कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ७३ )
मोहे इन्द्र और उरवशी । नौ लख तारा सूरज शशी ॥
यहि विधि कीन्ह भक्ति मनलायी । तनमन सुधि सकलौ बिसरायी ॥
साखी-तेतीस कोटि देवता, गण गन्धर्व सब झार ।
सुर असुर सबही थके, लीला नाम अपार ॥
चौपाई
धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुडजी ध्यान तुम्हारा ॥
धन्य कबीर जिन भक्त उधारा । भक्ति ज्ञान का कीन पसारा ॥
धन्य गुरुड सबही अस कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदय चित दीन्हा ॥
भक्ति मंडान पहर दोय भयऊ । तहैं हम उठिके आरति कियऊ ॥
आरति भइ पुनि बहुते भांती । बरणि न जाय शोभाकी कांती ॥
एकोतर नरियर मालुम कीन्हो । बाँटि प्रसाद सबनको दीन्हो ॥
सत्य सत्य सबन मिलि कीन्हा । धन्य गुरुड तुम यह मति लीन्हा ॥
गुरुड वचन
विन्ती करै गुरुड चित लायी । सबसे करब हम चर्चा जायी ॥
दया करहु हम पैं गुरु देवा । तीनों देव सो कहिहो भेवा ॥
हम तो चरचा करब गुसाई । हमको दो लखाइ सब ठाई ॥
ज्ञानी वचन
अहो गुरुड तुम हौ बड ज्ञानी । विद्या देहु सब घरके जानी ॥
घर आयेसे राड न कीजै । क्षमावंत हो बिदा सब कीजै ॥
बिदा देहु सबही सावधाना । तिनके घर तुम करिहो ज्ञाना ॥
अस्तुति ठानि चले सब देवा । धन्य कबीर देवनके देवा ॥
साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि आज्ञा लीन ।
अपने अपने लोक को, सबही प्याना कीन ॥
चौपाई
सबको बिदा जबहि करि दीन्हा । तबहिं गुरुड अस कहबे लीन्हा ॥