कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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गरुडबोध
सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥
विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥
विष्णु वचन
केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥
हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥
भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥
गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥
सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥
महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥
शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥
ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥
गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥
बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥
तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥
ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥
इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥
सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥
आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥
सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥
गरुड वचन
अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥