर कै धावहू, ममता अमल चलाय ॥

चोपाई

ममिता ते दशों अवतारा । ममिता महादेव धरु छारा ॥
ममिता लोमश योग जो कीन्ह। आयु बढी भगती नहिं चीन्ह।।
ममिता ते आपुहिं जो रहेऊ । ममिता ते तीन लोक बहि गयऊ।।
ममिता तेज निरञ्जन कियऊ । ममिता ते पुरुष दरश नपयऊ।।
तुम ब्रह्मा कीन्हे अभिमाना । तेहिंते साहब अछय छिपाना ॥
साखी-ब्रह्मा गर्व तुम कीनिया, सुनि राखू यक बात ।
जो साहब अभि अंतरे, सोई सदा सँघात ॥
तुम अज्ञानी नहिं जानहू, सुनु ब्रह्मा यक बात ।
अविगति अगम अपार है, समरथ सदा सँघात ॥

विष्णु वचन-चोपाई

विष्णु कहैं सुनो हो भाई । चलहू तुरत ज्योति पहुँ जाई।।
ज्योति कहैं सो सुनिये भाई । सब मिल चलहु साँचके आई।।
आंखिन देखी पूछि न जाई । पाय अभिमान चीन्हे नहिं पाई।।
अभिमान मता सब दूर दीजे । साँच बस्तुको धारण कीजे ॥
अभिमान समेत चीन्हे नहिं कोई । देह धरी सब गये विगोई ॥
आपा थापि सुधि बुधि खोई । आपा छोडे पावे सोई ॥

महादेव वचन

तब महादेव कहैं विचारी । अहो विष्णु पूछहु महतारी ॥
जो वह कहैं सो हम तुम मानैं । औरी बात नाहिं हम जानैं ॥
ब्रह्मा विष्णु से हुई यह बात । तुम बडे हो कि बडी है माता ॥
सबै मिली तब कीन्ह पयाना । जाइ माता ढिग कीन्ह बयाना ॥
बोलहु माता सत के भाऊ । नहिं अरुझावहु भाषि सुनाऊ ॥

( ८४ )

गरुडबोध

तीनों देव कहैं सुनु माता । और कौन पुरुष आहि विधाता ॥
हम तीनों कि और है कोई । यह निज भेद बतावहु सोई ॥

माता वचन

तब माता बोले हितकारी । कस न ब्रह्मा करहु विचारी ॥
जब तुम हते हमारे पास । तब तुम कौन पिता की आसा ॥
तबकी बात विसरी तुम गयऊ । पुरुष ते विमुख तुम भयऊ ॥
पुनि माता यक वचन अनुसारी । महादेव ही कृतम भिकारी ॥
अमर वचन जो हमहीं भाखा । युग चारों देह अमर राखा ॥
सोई वचन भूलि जो गयऊ । मातु पिता सो अंतर लयऊ ॥
पुनि माता गरुडसे बोली । अमृत वचन रसाल अति खोली ॥
कहे माता सुनु गरुड सुजाना । तुमतो वचन कही परमाना ॥

गरुड वचन

गरुड तब पूछे ज्योतिसों बानी । कैसे तुम यह सिरजा खानी ॥

माया वचन

तब उन कहा पुरुष सों बानी । पावक नीर पवन वैसानी ॥
जल रंग अंश सो साथहि रहई । ताकी खबरि कोई नहि लहई ॥
प्रथम अंशजल रंग जो कीन्हा । तब जलसिन्धुनाम कहि दीन्हा ॥
सारखी-ब्रह्मा विष्णु कोई नहीं, महादेव भी नाहिं ।
पुरुष एक तब अविगति, अगम अगोचर माहिं ॥

ब्रह्मा वचन चौपाई

कहे ब्रह्मा हम आपु प्रकाशा । हम पुहमी नौ खण्ड निवासा ॥
हम हैं नीर हमहिं हैं पवना । हमहीं रचा सकल सब भवना ॥
हमहीं पांच तत्त्व सब कीन्हा । हमहीं आप सृष्टि रचि लीन्हा ॥
हमहीं सकल सृष्टि विस्तारा । हम कर्ता है सकल पसारा ॥
हमहीं चन्द्र सूर दिन राती । हमहीं कीन्ह किरतम उत्पाती ॥
हमहीं आदि अंत मधि तारा । हमहीं अंध कूप उजियारा ॥

बोधसागर

( ८५ )

हमहीं ब्रह्मा विष्णु महेशा । हमहीं नारद शुक्रदेव शेशा ॥
हमहीं कंस कृष्ण बलि वावन । हमहीं रघुपति हमहीं रावन ॥
हमहीं हैं मच्छ कच्छ बाराहा । हमहीं भादों फागुन माहा ॥
हमहीं दशौ भये अवतारा । तीरथ बरत देहरा धारा ॥
हमहीं हंसा समुद्र तरंगा । हमहीं सरस्वती यमुना गंगा ॥
हमहीं योग युक्ति व्रत पूजा । हमहीं छौंठि देव नहीं दूजा ॥
हमहीं पटना गुनना लीखा । हमहीं पाप पुण्य गुरु शीखा ॥
हमहीं विद्या वेद पुराना । हमहीं कीन कितेक कुराना ॥
हमहीं आवें हमहीं जावें । हमहीं आदि अन्त की छावें ॥
तीन लोक हमहीं विस्तारा । सकल निबल देही हम धारा ॥
साखी-तीन लोक में रमि रहे, सबही मोही मान ।

कहु माता ससुझायके, किरतम कैसे जान ॥

माता वचन-चौपाई

तब माता अस बोली बानी । तू तो ब्रह्मा चतुर सुजानी ॥
हमसे भयी उत्पत्ति तुम्हारी । तुमही पुत्र हमही महतारी ।
पिता केर खोज जो कीन्हा । तब हम तुमको हुकुम नदीन्हा ॥
बरबस कै तुम खोजेउ जायी । तब हम पिताकी खोज बतायी ॥
तब हम तुमसों बोली बानी । दर्शन ते बेसुख तुम्हें जानी ॥
तब तुम पैज बाँधि कै चलेऊ । पिता के दर्शन नहीं भयऊ ॥
जो तुम कीन्हे सकल बखाना । ताकर मोसों कहो विधाना ॥
जो तुम आपुहिँ आप तुम रहऊ । कवनके खोज करन तुम गयऊ ॥
काहे को बोलहु अनरीती । तुम लबार सो कीन्ही प्रीती ॥
बरबस खोज पिताके गयऊ । खोजन पाय अमरख तब भयऊ ॥
तब हमतो बोले झूठे लबारा । तैसहिँ सब चलही संसारा ॥
एक बार लबारी करेऊ । तब हम तो कहैँ शाप सो दयऊ ॥
अब बोलहु तुम वचन सम्हारी । काहे ब्रह्मा बोलु लबारी ॥

निर्गुण भेद वर्णन

( ८६ )

गरुडबोध

सारखी-भाषडु वचन सँभारिकै, जनि बोलडु अज्ञान ।
परमपुरुष एक अगम है, ताकर करहु ध्यान ॥

चौपाई

हम तो सत्य वचन चित धरऊ । हम तुम सत्य पुरुष ते भयऊ॥
ममता तेज बहुत तुम कीन्हा । आदि अन्तको नाहिन चीन्हा॥
माता वचन कह्यो सब झारी । तब ब्रह्मा मन आयी हारी ॥

गरुड वचन

सुनु ब्रह्मा तुम कौन मति ठानी । माता कहै सो कहा न मानी ॥
जो नहिं यह वचन परमानो । ज्योति कहै सो सब मिलिमानो॥
सुनि ब्रह्मा को गर्व परहारा । एक पुरुष जिय किया है चारा॥
परम पुरुष तेहि कीन प्रकाशा । जिनकी जगत लगावे आशा॥
चौसठ युग वही प्रकासा । सत्तर युग है वाके पासा ॥
सहस्र युग गये शून्य वे शून्ये । नहिं तहँ पाप नहीं तहँ पुत्रे ॥
तुम सब ब्रह्मा केतिक गयऊ । हम तब सब कर भेदे लयऊ ॥

सारखी-सुनु ब्रह्मा का जानई, तुम तो करम के खोट ।
तेहिंते हाल विनसिहो, जनी कहावहु छोट ॥
सुनु ब्रह्मा कहँ भूलिया, जनि करहु तुम रोख ।
जन्म जन्म चौरासिया, यहि विधि पावो धोख ॥
कहै गरुड समुझायके, जनि भरमहु अभिमान ।
साहिब एक अगम्य है, ताकर करहु पिछान ॥

चौपाई

टीका मूल एक हम देखा । तहाँ है निज शब्द विवेखा ॥
विलुण्ड वचन

ब्रह्म महादेव सुनहु भाई । सब पर देव निरञ्जन राई ॥
एक निरञ्जन और न कोऊ । तेहिंते अपर और नहिं होऊ ॥
तेहिंते और नहीं कोइ पारा । सो तो सकल भुवन सरदारा ॥

लौकिक ज्ञान वर्णन

बोधसागर

( ८७ )

वही सकल भुवनका स्वामी । वही परम ब्रह्म अन्तर्यामी ॥
उन्ही नारी पुरुष बनावा । सकल सृष्टि उन्ही सिरजावा ॥
लाख चौरासी उनहि सँवारा । उन्ही गोरख नाम धरावा ॥
उन्ही छलिबलि पतालपठावा । काल रूप धरि जगमें आवा ॥
उन्ही यह सब खेले खिलायी । उन्ही सकल सृष्टि उपजायी ॥

साखी-कहे विष्णु गुरुड सुनु, कहे सुने का होय ।

एक निरञ्जन आपु है, दूजा और न कोय ॥

सात द्रौप नौखंडमें, एक निरञ्जन होय ।

और कौन सो देखिये, ताको कहिये सोय ॥

गुरुड वचन-चौपाई

मैल मलीन सकल संसारा । सो निर्मल जाके अन्त न पारा ॥

मैले ब्रह्मा मैले इंद्र । रवि मैला मैले शशि चन्द्र ॥

मैले सनक सनन्दन देवा । मैले यह जग लहै न भेवा ॥

मैले शिव ब्रह्मादिक देखा । मैले लोक ब्रह्माण्ड विशेषा ॥

निशि वासर मैले दिन तीसा । मैले काल मैले अवनीसा ॥

मैले जोत मैले तन हेता । मैली काया मैल समेता ॥

मैले निरंजन नर नहि जाना । उन यह सृष्टि कीन्ह पिसमाना ॥

निर्मल नाम एक है श्वेता । निर्मल सो जो नामहि लेता ॥

कहै गुरुड ते जन परमाना । जो निर्मल निज नामहि जाना ॥

साखी-निरंकार ओंकार है, पार ब्रह्म है सोय ।

एकनाम चीन्हे विना भटकि सुवा सब कोय ॥

साहब इनहि बनाइके, आपुइ रहै निनार ।

सो निज नाम जाने विना, कैसे उतरे पार ॥

चौपाई

कहत सुनत सबही सुधि पायी । कहत सुनत सब तीर्थहि जाई ॥

कहत सुनत ज्ञान बहु करई । दम्भ अभिमान बहुत सो धरई ॥

महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान

( ८८ )

गरुडबोध

कहत सुनत नर तीर्थहिं जायी । भरमतभरमतगलफांसलगायी॥
कहत सुनत सब सुनै पुराना । कहत सुनत सब देत है दाना ॥
कहत सुनत सब खेती करई । कहत सुनत नर माया धरई ॥
कहत सुनत जो जुगली करई । होय चंडाल नरक महाँ परई ॥
कहत सुनत नर रूप खुदावे । कहत सुनत उद्यम मन लावे ॥
कहत सुनत स्वाद मन धरई । कहत सुनत नर गढहे परई ॥
कहत सुनत नर माया जोरी । सौ सहस्र औ लक्ष करोरी ॥
कहत सुनत गुरु शिष्यजोकरई । आप अजान भरम में परई ॥
कहत सुनत भक्ति जो ठानी । कहत सुनत पायन पर आनी॥
कहत सुनत सागर तलाब बनावै । कहत सुनत पाप पुण्य कमावै॥

साखी-कहन सुनत सब गये हैं, कहत सुनत सब जाय ।

कहत सुनत करनी करे, तब प्रभु परसे आय ॥

महादेव वचन-चौपाई

क्रोधवंत महादेव तब भयऊ । हमहू को उठाय तुम धरऊ ॥
महादेव बोले बात विचारी । हमको जान्यो किरतम भिकारी॥
हमको मनुष्य देह करि जाना । भूली बात करे बखाना ॥
महादेव अस युक्ति बतायी । कहो तो सकलो देऊँ दिखायी ॥
कहो अकाशको बन्द बताऊँ । सात द्वीप नौ खंड दिखाऊँ ॥
अचरज एक बात उन भाखी । कहो तो आनि दिखाओं साखी॥
कहो तो गरुडही मारि कै डारों । कहो तो योग जीतहिं मारों ॥
कहो तो काल रूप हम धोरें । कहो तो पलमहँ मारि सँघोरें॥
कहो तो याही देउं भुलायी । बढ़ुरि न हमसों हो बौरायी ॥
यह सो बकवाद विचारा । हमसों बाजी करै अपारा ॥
यह तो आदि अंतसे आये । तेहिते ब्रह्म विष्णु कहाये ॥
हमहीं सिरजें पाले मारें । दानव देवी मारि उखारें ॥

गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये बालक लाना

बोधसागर

(८२)

ब्रह्मा तो है जेठा भाई । वेद वाक्य सब कहै बनाई ॥
कैसे ब्रह्मा शीव उठावे । कैसे विष्णुहि हीन दिखावे ॥
सारखी-अगम निगम सब जानई, कहै मुक्तिका नीव ।
विष्णु काया दिढावई, योग दिढावे शीव ॥

गुरु बचन

सुनो महादेव मतिके हीना । तुम नहिं जानो पुरुष प्रवीना ॥
तुम तो आपहिं गर्वें झुलाये । तुम सेवक साहब होय आये ॥
तुम किंचित हो जीव विचारे । तुम्हरे कहे होय का पारे ॥
तुम्हरा किया कछू ना होई । आप पुरुष उपजावे सोई ॥
आप सुरत प्रभु कीन उचारा । तब तहैं चौदह भुवन सँवारा ॥
सेवा बदले पाय तिहुँल्लोका । जीवन कारन लाये धोका ॥
धोका लाय ठरयो संसारा । तीन लोकमें फन्द वसारा ॥
सारखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुनहु सत्य विचार ।
वह तौ पुरुष अखण्ड है, अपरमपार अधार ॥
तुम तीनों मिलि आपा थापी । आप थापी भये महा पापी ॥

सत्गुरु बचन

सुनु धर्मनि औरो यक बाता । उहैं तो सबै ज्ञानमहैं राता ॥
जब देख्यो सब आपा थापै । करत बडाई नहिं तनिको धापै ॥
तब अस युक्ति किया बनाई । जाते होय परीक्षा भाई ॥
बंग देश बालक यक रहेछ । जाति ब्राह्मण सबै तेहि पयछ ॥
ताकर आयू सबै खुटानी । मृत्यु निकट भयी तुलानी ॥
ताको ज्ञान अस हम दीना । मृत्यु निकट भयी आयु छीना ॥
काल वचन उपाय विचारो । ब्रह्मादिकके निकट पग धारो ॥
लाय गुरुड तुरत पहुँचाये । ब्रह्मा विष्णु शिवहि बताये ॥