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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 657

बोधसागर

( ७७ )

साखी-कहे गरुड समझाइके, सुनहु ब्रह्म यह बात ।
अविगत पुरुष सु और है, जाके माय न तात ॥

ब्रह्मा-वचन चौपाई

सुनि ब्रह्मा तब पूछे बानी । कैसे अविगतिकी गति जानी ॥
कौनी युक्ति साच कै मानी । साहिबकी गति कैसे जानी ॥

गरुड वचन

गरुड कहै तुम आपही ज्ञाना । जहाँ गर्व तहाँ पुरुष छिपाना ॥
गर्व गुमान में जो है पूरा । रहै सदा सो धूर अधूरा ॥
साखी-मानुषदेह अपराधि है, देह धरे अभिमान ।
ताते सबै विगुचै, भक्ति मर्म नहिं जान ॥

चौपाई

भक्ति जो आदि अंतसे आयी । जाते सकल माँड निर्मायी ॥
ताकर मर्म जो जाने नायी । ताते काल फांस निरमायी ॥

साखी-लोक वेद जानै नहीं, करै भक्ति अभिमान ।
ताते सबै विगुरचे, भक्ति करन का जान ॥
ध्वजा जो फरके शून्यमें, बाजे अनहद तूर ।
तकिया है मैदान में, पहुंचेगा कोइ शूर ॥

ब्रह्मा वचन-चौपाई

ब्रह्मा कहै गरुड सुनु भाई । अपने मुख तुम करहु बडाई ॥
इतना ब्रह्मा किया विचारा । देव विमान तुरत भये ठाढ़ा ॥
कहे ब्रह्मा तुम जाहु विमाना । लाओ विष्णु बुलाइ सयाना ॥
चला विमान विष्णु पै गयऊ । तबहि विष्णु अस पूछनलयऊ ॥
कहो विमान कहाँ पगु धारे । सत्य सत्य कहो वचन सम्हारे ॥

विमान वचन

गरुड भक्त यक आया देवा । सो नहिं माने तुम्हरी सेवा ॥