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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 665

बोधसागर

( ८५ )

हमहीं ब्रह्मा विष्णु महेशा । हमहीं नारद शुक्रदेव शेशा ॥
हमहीं कंस कृष्ण बलि वावन । हमहीं रघुपति हमहीं रावन ॥
हमहीं हैं मच्छ कच्छ बाराहा । हमहीं भादों फागुन माहा ॥
हमहीं दशौ भये अवतारा । तीरथ बरत देहरा धारा ॥
हमहीं हंसा समुद्र तरंगा । हमहीं सरस्वती यमुना गंगा ॥
हमहीं योग युक्ति व्रत पूजा । हमहीं छौंठि देव नहीं दूजा ॥
हमहीं पटना गुनना लीखा । हमहीं पाप पुण्य गुरु शीखा ॥
हमहीं विद्या वेद पुराना । हमहीं कीन कितेक कुराना ॥
हमहीं आवें हमहीं जावें । हमहीं आदि अन्त की छावें ॥
तीन लोक हमहीं विस्तारा । सकल निबल देही हम धारा ॥
साखी-तीन लोक में रमि रहे, सबही मोही मान ।

कहु माता ससुझायके, किरतम कैसे जान ॥

माता वचन-चौपाई

तब माता अस बोली बानी । तू तो ब्रह्मा चतुर सुजानी ॥
हमसे भयी उत्पत्ति तुम्हारी । तुमही पुत्र हमही महतारी ।
पिता केर खोज जो कीन्हा । तब हम तुमको हुकुम नदीन्हा ॥
बरबस कै तुम खोजेउ जायी । तब हम पिताकी खोज बतायी ॥
तब हम तुमसों बोली बानी । दर्शन ते बेसुख तुम्हें जानी ॥
तब तुम पैज बाँधि कै चलेऊ । पिता के दर्शन नहीं भयऊ ॥
जो तुम कीन्हे सकल बखाना । ताकर मोसों कहो विधाना ॥
जो तुम आपुहिँ आप तुम रहऊ । कवनके खोज करन तुम गयऊ ॥
काहे को बोलहु अनरीती । तुम लबार सो कीन्ही प्रीती ॥
बरबस खोज पिताके गयऊ । खोजन पाय अमरख तब भयऊ ॥
तब हमतो बोले झूठे लबारा । तैसहिँ सब चलही संसारा ॥
एक बार लबारी करेऊ । तब हम तो कहैँ शाप सो दयऊ ॥
अब बोलहु तुम वचन सम्हारी । काहे ब्रह्मा बोलु लबारी ॥