सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

अर्थ-तीन गुणोंके विषयवाले वेद हैं, हे अर्जुन ! तू इन तीन गुणोंसे परे हो निर्द्वन्द सदा सत्त्वमें स्थित, योग क्षेमसे रहित और आत्मवान् हो।

इसके ऊपर बहुतोंने व्याख्या किये हैं, दो तीन मतोंका यहाँ दिग्दर्शन कराया-जाता है ।

१ पहिली व्याख्या-हे अर्जुन ! वेद तो तीन गुणोंकी बातोंकोही कहनेवाले हैं अर्थात् तीन प्रकारके गुण सत्त्व, रज, तममें तो लोग फँसे हुए हैं उन्हींको सत्तोगुणी रजोगुणी और तमोगुणी कामनाओंकी पूर्तिके मार्ग वह बतलाते हैं । इन कामनाओं और गुणोंके बन्धनमें जकड़ा हुआ कभी मुक्त नहीं हो सकता । इसलिये हे अर्जुन ! तू इन तीन गुणोंसे परे हो जा अर्थात् वेदोंके घेरेसे बाहर होजा ; नहीं तो, इन्हीं तीनों गुणोंके बनाये हुए स्वर्गादि लोकोंमें भ्रमण करता हुआ, आवागमनके चक्रसे कभी बाहर नहीं निकल सकेगा । क्योंकि, सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी कामनाओंसे स्वर्ग नरकादि आवागमनके अतिरिक्त विशेष कोई लाभ नहीं होता ।

सुख दुःख लाभ अलाभ, पुण्य, पाप, जीत, हार और शीतोष्णदि द्वन्द्वोंसे रहित सदा सत्यमें स्थित हो अर्थात् इन तीन गुणोंसे परे जो सत्य वस्तु है उसे गुणातीतमें निश्चय रख । शरा बन, कायर और अज्ञानी मत बन । सत्यमें जो स्थित होता अर्थात् सत्यमें जो निवास करता अथवा सत्यमें अद्वार रखता है, सो कभी कायर हो मायिक नाशमान गुणोंमें नहीं फँसता । वह योग क्षेमसे रहित होता है अर्थात् मायिक वस्तुओंकी न तो वह प्राप्त चाहता है न उनकी रक्षाके लिये अपना समय नष्ट करता है । क्योंकि, सत्यका आश्रय लेनेवाला जानता है कि, वे मिथ्या मृगतृष्णाके जलके समान ठगनेवाले और क्षणिक हैं, इस लिये सत्यका आश्रय लेकर तू सावधान हो जा, कभी भी, इन त्रिगुण्यक विषयोंकी कामनाकर उनके वशमें मत आजा । वरन उनके विषयोंसे चित्तकी वृत्तिको हटाकर अपने सत्यात्मामें स्थिति कर । इसीलिये हे अर्जुन ! इन त्रिगुणात्मक मिथ्या संहारमें फँसानेवाले वेदोंसे सदा अलग रह, नहीं तो आवागमनसे कदापि नहीं छूट सकेगा । हे अर्जुन ! इसी प्रकार तू कर्मोंके बन्धनको तोड़कर मोक्षको प्राप्त होगा ।

भगवान्के कहनेका अभिप्राय यह है कि, वेद संसारको वृद्धि करनेवाले और उसीमें रहकर सुख माननेका मार्ग बतलाता है क्योंकि, संसारमें सत्यकी खोज करनेवाले-“लाखनमेंको गने क्रोडन मध्ये एक” के कहावत अनुसार, कोई एक संस्कारी जीवही होते हैं, जो सत्तगुरुकी शरण होकर, सत्यको प्राप्तकर

अक्षय सुखको पाते हैं । नहीं तो संसारमें अधिकांश मनुष्योंकी रुचि सत्तोगुणी तेजोगुणी और तमोगुणी होती है, इससे वे यथार्थ सत्यकी चाहना न करके गुणोंकी प्रेरणासे स्वर्गादिसे लेकर सांसारिक नाशमान सुखोंकीही कामना करते हैं । यह नहीं कि, वे इन्हें नाशमान न जानते हों ? नहीं वे उसे नाशमान भी जानते हैं, क्योंकि, जिन वेद और शास्त्रोंका वे आश्रय लेते हैं, वेही स्वर्गादिक तथा उनके अभिमानी विष्णु ब्रह्मा इंद्रादि देवोंको समय पाकर नाशमान बतलाते हैं । किन्तु गुणोंके प्रभावमें दबी हुई उनकी बुद्धि, उस सत्यको ग्रहण नहीं कर सकती । जिस प्रकार लोभी पुरुष ठगके हाथमें आजाता है और उसीकी लोभ दिलानीवाली बातों से, सत्य मानकर उसी पर भरोसा करता है, उसी प्रकार त्रिगुण कामनाओंमें फँसे हुए जीव सत्यका अनादर कर, लोभ दिलाने वाली, वेदवादकी मिथ्या बातोंकोही सत्य मानते और सत्य कहनेवालोंको नास्तिक निंदक आदि विशेषणोंसे स्मरण करते हैं । इसी बातको भगवान् कृष्ण इसी तीसरे अध्यायके श्लोक ४२, ४३ और ४४ में इस प्रकार वर्णन करते हैं ।

“यामिमां पुष्पितां वाचं प्रबदन्त्यविपश्चितः ।

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ ”

भगवान् कृष्ण कहते हैं—हे पृथापुत्र पार्थ अर्थात् अर्जुन ! जो अविवेकी अर्थात् मूढ़ पुरुष हैं, जो वेदवादमें रत हैं जो वेदवाक्यके अर्थवादमेंही परम प्रीतिवाले हैं वे वेद या उसमें वर्णित नाना कर्मकाण्ड और उनके फलकोही सर्वस्व सर्वोत्तम मानते और कहते हैं कि, इनसे परे कुछभी नहीं हैं । उनकी दृष्टिमें स्वर्गही सब कुछ है । ऐसे मूढ़ पुरुष वेदके उन पुष्पित वाणियों के जालमें पड़े हुए हैं, जो ऊपरसे तो सुन्दर खिले हुए पुष्पके समान परम सुहावना देख पड़ता है, किन्तु उसमें कोई उत्तम गन्ध नहीं होती, केवल देखनेवालेको मोह लेता है । इसी प्रकार वेदकी नाना कामना स्वर्ग आदिकी आशा दिलाने और संसारमें भी नाना सुख ऐश्वर्यको देनेकी आशा दिलानेवाली वेदवाणी पर मोहित होकर अपनी व्यवसायिक अर्थात् उससे परेकी बातको निश्चय करनेवाली बुद्धिको ऐसी कुंठित करलेते हैं कि, उनके सामने सत्य प्रत्यक्ष रूप धारण करके भी खड़ा हो तब भी उसपर उनका विश्वास नहीं होता ।

प्रारंभिक उपोद्घात

ऐसे लोग वेदके त्रिगुणजालमें फँसकर, लोक परलोककी प्राप्तिके नाना आडम्बर युक्त साधनोंमें, फँसे रहकर अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। और देवादिसे लेकर कीट पतङ्ग तककी नाना योनियोंमें भटकते हुए आवागमनसे छूटने नहीं पाते। ऐसे वेद पशु वेदके उन सुहावने बचन पर मोहित रहते हैं। जिनमें अनेक प्रकारकी कर्म विधि, अग्नि होत्र, दशं, पूर्णिमा ज्योतिष्ठोम इत्यादि सकाम कर्मों तथा लौकिक फल बनाये गये हैं। वे इन वैदिक कर्मोंसे परे अपना कुछ भी कर्तव्य नहीं समझते।

इसी कारणसे उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् सत्यासत्यको निश्चय करनेवाली बुद्धि ऐसी कुंठित और अविश्वासी हो जाती है कि, वह यथार्थको नहीं समझ सकती।

पैतालौसवैश्लोकमें भगवान् कृष्ण इसी लिये अर्जुनसे कहते हैं; ह अर्जुन ! वेद संसारी है। संसारमें बहुत पुरुषोंकी रुचि सत्व रज और तमकी प्रधानतासे निज निज अधिकारानुसार, सांसारिक भोगों ें लिप्सावाली होती है, इस लिये स्वभावतः लोग उसी उसी प्रकारके भोगोंके पानकी कामना करते हैं; इसी लिये वेदोंमें धन, पुत्र, अश्वादि प्राप्तिके उपाय आदि लोक परलोक स्वर्गादिक कामनाकी पूर्ति ें लिये, नाना प्रकारके अनन्त साधनोंका वर्णन किया गया है, जिनके अनुष्ठानसे पुरुषकी सांसारिक कामनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं।

इस प्रकार सब वेदोंमें सांसारिक कामनाओं और विषयोंकी पुष्टीकी बहुलता दिखाकर, भगवान् कृष्ण अर्जुनको यह उपदेश देते हैं कि, हे अर्जुन ! तुझे ऐसी श्रांतिमें नहीं पड़ना चाहिये कि, "जब वेद इसी प्रकारके उपदेश देते और उपाय बतलाते हैं तो हमें वही करना चाहिये, यही मनुष्यका कर्तव्य है" नहीं ! नहीं ! मनुष्य जन्मकी सफलता इसीमें नहीं हैं इसका तो इनसे बहुत ऊंचा पद परमानन्द प्राप्तिके लिये यथार्थ पदको प्राप्त करना इसका असली कर्तव्य है।

इसी लिये तू गुणातीत हो। इन त्रिगुणात्मक वेदोंके झगड़ोंसे अलग होकर इन फँसानेवाली कामनाओंका त्याग करदे। इन कामनाओंसे परे होनेके लिये तुझे उत्साह और धीरज रखकर शीतोष्णादि नाना प्रकारके सांसारिक क्लेशोंके सहनेकेलिये तत्पर रहना पड़ेगा। तुझे लोक परलोक सबको ठुकराकर, सत्यकी ओर जाना पड़ेगा, फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि आपही आप तुझसे डर कर अलग हो जायेंगे।

ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति

दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—

वेदोंका विषय तीन गुणोंका कार्य है अथवा तीन गुण और उनके कार्योंके प्रकाशक वेद हैं। अभिप्राय यह है कि, तीन गुणोंके अन्दर ही अन्दर वेदोंका कथन है। जितना उपदेश संसारमें होता है, वह सब इन्हीं तीन गुणोंके भीतरही भीतर हो सकता है। क्योंकि जो वाणीकी आज्ञा है सो सब तीन गुणोंका ही कार्य हो जाता है। वाणीकाही क्या ? मनकाभी विषय मायाकेही अन्तर्गत है। “गो गोचर जहँ लग मन जाई । तहँ लगि माया जानहु भाई ॥” गुणातीत वस्तु अकथनीय अचिन्तनीय और निरूपदेश है, इसके लिये श्रुति स्वयम् कहती है “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहांसे वाचा सहित मन उसे न पाकर पीछे लौट आती है। इसी लिये मुण्डक उपनिषत्में वेद और वेदाङ्गको अपराविद्या कहा है।

जिस विद्यासे यथार्थ ब्रह्म न जाना जाय, न ठीक दर्शाया जासके, उसे अपरा विद्या कहते हैं और वेदोंमें प्रायः सांसारिक कामना युक्त, सकाम कर्मों और अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भादि) की ही पूजा वर्णित है। अपराविद्याकी हद्द यहाँही तक है। जो इस अपरा विद्या तकही ठहर जाते हैं वे परा विद्याको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? और पराविद्याको पाये बिना त्रिगुणके जालसे कैसे छूट सकते हैं ? इसलिये हे अर्जुन ! तू ऐसी पुष्पित त्रिगुणात्मक वाणीवाले वेदोंसे सावधान हो, उनमें आसक्त मत हो। इत्यादि ॥

इसी प्रकारसे गीताके अनेक भाष्यकारोंने अपनी अपनी युक्ति प्रयुक्त द्वारा अनेक प्रकारसे इसका अर्थ किया है किन्तु, वेदके त्रिगुणात्मक होनेमें सब एक मत हैं। कइयोंने तो आत्मतत्वकी प्राप्तिके लिये त्रिगुणात्मक वेदोंका सर्वथा-ही त्याग बतलाया है।

आधुनिक प्रसिद्ध टीकाकारोंमें लोकमान्य तिलक अपनी टीकामें क्या लिखते हैं, यह भी दिखाता हूँ ॥

देखो लोकमान्य तिलककी टीका गीताके श्लोक ४३-४४-४५ तीसरा अध्याय ॥

(४२) हे पार्थ ! (कर्मकाण्डात्मक) वेदोंके (फलश्रुति फल) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है बढाकर कहा करते हैं कि, (४३) “अनेक प्रकारके (यज्ञ-याग आदि) कर्मों-, सेही (फिर) जन्म रूप फल मिलता है और (जन्म जन्मान्तरमें) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है” स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य बुद्धिवाले (लोग) (४४) में

कबीर मन्शूर (छोटा)

उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्य-मैंही गर्क रहते हैं, इस कारण, उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् कार्य्य अकार्य्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि कभीभी समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती ।

(४५) हे अर्जुन ! वेद उस रीतिसे त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्य, सत्त्वस्थ और सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे अलिप्त हो, एवं योग क्षेत्र आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ।

इसी प्रकार सनातन धर्मावलम्बी और वेदान्ती आदि सभी टीकाकारोंने वेदको त्रिगुणात्मक बतलाकर उसके जालमें न पड़नेकी ताकीद की है । तो फिर इस कबीरमन्शूरमें स्वामी परमानन्दजीने जो वेदोंको सांसारिक अथवा प्राकृतिक कहा तो कौनसा अपराध किया । वेद जब स्वतः अपनेको अपरा विद्या कहते हैं तब उसी बातको दूसरा कहे तो बुरा माननेकी कोई बात नहीं है ।

स्वामी परमानन्दजीने अपने "कबीर कौमुदी" नामक ग्रन्थमें वेदकी बहुत बड़ाई की है । आपने साफ लिखा है जो संसारमें रहकर वेदको नहीं मानता वह संसारके सब कष्ट अपने ऊपर बुलालेता है हाँ ! मुक्तिके लिये संसार बन्धनसे छूटनेके लिये, सद्गुरुसे स्वसम्बेदको जानकर उसका अनुकरण करना आवश्यक बतलाया है । गुरुबोधमें राम रहस्य साहबभी कहते हैं—

"गृहधर्म बड खटपट, तामें रहू हुशियार ।

लोक वेदकी रीति सब, करू सहित विचार ॥"

आगे चलकर इसी कबीरमन्शूर ग्रन्थमें स्वामी परमानन्दजीने वेद और हिंदू धर्मकी इतनी स्तुति की है कि, आप साफ शब्दोंमें कहते हैं "हिंदू धर्मही एक ऐसा धर्म है कि, जो मनुष्यको सद्गुरुकी शरण प्राप्त करानेका अधिकारी बनाता है ।" कहाँतक कहें, यदि कोई पूर्वापरका विचार किये बिनाही किसी बातके अर्थ और भावको न समझे और अपनी अनसमझीसे दुःखी होवे तो कोई क्या कर सकता है ।

इसलिये कबीरमन्शूरके पाठकोंसे मेरा निवेदन है कि, वह पूर्वापर विचारें बिनाही, इस ग्रन्थके विषयमें, अपना विचार न बाँध बैठे इसे आद्योपान्त पढ़-जायें फिर उनको पता लगेगा कि, स्वामी परमानन्दजी वेदके प्रशंसक हैं या निन्दक ।

प्रायः कई लोगोंने स्वतः कबीर साहबको भी वेदका निन्दक लिखमारा

तालीम कबीर कलियुग

है किन्तु, कबीरकी वाणी और सिद्धान्तको समझे बिनाही उनका यह मिथ्या प्रलाप है ।

कबीर साहबका स्वतः बीजक में ही वचन है—

“ वेद इसस्मृति कहै किन झूठा जो न विचारे ” साखीमें आप कहते हैं—
जाको मुनिवर तप करें, वेद थके गुण गाय ।
सोई देउँ सिखापना, कोइ नहीं पतियाय ॥

इस साखीको लेकर कई लोग शंका कर बैठते हैं कि, बाह कबीर साहब भी तो वही कहते हैं कि, जिसको वेद और ऋषि मुनि कहते हैं । किन्तु, ऐसी शंका करनेवाले बड़ी भूल करते हैं, वे इस साखीके अर्थ पर ठीक ठीक ध्यान नहीं देते— इस साखीमें साफ साफ कहा है “ वेद थके गुण गाय ” अर्थात् जिसका गुण गाते २ अर्थात् जिसको ढूंढते ढूंढते वेद भी थककर “ नेति नेति ” “ न इति न इति ” “ यह नहीं ? यह नहीं ” कहकर मौन धारण कर लेता है । और मुनि ऋषि तप द्वारा जिसको खोजते खोजते हार जाते हैं, विद्वान् पण्डित सर्व विद्या-सम्पन्न होकर भी जिसको नहीं पासकते, उसीके पहचानकी मैं सिखावन देता हूँ किन्तु, वेद और तपादिकों के जालमें पड़े हुए विद्वान् ऋषि मुनि लोग विद्या और तप आदिके अभिमानमें मेरी बात नहीं मानते ।

इस बातका प्रमाण छान्दोग्य उपनिषत्के सातवें ब्राह्मणमें नारद और सनत्कुमारकी गाथासे मिलता है । अवसर पाकर वहभी किसी स्थानमेंदिखानेका प्रयत्न करूँगा ।

अनुवादक—

श्रीयुगलानन्द बिहारी ।

पचीसवाँ प्रकरण

वेदके प्राकट्यपर मतभेद ।

बहुतलोग ऐसा अनुमान करते हैं कि ये वेद ईश्वरकी वाणी हैं तथा उसीने आदित्य, अग्नि, वायु, अङ्गिरा इन चार ऋषियोंद्वारा इनको प्रगट और प्रचलित किया है । मैं पहिले लिख आया हूँ कि, निरञ्जनने कूर्मजीसे रचनाका सामान लिया कूर्मजीका तीन शिर जब निरञ्जनने अपने नखोंद्वारा काट दिया तब उनके पेटके भीतर सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रादि निकल पड़े और अग्नि, आदित्य, वायु, अङ्गिरा, उसी समय प्रकट हो गये । उस समय ब्रह्मा प्रकट नहीं हुए थे

बड़ा कबीर मन्शूर

इस कारण वेदका ज्ञान तथा प्रकाश उन ऋषियोंमें पहलेसे होता है। अग्नि देवता स्वयं निरञ्जनजी हैं। आदित्य नाम सूर्यका है, उस सूर्यको भी वेदका ज्ञान होता है, उसके मध्य प्रकाश होता है, सुतरां गीतामें कृष्णने अर्जुनसे कहा है कि, अर्जुन ! जिस ज्ञानको आज तुझसे मैंने कहा है, उसको पूर्वमें मैंने सूर्यसे कहा था। तब अर्जुनने कहा कि, हे महाराज ! आप तो अब उत्पन्न हुए हैं और सूर्य तो पुराना देवता है। तब कृष्णने कहा कि हे अर्जुन ! मेरे और तेरे जन्म अनन्तबार हुए हैं, तू अपने पूर्वजन्मोंके वृत्तान्तको नहीं जानता, मैं जानता हूँ, इस प्रकार प्रमाणित होता है कि, ब्रह्मासे पूर्व सूर्य था। अग्नि देवता स्वयम् निरंजन हैं और जो निरंजन हैं वही कृष्ण हैं, निरंजन तथा कृष्णमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है सो वास्तवमें कृष्णने पहले सूर्यसे कहा था। वेद तथा गीतामें कुछभी विभिन्नता नहीं, इस कारण ये ऋषि मनुष्योंकी उत्पत्तिसे पहले ठहरे और ब्रह्मा पीछे उत्पन्न हुआ, इसी कारण कहा जाता है कि, ब्रह्माने आदित्य और अग्निसे ज्ञान सीखा। अग्नि तथा सूर्य दोनों एकही रूप हैं—परन्तु ये ऋषि-गणभी वेद प्रचारक ठहर नहीं सकते, कारण यह कि, जगत् ब्रह्माके संकल्पसे हुआ है।।

कबीरसाहबने ग्रंथ अनुरागसागरमें प्रगट कहा है—देखो गायत्री तथा अच्छाके वात्सलापमें—हे गायत्री ! तू ब्रह्माको ले आ। कारण यह कि, बिना ब्रह्माके इस जगत्की रचना नहीं हो सकती ? इस कारण इस जगत्को ब्रह्माने बनाया। ब्रह्मा द्वारा मनुष्योंको वेद मिले। सब ऋषि मुनि तथा राजा प्रजा ब्रह्मा द्वारा वेद पाते हैं और उसीकी आज्ञाओं पर चलते हैं।

वेदोपनिषद् प्रजापतिके उत्पत्तिपर्वमें देखो—लिखा है कि, सबसे पहले प्रजापति उत्पन्न हुए तब सूर्यको देखा और उसको खानेके लिये हाथ पसारा। जब प्रजापतिने सूर्यको पकड़कर खानाना चाहा, तब सूर्यने भयभीत होकर अपने मुंहसे “यहाँ” का शब्द किया। तब प्रजापतिने सूर्यको भोजनकी वस्तु न समझ कर नहीं खाया छोड दिया और अन्य प्रकारकी सहस्रों वस्तुएँ अपने भोजन योग्य बनायी।

फिर योगवासिष्ठमें लिखा है कि, पहाडपर बसिष्ठ नामक एक ब्राह्मण था, उसके दश बेटे थे। इन दशों पुत्रोंने बड़ी तपस्या की और उन्होंने अपनी उस तपस्याका वर यह माँगा कि, हम दशों भाई ब्रह्मा हो जावें और वे सब ब्रह्मा हो गये। इन दशों ब्रह्माके निमित्त, दश ब्रह्माण्ड प्रकट हुवा उन्हीं दश ब्रह्माण्डोंमें यह एक ब्रह्माण्ड हमारा है। जब हमारे ब्रह्माण्डका ब्रह्मा प्रकट हुआ, तब जगत्को

देखकर आश्चर्यान्वित हुआ और अपने मनमें सोचने लगा कि, इस सृष्टिका कर्ता कौन है ? यह बात किससे पूछूं ? तब सूर्यको सामने देखकर उसने पूछा कि, हे सूर्य ! तू मुझको बतला कि, इस सृष्टिका उत्पन्नकर्ता कौन है ? तब सूर्यने उत्तर दिया कि, हे ब्रह्मा ! मुझको अत्यंत आश्चर्य है कि, तू अपने कार्योंसे स्वयम् अनभिज्ञ है पर तूने जो पूछा सो मैं तुझसे कहता हूँ । तब सूर्यने ब्रह्माको पूर्वजन्मकी सब कहानी कह सुनायी और कहा कि, हे ब्रह्मा ! यह जगत् तेरेही संकल्पसे बना है और इसका कर्ता तूही है । यह ब्रह्माण्ड तेरा है । ऐसी ही अपनी अज्ञानावस्थामें ब्रह्माने सूर्य तथा अग्नि देवतासे विद्याध्ययन किया । इससे प्रमाणित है कि, ब्रह्मासे पूर्व अग्नि और आदित्य इत्यादि थे, इसी कारण ब्रह्माने अग्नि और सूर्य इत्यादिसे ज्ञान लाभ किया और विद्या सीखी ।

छब्बीसवाँ प्रकरण

ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता ।

ब्रह्मा तो सांसारिक मनुष्य है इस कारण उसकी आयुकी सीमा है, समय पाकर मर जाता है और फिर जन्म पाता है । पर ऋषिमुनिकी आयु तथा उनके अधिकार प्रभुत्व अनन्त हैं । वे ऋषि मुनि जो हंस कबीर कहलाते हैं उनका जन्म मरण तो कभी होताही नहीं, वे आवागमनसे रहितही हैं, पर वे ऋषि जो योग समाधि साधन प्राणायाम इत्यादि करते हैं वेभी योग तथा कायाकल्प इत्यादिके प्रभावसे, मार्कण्डेय, गुप्तमुनि तथा धनुषमुनि इत्यादिके समान अनेक युगों पर्यन्त जीवित रहते हैं, जब मृत्यु आती है तब प्राणायाम द्वारा बचते हैं और जब वृद्ध हो जातेहैं तब कायाकल्प द्वारा, फिर युवक हो जाते हैं, इस प्रकार ब्रह्माकी आयुसे ऋषियोंकी आयु विशेष है, वे महाप्रलयसे बच सकते हैं, इस प्रकार ऋषियोंकी आयु तथा विद्या ब्रह्मासे बढ़कर है । जैसे अग्नि देवता अथवा अग्नि ऋषि अथवा आदित्य ऋषि वायु देवता अथवा वायु ऋषि और अङ्गिरा ऋषि इत्यादि बड़े विद्वान् तथा सामर्थ्यी हैं ।

यह जगत् अनेकबार उत्पन्न हुआ और मिटजावेगा और अनगिनती ब्रह्मा विष्णु महेशादि हुए और अभी होंगे तथा इस समयभी वर्त्तमानहैं, भिन्न २ ब्रह्माण्डोंमें राज्य कर रहे हैं और प्रभुत्व भोग रहे हैं । इस रचनाकी कोई सीमा तथा अवधि नहीं है, अनगिनती ढंगपर रचना हुई और होती है, उन्हीं अनगिनती ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्ड हमारा है, जिसके प्रबंधकर्त्ता तथा शासक

ब्रह्मा, विष्णु, महेश ठहराये गये और इन चारों वेदोंके कर्ता धर्ता येही नियुक्त हुए संसारी जीवोंके निमित्त तो यही चारों परमसंवेद है और जो इन ज्ज्जालोंसे छूटा चाहें और मुक्ति पाना चाहें, उनके निमित्त स्वसंवेद है ।

ये दोनों वेद उसी साहबके हैं, जबतक जीव सांसारिक कामनाओंमें बद्ध है और उसीमें सुखी और प्रसन्न है, तबतक परसम्वेदके अधीन रहे और जब इन ज्ज्जालोंसे उसका मन उचट जावे तब, स्वसम्वेदकी शिक्षाओंका अनुसरण करे । छोटा बच्चा जबतक अनजान रहता है तबतक उसके माता पिता उसको धूल मिट्टी और खेल कूदमें संलग्न रहनेसे वर्जित नहीं करते । पर जब बच्चा समझदार होता है, तब उसको मना करते हैं कि, अब खेल कौतुकका समय नहीं है, अब बुद्धि ठिकाने करके विद्योपार्जन करो और अपनी जड़को समझो और मुक्ति प्राप्त करो ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण

वेद और किताबोंके मूलका वर्णन ।

जैसे वेदके माननेवाले इस बातका दावा करते हैं कि, वेद ईश्वरकी वाणी है—वैसे ही मुसलमानोंकाभी कथन है कि, उनका कुरान खुदाका कलाम है (बचन है) ऐसे ही यहूदी तौरीतको अल्लाहकी वाणी समझते हैं, सबोंके पास तो परमेश्वरकी वाणी आयी और उसको पढ पढकर सभी आनन्दित हो रहे हैं । पर यह बडे आश्चर्यकी बात है कि, परमेश्वरको न किसीने जाना और न पहचाना, उन्हें जरा भी खबर नहीं हुई कि, वह कहाँ रहता है तथा क्या वस्तु है ? देखो स्वयम् कुरानही कहती है कि, मैं चुनी गयी, एक बडे कुरानसे । यह बात स्पष्ट प्रमाणित है कि, कुरान नकल की गयी है, एक बडी साफ और शानवाली कुरानसे । किन्तु मुसलमानोंको इस बातकी तनिक भी सुध नहीं है कि वह शानवाला कुरान कहाँ है और वह कुरान किसी दूसरी जातीके पास है अथवा नहीं ? बहुतेरे मुसलमानोंका कहना है कि, वह बडा कुरान किसी लौहमहफूज पर है । जब इतनी सुधभी मुसलमानोंको नहीं है कि, यह कुरान किस शानवाले कुरानकी नकल है तो फिर कुरानके परमेश्वरकी वाणी होनेका क्या प्रमाण है, न उसपर खुदाकी मुहर है और न उसपर उसका हस्ताक्षर है । जब न परमेश्वरके वाक्यको पहचाना और न खुदाको जाना, फिर बंधन तथा मुक्ति कैसे हो सकती है ? और नर्क बैकुण्ठ और दुःख सुखका क्या परिणाम है ?

तारीख खातमा

अन्तमें सब भ्रमही भ्रमकी बातें ठहरेंगी । जबतक मनुष्यमें निर्मल विचार नहीं आता, जबतक मिथ्याको सत्य तथा सत्यको मिथ्या मान रहा है और यथार्थतासे वंचित है ।

अष्टाईसवाँ प्रकरण

वेदोंकी आज्ञाका पालन कहाँ और कबतक अवश्यमेव माननीय है ? उनचास करोड योजन निरञ्जनका शरीर है । सो हमारा यह ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्डके रहनेवालोंके निमित्त इस वेदका अनुसरण करना उचित ठहराया गया जबतक मनुष्य इस ब्रह्माण्डके भीतरके पदार्थोंमें आसक्त रहेगा तबतक इसके भीतर बन्द रहेगा और वेदोंकी आज्ञाओंका अनुसरण करनाही पड़ेगा, जैसे यह ब्रह्माण्ड उनचास करोड योजनका है वैसे ही इस ब्रह्माण्डसे दूना कूर्मजीका शरीर है । इस कारण वह इससे बड़ा ब्रह्माण्ड है । इस प्रकार कोई बड़ा कोई छोटा अगणित ब्रह्माण्ड हैं उन अगणित ब्रह्माण्डोंमें अनन्त प्रकारकी रचनायें हैं, जिनका विवरण हो नहीं सकता । प्रत्येक ब्रह्माण्डके निमित्त एक एक शासक तथा राजा हैं जो, उनके ईश्वर कहलाते हैं और उन ब्रह्माण्डोंके रहनेवाले उसीको अपना कर्त्ता तथा स्वामी जानते हैं । जैसे भेड बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त दूसरेको नहीं जानतीं; यही अवस्था अल्पज्ञोंकी है, वे क्या जानें कि, असली परमेश्वर क्या है ?

उनतीसवाँ प्रकरण

समुद्रमंथन तथा तीन कन्याओंका वृत्तान्त ।

*अब पहला विवरण पुनः आया । देखो ग्रन्थ स्वासगुञ्जार और अनुरागसागरमें लिखा है कि, जब इस प्रकार वेद प्रकट हो गये, तब, निरञ्जनने यह काम किया कि, चारों वेदोंको आज्ञा दी कि, तुम जाकर समुद्रमें छिप रहो । उधर आदि भवानोंने अपने शरीरसे तीन कन्याएँ प्रकट कीं और उनको आदेश दिया कि, तुम समुद्रमें जाकर छिप रहो । अपनी माताकी आज्ञा पातेही वह तीनों कन्याएँ जाकर रत्नाकरमें छिप गईं । यह कौतुक जो अध्याने किया इसे ब्रह्मा विष्णु महेश तीनोंने नहीं जाना । इसके उपरान्त निरञ्जनने अध्याको कहा कि, वह अपने तीनों पुत्रोंको समुद्र मथनेकी आज्ञा देवे । तब अध्याने तीनों पुत्रोंसे कहा कि, तुम जाकर समुद्र मथो और तीनोंने ऐसाही किया । समुद्रमेंसे

बहुतेरी वस्तुएँ निकलीं, जिन्हें लोग चौदह रत्न कहते हैं। फिर उन सब वस्तुओंको तीनों भाइयोंने ज्योंका त्यों लाकर अपनी माताके समक्ष रख दिया। तब उनकी माताने उन वस्तुओंको उन तीनोंमें बाट दिया। सरस्वती तथा चार वेद ब्रह्माके भागमें आये, लक्ष्मी विष्णुके बखरोंमें पड़ गयी और सती शिवको मिलीं। तीनों भाई पत्नियोंको पाकर अत्यंत हर्षित हुए इन्हीं तीनोंके वंशसे समस्त संसार है।

तीसवाँ प्रकरण

ब्रह्माका वेदपाठ और पिताकी जिज्ञासा।

जब ब्रह्माने वेद पाया और उसको पढ़ा तब उसमें देखा कि, एक विराट पुरुष है जिसका शिर आकाशमें और पावें पातालमें, चारों दिशा उसके कान और सूर्य चन्द्र उसके नेत्र हैं—

ब्रह्मा वेद पठन तब लाग। पठत वेद तब भा अनुरागा।

कहे वेद पुरुष इक आही। है निरंकार रूप नहीं ताही ॥

शून्य माहि वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि न आवे ॥

स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥

चतुरानन कहि विष्णु बुझाया। आहि पुरुष मोहि वेद लखाया ॥

पुनि ब्रह्मा शिवको अस कहई। वेद मथत पुरुष इक अहई ॥

(अनुराग सागर)

तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि, देखो भाई विष्णु ! वेद इसी विराट पुरुषको बतलाता है और भाई शिव आप भी सुनो और देखो; वेद बतलाता है कि, एक पुरुष ऐसा है जिसकी मूर्ति शून्यमें दिखाई देती है। तब ब्रह्मा अपनी माताके समीप जाकर कहने लगे कि, हे माता ! वेद बतलाता है और उसमें स्पष्ट लिखा है कि, एक पुरुष है और तू कहती है कि कोई नहीं; यह बात सुनकर अध्याने कहा कि बेटा, ! यदि तुझको अपने पिताके दर्शनोंकी अभिलाषा है, तो तू अक्षत तथा पुष्पादि लेकर जा और उसका दर्शन तथा पूजाकर आ। माताकी आज्ञा पातेही ब्रह्मा अक्षतादि लेकर उत्तरकी ओर चल पड़े और जाते जाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ तनिकभी सूर्यकी ज्योति नहीं थी, और पूर्णतया अंधकार था—वहाँ पर जाकर ब्रह्मा अपने पिताके दर्शनकी कामनासे समाधि लगाकर बैठ गये ॥

इकतीसवाँ प्रकरण

गायत्रीका प्रकट होना ।

ब्रह्माकी उस समाधिमें चारों युग बीत गये पर ब्रह्माको पिताका दर्शन नहीं हुआ । तब अद्याने मनमें चिन्ता किया कि, बिना ब्रह्माके सृष्टिको कौन रखेगा ! किसी युक्तिसे ब्रह्माको बुलाना चाहिये । तब उसने अपने शरीरसे मैल निकाला और उस मैलसे एक कन्या बनायी । और उसका नाम गायत्री रखी । कन्याने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! तुमने मुझे किस निमित्त उत्पन्न किया है ? अद्याने उत्तर दिया कि, बेटी तेरा बड़ा भाई ब्रह्मा है और वह अपने पिताके दर्शनोंके निमित्त उत्तर दिशाको गया है, वह किसी युक्तिसेभी अपने पिताके दर्शन नहीं पासकता और यहाँ उसके बिना संसारकी उत्पत्ति हो नहीं सकती । इस लिये तू जा और उसको समझाकर ले आ, जिसमें संसारकी उत्पत्ति हो ।।

बत्तीसवाँ प्रकरण

पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी ।

अपनी माताकी आज्ञा पातेही गायत्री उत्तरकी ओर चली और चलते २ उस स्थान पर जा पहुँची जहाँ ब्रह्मा समाधि लगाकर बैठा था । ब्रह्माकी अखंड समाधि लग रहीथी, और गायत्री खड़ी सोच रही थी कि, अब मैं क्या करूँ, ब्रह्माको समाधिसे कैसे जगाऊँ ? ऐसा न हो कि, ब्रह्मा मरे जगानेसे समाधिसे जागकर क्रुद्ध हो और मुझको शाप देवे । इस प्रकार गायत्री अपने मनमें सोच ही रही थी कि, उसके ध्यानमें अद्या समायी और उससे कहा कि हे, गायत्री ? तू ब्रह्माके चरण छू तो ब्रह्मा जागेगा । गायत्रीके ब्रह्माका पैर छूतेही ब्रह्माके नेत्र खुलगये तब उसने गायत्रीको अपने सामने खड़ी देखा । फिर अत्यंत रुष्ट होकर कहने लगा कि, तू कौन दुष्टा पापिनी है कि, मुझको मेरे पिताके ध्यानसे जगा दिया, मैं तुमको शाप दूंगा । तब गायत्रीने कहा कि, मेरा कोई दोष नहीं है, यथार्थ बात जानकर तब मुझको शाप देना । तुम्हारी माताने तुम्हें लेनेके लिये मुझको भेजा है, सो तुम शीघ्रचलो नहीं तो पछतावोगे । तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मैं कैसे चलूँ मुझे पिताके दर्शन तो हुएही नहीं । तब गायत्रीने कहा कि, तुम्हें किसी युक्तिसेभी पिताका दर्शन तुमको न होगा । तब ब्रह्माने गायत्रीसे कहा कि, यदि तू मेरी साक्षी माता के सामने दे कि, मैंने अपने पिताका

मंगलाचरण

दर्शन पाया है तो तेरे साथ चलूंगा । तब गायत्रीने मनमें विचार किया कि, मैंको सामने मिथ्या साक्षी देना तो महापाप है तो भी, परमार्थके निमित्त मैं मिथ्या भाषण करूँगी । इसके उपरान्त उसने ब्रह्मासे कहा कि, मैं तेरी साक्षी दूँगी; इतनेमें पुष्पावती नामनी एक दूसरी स्त्री जिसको गायत्रीने उत्पन्न किया था उस स्थान पर उपस्थित हुई । ब्रह्माने उससे भी कहा कि तू भी मेरी साक्ष देना । उसने भी स्वीकार किया कि, मैं भी तेरी साक्षी दूँगी । तब ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनों मिलकर तथा एक मत होकर अद्याके पास चले ।

तैत्तिरीयसूत्र प्रकरण

ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावती तीनोंका अद्याके पास जाना
और अद्याका उन्हें शाप देना ।

जब ब्रह्मा गायत्री तथा पुष्पावती सहित अद्याके सामने पहुँचे, तब तीनोंने माताको दंडवत् प्रणाम किया । तब माताने कहा कि, हे ब्रह्मा अपना कुशल समाचार कहो और अपने पिताके दर्शनका वर्णन करो कि, कैसे पिताका दर्शन किया ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, हे माता ! मैंने अपने पिताका दर्शन भली भाँति किया और पुष्प तथा अक्षत द्वारा उनकी पूजा की, गायत्री तथा पुष्पावती मेरे साक्षी हैं । तब अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि हे गायत्री ! तू सत्य सत्य कह कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और भलीभाँति उसका पूजन किया ? तब गायत्रीने उत्तर दिया कि, हों माता ! मैंने स्वच्छभुसे देखा कि, ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन पाया और उसकी भलीभाँति पूजा की । फिर अद्याने पुष्पावतीसे पूछा—हे पुष्पावती ! तू सत्य बता कि, क्या ये दोनों सत्य बोलते हैं ?— तब पुष्पावतीने कहा कि हों माता ये दोनों सच्चे हैं मैंने अपनी आँखों देखा कि ब्रह्माने अपने पिताका दर्शन किया और उसकी पूजाकि । तीनों की यह बात सुनकर अद्या सोचने लगी कि, अलखनिरञ्जनने तो मुझसे कहा था कि, मेरा दर्शन कोई न पावेगा; उसको यह क्या हुआ कि, इनको दर्शन देदिया ! जब सोचकर २ कुछ समझमें नहीं आया तो अद्याने घबराकर अलख निरंजनका ध्यानकरके उससे पूछा कि, ये तीनों जो कहते हैं, इनमें कहाँतक सचई है सो तुम बताओ । तब निरञ्जनने अद्यासे ध्यानमेंही कहा कि, ये तीनों ही झूठे हैं इन्होंने मेरा दर्शन नहीं पाया है, अपनी बड़ाईके लिये तुमसे असत्य कहते हैं । देखो अनुरागसागर ।

“ब्रह्मा मोर दरस नहिं पाया । झूठसाख इन आन दिखाया ॥
तीनों मिथ्या कहें बनायी । जनि मानहु यह है लबरायी ॥

(अनुरागसागर)

जब इस प्रकार कालनिरञ्जनसे पूछकर अध्याने मालूम कर लिया कि, ये तीनों झूठ बोलते हैं। तब वह अत्यंत क्रुद्ध होकर पहले ब्रह्माकी ओर मुड़ी और कहने लगी, हे ब्रह्मा ! तू झूठा है और झूठकी खान है—इस कारण तेरी पूजा संसारसे उठ जावेगी और तेरी संतति द्वार २ पर ठोकरें खायेगी तथा जैसा तू झूठा है वैसीही तेरी सन्तान भी झूठी होगी। स्वार्थ सिद्ध करनेके निमित्त सदा झूठ बोलेंगी, निज स्वार्थके निमित्त कथा पुराण सुनावेगी, परमार्थके निमित्त नहीं, दूसरे मनुष्य जो उसके कथा के श्रोता होंगे उनके मनमें तो ज्ञान तथा वैराग्य उत्पन्न होगा, पर वह स्वयं इससे बञ्चित रहेंगी उसके हृदयोंपर कालिमा छायी रहेगी, उसके मनमें भक्ति कभी नहिं उपजेगी—देखो, अनुरागसागर।

यह सुनि माता कीन्हीं दापा । ब्रह्माको तब दीन्ही शापा ॥
पूजा तोर करै कोउ नाही । जो मिथ्या बोल्यो मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिरलीन्हा ॥
आगे होइहै जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रकट करहि बहुनेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्त सो करिहै हंकारा । ताते परि है नरक मँझारा ॥
कथा पुरान औरिहैं समुझैं हैं । चाल विहून आपन दुख पैहैं ॥
उनते और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहैं परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल घर जैहैं ॥
जाकहैं शिष्य करैं पुनि जायी । परमारथ तेहि नाहि लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार्थ अर्थ सवैं समुझहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिढैहैं ॥
आप ऊँच औरिहै कह छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

(अनुराग सागर)

इस प्रकार ब्रह्माको शाप देकर तब्र अद्या गायत्रीकी ओर फिरी और कहा कि, हे गायत्री ! तूने जो मिथ्या साक्षी दी उससे चार पैर की गाय हो जावेगी और तेरे अनेक पति होंगे—तथा तू विष्ठा और निषिद्ध वस्तुओंको खाती फिरेगी। फिर अद्या पुष्पावतीकी ओर फिरी और कहने लगी कि, हे पुष्पावती ! तू जो ऐसा झूठ बोली इससे तू जाकर पृथ्वी पर पुष्प बनेगी और केवडा

तथा केतकी तेरा नाम होगा, लोग तुझको गंदे स्थानमें लगावेंगे—और जो कोई तुझको लगावेगा वह निर्बंश होगा ।

चोतीसवाँ प्रकरण

निरंजनका अद्याको शाप देना ।

इस प्रकार अद्याने तीनोंको शाप तो दिया किन्तु फिर अपने मनमें चिंता करने लगी, कि, मैंने तीनोंको शाप देकर आपत्तिमें फँसाया । मैंने तनिकभी धीरज नहीं रखा । ये तीनों दुःखी हो गये । इस कारण न जाने निरञ्जन मुझको क्या कहेगा ? यह बात अद्या अपने मनमें सोच रही थी कि, निरञ्जनकी ओर से आकाशवाणी हुई कि, “हे भवानी ! मैंने तुझको सृष्टिके फैलाव करनेके निमित्त नियुक्त किया था, उसके विपरीत तूने किया—अर्थात् इन तीनोंको शाप देकर दुःखी कर दिया, सो जो कोई बलवान किसी निर्बलको दुःख देगा या सतायेगा तो मैं उसका परिशोध करूँगा । किसीका बदला कदापि नहीं छोड़ूँगा । सो तूने जो इन तीनोंको शाप दिया है—इस कारण जब द्वापरयुग आवेगा तब तेरा अवतार होगा और तेरे पाँच पति होंगे और तू भी दुःख पावेगी । सो द्वापरमें अद्याका द्रौपदीका अवतार हुआ । जब इसप्रकार निरञ्जनने अद्याको शाप दिया—तब आकाशवाणी सुनकर बड़ेही दुःखसे वह विलाप करने लगी और कहने लगी कि, हे निरञ्जन ! मैं तेरे वशमें हूँ तेरे मनमें आवे सो कर ।

पैंतीसवाँ प्रकरण

विष्णुका पिताके दर्शनको जाना, गौरसे श्याम होना और तीन लोकका राज्य पाना ।

फिर भवानी विष्णुके समीप गयी और उससे कहा कि, तुमभी जाओ और पिताका दर्शन करो और उसके दर्शनका हाल मुझसे कहो । तब विष्णु पाताल लोकको चले, जाते २ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ शेषनाग थे, शेषनामकी फुँफकारके विषसे विष्णु अचेत हो गये और उसी विषके प्रभावसे विष्णुका रङ्ग बदल गया नहीं तो उसके पूर्व उनका रंग गोरा था, सो नीला आसमानी रङ्ग हो गया और विषकी उष्णतासे घबराकर वे पीछे पलट पड़े । उस समय निरञ्जनकी ओरसे विष्णुको आकाशवाणी हुई कि, हे विष्णु ! तुम अपनी

माताके पास जाकर सत्य २ कहो— सावधान झूठ न बोलना । जब विष्णु पातलसे पलट आये और माताने पूछा कि, हे विष्णु ! अपने पिताके दर्शनका विवरण कहो । तब विष्णुने कहा कि, माता मैंने अपने पिताका दर्शन तो नहीं पाया उलटा शेषनागके विषकी तीक्ष्णताके कारण मैं अचेतहो गया और मेरे शरीरका वर्ण बदल गया । यह बात सुनकर अच्छा अत्यंत हर्षित हुई और कहा कि, वत्स ! तूने नितान्तही सत्य बात कही—मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन करादूंगी । इसके उपरान्त उसने विष्णुका मुंह चूमा और बड़ा लाड प्यार किया और आशीर्वाद देकर कहा कि बेटा ! तू त्रिलोकका राज्य करेगा समस्त मनुष्य तथा देवता तेरी बंदना करेंगे और तू सकल सृष्टिका पालक होगा, सब तेरे अधीन तथा आज्ञाकारी होंगे, ब्रह्मा तथा शिव दोनों तेरी आज्ञा मानेंगे और तेरी अधीनता करेंगे ।

छतीसवाँ प्रकरण

विष्णुको पिताका दर्शन होना

हे पुत्र ! मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन, दोनों रीतियोंसे कराती हूँ तू अपने पिताको अपने मनके भीतर भी देख और जहाँ वह सिंहासनाखूढ है उस स्थानको भी देख । इतना कहकर अद्याने विष्णु पर अति प्रसन्नतासे निरञ्जनका दर्शन करा दिया । देखो अनुरागसागर ।

पुनि कहि अस आदि भवानी । अथ मुनहु पुत्र प्रिय मम वानी ॥
देखु पुत्र तोहि पिता भेटाऊँ । तोरे मनकर धोख मेटाऊँ ॥
प्रथम ज्ञान दृष्टि कर देखो । मोर वचन हिये परेखो ॥
मन सरूप कर्ता कहैं जानो । मनते दूसर और न मानो ॥
स्वर्ग पताल दौड मन कोरा । मन इस्थिर मन कहे अनेरा ॥
छन महैं कला अनन्त दिखावे । मन कहैं देखि कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनही आश दिवस निश्चिरहिये ॥
देखहु पलटि शून्यमहैं जोती । जहवाँ झिल मिलि झालर होती ॥
फेरहु श्वास गगन मह धाओ । मार्ग आकाशहिं ध्यान लगाओ ॥
पुनि माता काँह विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज बारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु असीसा । सब देवन महैं तुमही ईसा ॥

प्रथमावृत्तिका मंगलाचरण

जो इच्छा तुम चित्त महँ धरिहँ। सो सब तोर काज में कारिहँ ॥
देवन श्रेष्ठ तुम कहँ मनिहँ। तुम्हरी पूजा सब कोई ठनिहँ ॥

(अनुराग सागर)

विष्णु जब अपने पिताका दर्शनकर आनन्दित हुए तब विष्णु निरञ्जन और अद्या तीनों एक स्वरूप हो गये और ज्योतिमें ज्योति ऐसी समागयी कि, तनिक भी विभिन्नता नहीं रही। ब्रह्म, माया तथा जीव तीनों एक स्वरूप हो गये। यही पिता पुत्र तथा पवित्र आत्मा हैं। इन्होंने तीनों द्वारा बनेहुए परमेश्वरकी सूचना वेद देता है—और ऐसे ही खुदाका विवरण इञ्जीलमें लिखा है। जब ये तीनों एकत्रित हो जाते हैं तब सृष्टिका पता ठिकाना नहीं रहता और जब ये तीनों अलग २ होजाते हैं तब समस्त सृष्टि प्रगट हो जाती है। अद्याकी कृपासे विष्णु अपने माता पिताके समान बलिष्ठ तथा प्रभावशाली होगये। और इस-प्रकार निरञ्जन तथा अद्याने विष्णुको समस्त संसारका अधिकारी बना दिया और तीनों लोकके कत्तधितर्की पदवी प्रदान किया।

सैतीसवाँ प्रकरण

शिवका शाप और बर पाना ।

इसके उपरान्त अद्या शिवके समीप गयी और कहा कि, हे पुत्र ! मैंने अपने दो पुत्रोंको तो मार्ग बता दिया, उन्हें जो कुछ कहना था तो कह चुकी, अब तूभी अपने पिताका समाचार कह कि, तूने किस प्रकार अपने पिताका दर्शन पाया और किस प्रकार उसकी पूजा की ? यह बात सुनकर शिवजी चुप रह गये और मिथ्या तथा सत्य कुछभी न कहा—तब अद्या बोली कि वत्स ! तूने मौन धारण कर लिया और मिथ्या तथा सत्य कुछभी नहीं कहा—इस कारण तू योगसमाधिकर, शीशपर जटा रख, और शरीरमें भस्म रमा, तू क्रोधी तथा तेरा वेष भयानक होगा। तेरे अनुयायियोंमें जाति पातिका ध्यान नहीं रहेगा, अब और जो तेरे मनमें आवे सो मोंगले, मैं तुझको प्रदान करूँगी।

पुनि लहुरा कहै पूछे माता । तुम शिव कहो हियेकी बाता ॥
मोंगहु जो तुम्हरे चित्तभावे । सो तोहि देउँ मातु फरमावे ॥
दोई पुत्रन कहैं मता दिढावा । मांग महेश जोई मन भावा ॥
जोरि पानि शिव कहवे लीना । देहु जननी जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबर्हि न विनसे मेरी देही । हे माता मोंगौं बर एही ॥

१ अध्याय, सृष्टि रचना

कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥

करहु योग तप पवन सनेही । रहे चार युग तुम्हरी देही ॥

जौलों पिरथी अकास सनेहा । कबहुँ न विनसे तुमरी देहा ॥

तब शिवने कहा हे माता ! मेरे शरीरमें बड़ा बल हो और मैं अमर होऊँ तब अधाने कहा कि, हे पुत्र ! ऐसाही होगाः—निदान शिवजी बड़े वीर और अमर हुए विष्णु तीनों लोकके स्वामी तथा ब्रह्माकी संतान अर्थात् ब्राह्मण सब झूठे तथा धूर्त हुए ।

अङ्गीसवों प्रकरण

कर्मका बदला ।

विष्णुका शेष नागसे बदला ।

अब जानना चाहिये कि, विष्णुको शेषनागने जो कष्ट पहुँचाया था । उसके बदले तो शेषनागका अवतार कालीनागका हुआ । वह कालीनाग वृन्दावनकी यमुना नदीकी कालीदहमें रहा करता था और उसके विषकी ज्वालासे पशु पक्षी इत्यादि सब भस्म हो जाते थे । जब विष्णुने द्वारपर मैं कृष्णका अवतार लिया तब कालीनागको नाथा और अपने पुराने बदलेको पूरा किया और फिर प्रबल होकर शेषनागकी छातीपर अपना आसन जमाया, इस प्रकार बदला कभी किसीका नहीं छूटता ।

उनचालीसवों प्रकरण

विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना ।

जब ब्रह्माको माताने शाप दिया और जब उनको जान पड़ा कि, हमारी संतान द्वार द्वारपर भीख माँगती फिरेगी, तब वे अत्यंत दुःखित तथा मलीन मुख होकर विष्णुके पास गये और कहा कि, भाई आप बड़े भाग्यशाली हैं कि, माता आपपर दयालु हुई, हम तो उसके शापसे नष्टप्राय हो गये । हे भाई ! माताका क्या दोष है, यह सब अपनीही करनियोंका फल है । तब ब्रह्माको दुःखी देखकर विष्णुने उनको बहुत कुछ सन्तोष दिया और कहा कि हे ब्रह्मा ! आप मेरे बड़े भाई हैं और मैं आपका छोटा भाई हूँ, मैं आपकी सेवा तन मनसे करूँगा और जहाँ कहीं कथा कीर्तन होम और यज्ञ संसारमें मेरे नामसे होगा, सो सब ब्राह्मणों द्वाराही होगा, ब्राह्मण बिना कुछ न होगा, जो ब्राह्मणोंको प्रसन्न करेगा उससे

सत्यपुरुषका वर्णन सत्यपुरुषके प्रतिनिधि

में प्रसन्न रहूँगा। जो ब्राह्मणको दुःखी करेगा उससे मैं दुःखी होऊँगा। विष्णुसे यह बात सुनकर ब्रह्मा अति प्रसन्न हुए, और उन्हें निश्चय हो गया कि, अब हमारी संतान सुख पावेगी तथा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगी।

इस प्रकार तीनों भाई अपनी स्त्रियों सहित रहने और आनंद करने लगे। स्वयम् निरञ्जन तो शून्यमें जाकर शून्यस्वरूप होगये और तीनोंलोकोंका राज्य तथा शासन अपनी स्त्री अद्या और तीनों पुत्रों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) को सौंप दिया बस ए ही चारों समस्त संसारके मालिक हैं।

चालीसवाँ प्रकरण

मायासृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त।

इसके पहले मैं ब्रह्मसृष्टि और जीवसृष्टिका वर्णन कर आया हूँ, अब यहाँ से मायासृष्टिका विवरण करता हूँ —

मायासृष्टिका ऋष्टा स्वामी निरञ्जन है और इस मायासृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश सब कुछ कालपुरुष द्वारा हुआ करता है। ब्रह्म और जीव-सृष्टिका कभी विनाश नहीं होता, पर मायासृष्टिको इन्द्रजालियोंके सदृश काल-पुरुष उत्पन्न करता है और फिर समेट लेता है। जैसे भानमतीकी पेटारीमेंसे सब सामान निलकते फिर उसीमें समाजाते हैं, यही अवस्था उत्पत्ति तथा प्रलयकी है। इस मायासृष्टिका सदैव विनाश होता है और जन्म मरणका सब दुःख और सुख इसीमें है निरञ्जने जब मायासृष्टि रची, तब प्रथम कर्मका जाल बनाया। स्वर्गकी रचना की, भयानक तथा रौचक सब इस मायासृष्टिके निमित्त ठहराया और पिता पुत्र अर्थात् निरंजन और विष्णु राज्य करने लगे। निर्गुण तथा सगुण अर्थात् निर्गुण निरञ्जन जो परमेश्वर वा खुदा कहलाता है और सगुण विष्णु राम, कृष्ण इत्यादि सशरीर अवतारधारी परमेश्वरकी पूजा सारे संसारमें होनेलगी। निर्गुणको योगीलोग योग समाधि द्वारा पाते हैं और सगुण विष्णुको समस्त हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और मूमाई पूजन करते हैं यह मायासृष्टि सदैव बंधनमें रहती है उसका छूटना महा कठिन है।

इकतालीसवाँ प्रकरण

मायासृष्टिका विवरण।

अद्या, ब्रह्मा, विष्णु और महेशने चार खान चौरासी लाख योनिकी

स्वसंवेदके प्राकट्यका वृत्तान्त

रचना की । यही चारों इस सूष्टिके उत्पन्न कर्ता हैं । अण्डज खानि को अद्याने उत्पन्न किया, अण्डजखान उसको कहते हैं जिसकी उत्पत्ति अण्डे, द्वारा होती है ।

दूसरे पिण्डज खानको ब्रह्माने बनाया—पिण्डज खान वह है, जो बच्चा देते हैं ।

ऊष्मजखान विष्णुने उत्पन्न किए—ऊष्मज खान वह है जो वस्तुओंके भले बुरे संयोगसे उत्पन्न होते हैं । जैसे मच्छड मक्खी इत्यादि ।

स्थावर खानके रचयिता शिवजी हैं और स्थावर खानमें समस्त जड-पदार्थ हैं ।

इस प्रकार इन चारोंसे चारखान चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न हुए । इस प्रकार सब जीव सारे संसारमें भरगये । तब अद्याने अपने तीनों पुत्रों—को तीनों लोकोंका राज्य सौंप दिया और आप मथुराको छोड़कर कोट कांग-डामें गयी । फिर हिंगलाजमें जाकर रहने लगी ।

इधर तीनों भाई लोकोंपर राज करने लगे और नरक वैकुण्ठ इत्यादिका प्रचार हुआ और तीर्थ, व्रत, कर्म, धर्म, वेद पाठ इत्यादि संसारमें प्रचलित हुए तथा सिद्ध, साध, साधक इत्यादि सब प्रकट हुए । इस प्रकार तीनों देवताओंका राज्य पृथ्वी पर प्रचलित हुआ । उन्हीं तीनोंको समस्त मनुष्य जाति परमेश्वर जानने और उन्हींकी पूजा सेवाको सत्य मानने लगी और यही तीनों समस्त संसारके परमेश्वर ठहरे ।

बयालीसवाँ प्रकरण

वैकुण्ठका वृत्तान्त ।

वैकुण्ठ पृथ्वीसे साठ सहस्र योजन ऊँचा है—और दक्षिण और पूर्वके कोने पर ध्रुव भक्तका स्थान है । उसके दक्षिण और पश्चिमके कोनेमें अग्नि देवता रहते हैं उसके पूर्व और दक्षिणके कोनेमें राजा इन्द्र रहते हैं । यह वैकुण्ठ बड़ा सुन्दर स्थान है और विष्णुके रहनेकी जगह है । इस वैकुण्ठके बीचोंबीच विष्णुका सिंहासन स्थित है उस सिंहासनपर विष्णु महाराज विराजते हैं और सारे देवता, ब्रह्मा, महेश इत्यादि उनके दरबारमें उपस्थित रहते हैं । यही विष्णु परमेश्वर और सर्वशक्तिमान् इत्यादि कहलाते हैं । सातों आकाश तथा पृथ्वी पातालादि सब चौदहों भुवनमें आप आया जाया करते हैं । प्रत्येक स्थानपर विष्णु उपस्थित रहते और सब सिद्ध साधु इत्यादिको बन्दरके भांति नचाया करते हैं । यह विष्णु मायापति हैं, उनकी मायाने समस्त संसारको घेर रक्खा