कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानीजीके नाम
सात सहस्र लाल लगे । जब वह पिंजरा प्रस्तुत हुवा तब उसमें उस तोतेको रक्खा, रानी तोतेको पढ़ाने लगी कि, तोता ! तू राम राम कह । उस समय तोता बोला कि, ए राजा रानी ! ध्यान दो कि, तुम्हारे ऊपर कालचक्र घूमता है उसके भयसे भयभीत हो । यह बात सुनकर राजा कुछेक तो सचेत हुवा फिर निश्चितता तथा धनके मदमें किसको ज्ञान होता है ? तब उस तोतेने सोचा कि, राजाको इस प्रकार ज्ञान नहीं होगा । अपनी शक्ति इस प्रकार प्रगट कि, की राजाके महलोंमें आग लग गई, सब कुछ जलने लगा । जब हाथी और घोड़ों पर आग दौड़ी, तब राजा घबरकर रानीसे कहने लगा कि, तोता जला कि बचा ? कारण यह कि, राजाको तो इसी तोतेसे बड़ा प्रेम था । रानी रोककर कहने लगी कि तोता तो जला अब हमारे भाग्य फूटे । राजाने आदमियोंको बुलाकर कहा कि, तोतेको देखो । लोगोंने देखा कि, समस्त धन सम्पत्ति जल रहा है पर तोतेके पिंजरेको अग्नसे तनिक भी हानि नहीं पहुँचती । पिंजरेपर्यन्त तनिक भी गर्मी नहीं पहुँचती है । पश्चात् अग्नि बुझी राजा रानी देखने दौड़े । तोतेको पिंजरे सहित सुरक्षित पाकर अत्यन्त आह्लादित हुए । तोतेको अपने हाथसे पकड़कर अपनी छातीसे लगाया । राजा रानी शोचने लगे कि, यह शुक्र नहीं, वरन् सिर्जनहार है । राजा रानी हाथ बाँधकर निवेदन करने लगे कि, ऐ तोता ! तुम बारह बरस हमारे घर रहे, अब तुम अपना तात्पर्य बताओ । तब वह तोता पिंजरेसे बाहर निकल कबीर साहबका स्वरूप हो राजाको समझाने लगा कि, ऐ राजा ! मैं तुम्हारा सत्यगुरु हूँ, तुम्हें मुक्तिप्रदानार्थ आया हूँ कि, अब तुम यह देह छोड़कर सत्य लोकको चलो । तब राजा रानीने सत्यगुरुको पहचाना, आपके चरणों पर गिर पड़े राजा रानी अपनी सन्तानों सहित सत्यगुरुके चरणों से चमट गए, रत्नजटित स्वर्णके सिंहासनपर सत्यगुरुको बैठाया सब सेवा करने लगे । इस राजाके चौदाहवीं रातके चंद्रके समान तेरह रानियाँ थीं, अति स्वरूपवती पाँच बेटियाँ और चार पुत्र थे । वे सब कबीर साहबसे दीक्षा लेकर भक्ति करने लगे इसके साथ अन्यान्य मनुष्योंने भी सत्यगुरुकी दीक्षा ली । कुल एकतीस मनुष्य परम धामको पहुँचे । इस राजाके समयमें अट्ठाईस हाथ लम्बा और चौदह हाथ चौड़ा पान था, दो हाथीके बराबर नारियल था । तब राजा उसके साथी गदगद वाणीसे सत्यगुरुकी वंदना करने लगे ।
स्तुति—हंस नायक परम लायक, आय प्रभु दर्शन दियो ।
काग पलट, मरालकर, भौंसिंधु बूढत गहि लियो ॥
ए सत्यलोकमें रहनेवाले हंसोंके स्वामी ! हे समर्थ प्रभो ! आपने
मुझपर बड़ी कृपा की । जो कि, मुझे अपने आप आकर दर्शन देदिया, आपने कौवेको हंस बना दिया । एवं भवसागरमें डूबते हुए को बचा लिया ।
सोरठा—सद्गुरु चरण मयंक, चित चकोर राजा निरखि ।
कीन्ह मोहि निःशंक, जरा मरण भ्रम मिटि गयो ॥
सद्गुरुके चरणरूपी निष्कलंक चन्द्रमाको राजाका चित्तरूपी चकोर निश्चल भावसे देखने लगा और बोला कि, हे गुरो ! आपने मुझे निशंक कर दिया मेरे जरा, मरण और भ्रम सब मिट गये ।
मुस०—करे को रहम तुझविन आसियाँ पर । नजर जिसकी नशत नियत जयाँपर ॥
कि है तू साहबांका साहब आला । वहाँ सत्पुरुष सो सद्गुरु यहाँ पर ॥
जिसे तूने अजर जामा पिन्हाना । हवस उसको नपाशिश परनियाँ पर ॥
बिखेरादाना महसूसात सैयाद । बदामें वेदबानीके बयाँपर ॥
लगाया मुहू तूने जिस्पे उसको । नजर क्या मार्ग रुहे माकियाँ पर ॥
तू है कबीर सबका दीनों ईमाँ । पतितपावन है शपफूररहीमाँ ॥
नैवाजिशकी निगह कुल आलमो पर । बजब्वारो अफू भी जालिमों पर ॥
खता कारों गुनहगारोंको बखशे । रहमतू क्योंन करतुम तालिबोंपर ॥
मनी और किन्नकी वू देख जिसमें । महरने है कहर सब गालिबों पर ॥
करेपर खाकसार इल्मों अमलसे । रतनबखशीलफिरोतनकालिबोंपर ॥
नजर हो मेह्तुझ जिस बद गुहर पर । बढावे दरजः सदहा सालिहोंपर ॥तू॥
न जाना होश मन्दाने जमानः । बसर कर जिन्दगानी जाहिदान ।
रेयाजंत ओ इबादत शाफ फ़ाकः । करोड़ों जन्म बीते इह वहानः ।
न पाया भेद इसरारे निहानी । फिर हर दर व हर खाने बखानः ॥
हुआ रहबर तु जिसका आपही आप । तेरी रहमत बना नाम निशानः ॥
दिखावे रह बजुज तुझ कौन आजिज । बतारीकी फिरे सब अबलहान ॥
तू है कबीर सबका दीनों ईमा । पतित पावन शपफूररहीमाँ ॥
हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, नमरुद, शद्वाद, फिरऊन इत्यादि तो ऐसे अत्याचारी न थे जैसा कि, यह राजा था । यह तो इनसे बहुत बढ़कर था । कैसे अत्याचार तथा पापसे पृथ्वीको भर दिया निर्दोषोंके रक्तसे लाल कर दिया । देखो दयालु सत्यगुरुने उस परभी दया की कि, उसको उसके आत्मसंबंधियों सहित परम धामको पहुँचा दिया । इसी साहबका नाम दयालु तथा निर्दोष हैं । अन्य किसीका कदापि नहीं हो सकता । यही साहब कुल श्रेष्ठ गुणोंसे विभूषित हैं । दूसरा कोई नहीं है । जो नितान्तही क्रोधसे योग्य था उस पर ऐसा
अनुग्रह हुआ । ऐसे साहबको जो न पहचाने उसके दुर्भाग्य ही समझने चाहिये । यह ऊपर कहे हुए मुसदूतका सार है ।
राजा योगधीर ।
यह राजा सत्ययुगमें था । उसके घर सत्य सुकृतजी (कबीर साहब) गए और वह राजा बड़ा अभिमानी था वेदपाठी भी था । दूसरोंको बहुत कुछ उपदेश दिया करता था । बारह वर्षपर्यन्त सत्यसुकृतजी महाराज उसको सिखाते रहे । वह बारह वर्ष पर्यन्त तलवार लेकर मारनेको दौड़ा । सत्यगुरुने समझाया कि, ऐ राजा ! इस पृथ्वीपर बड़े बड़े राजा हो गए । ऐसे बलिष्ठ तथा प्रभावशाली राजे थे कि, तारोंके समान उनके पास अश्व थे । वे ऐसे शीघ्रगामी तथा तेज चलनेवाले थे कि, तीन पगमें समस्त पृथ्वीको समाप्त कर जावे । एक पलभर में सहस्रों कोश उड़ जावे । सो सब मरकर कालके गालमें जावसे । तू उनके सामने क्या वस्तु है ! ए राजा ? तू इतने घमंडमें क्यों है । यह किसीका नहीं रहा है ।
एक दिन लोग राजाके पास आए निवेदन किया कि, ऐ राजा ! हमको यह बड़ा दुःख है कि, हमारी मुक्ति किस प्रकार हो, आवागमनसे कैसे छूटें ? तीनों तापोंसे किस प्रकार बचें ? कालका बड़ा भारी भय है । हमको इससे कौन बचावे ? आप तो हमारे महाराजा हो, । हमको कालके भयसे बचाओ । आप हमारे धनी तथा स्वामी हो, हमें इन दोनों दुःखोंसे बचाओ । एक गर्भमें आने तथा दूसरे अग्निदाहसे आप हमारी रक्षा करें ।
राजा योगधीर वचन ।
चौ०-राजा कह मैं बड़ा अभाग । यही दुःख मोहूको लाग ।
जो कोइ इनसे लेइ छोड़ाई । ताको पावैं हम धरहीं भाई ॥
गरभ वास जो मेटें फेरा । मैं अब होउं उन्हींका चेरा ॥
राजाने कहा कि, ऐसा कौन है जो आवागमनका दुःख दूर करे, बड़े बड़े सिद्ध साधु ऋषि मुनि और देवता इत्यादि आवागमनके बंधनमें पड़े हैं । मेरे मनमें बड़ी चिन्ता है कि, गर्भमें आनेकी बात कैसे छूटे ? तब लोगोंने समझाया कि, ऐ राजा ! सुन । सत्य सुकृतजी महाराजमें यह बल है दूसरोंमें नहीं, वह तो स्वयम् पुराण पुरुष हैं । इस सर्वशक्तिमान्का लोक जुदा है । तीनों गुण अपार हैं इस साहबका देश पर है । यह तीनों लोक तीनों गुणोंके अधीन हैं । इस सत्य-
गुरुका देश न्यारा है, वहाँ जो कोई जाता है अमर हो जाता है । वह अजर अमर घरमें जाकर रहता है । फिर भवसागरमें कभी नहीं आता ।
जब इतनी बात लोगोंने कही तब राजाके मनमें सोच समझ आई । उक्त राजा सत्यगुरुके चरणोंपर गिरा । सत्यगुरुने दया करके इस राजाको अपनी दीक्षा दी उक्त राजाके साथ नौलाख मनुष्य सत्य सुकृतजीके शिष्य हुए । सब पर सत्यगुरुकी कृपा दृष्टि हुई । राजाका अंतःकरण शुद्ध हो गया अपनी समस्त रानियों तथा पुत्रोंसहित सत्यगुरुके चरणोंमें लग गया । इस राजाका पिता जो मरकर हाथीकी देहमें था उसपर भी सत्यगुरुकी कृपा हुई, वह भी श्रेष्ठ तथा प्रतिष्ठित हुआ । सबोंने परम शुद्धताको प्राप्त कर मुक्ति पाई । राजा कनक हाथीके शरीरसे छुटकारा पाकर सत्यगुरुका अनुगृहीत हुआ । यह बहुत बड़ा राजा था उसके पास लाखों सिपाही सोलह सहस्र बौद्धियाँ और अठारह सहस्र हाथी थे । राजा रानी इत्यादिने सत्यगुरुकी दीक्षा पाई । सत्यगुरुने उनके शिरपर हाथ रखा तब सबको अगम ज्ञान हो गया । सब भविष्यकी बातें और तीनों कालका हाल जानने लगे । समस्त संसारके पदार्थोंको तुच्छ तथा नाशमान समझने लगे । यद्यपि उसके अधीन बड़ी सम्पत्ति तथा अतुल वैभव था तो भी उसमें उनकी आसक्ति नहीं थी ।
उस राजाके गृहमें कबीर साहब इसी प्रकार रहे थे कि, जैसे नरहर ब्राह्मण और नीरू जोलाहेके गृहमें रहे थे । वह समय सत्ययुगका था । कबीर साहबका नाम सत्य सुकृतजी प्रसिद्ध था—कबीर साहब इस राजाको इसी प्रकार सिखलाया करते थे, सत्यलोक तथा सत्य पुरुषका समाचार दिया करते थे । यह राजा आपका कहना न मानता था पर था वेदपाठी । वेदकी शिक्षा लोगोंको दिया, करता था । यही कारण था कि, सत्यपुरुष उसके घर आये थे । अन्तमें उसका परिणाम अच्छा हुआ कि, सत्य सुकृतजीके चरणोंमें लग गया इस राजाका विशेष वृत्तान्त ग्रंथ कनकबोधमें देखलो वहीँ सब विस्तारके साथ लिखा है ।
रानी लीलावती और पूर्णवतीके शिरपर जब कबीर साहबने अपना हाथ रक्खा तो उनका हृदय विकसित हो गया, उन्हें अपने पूर्व जन्मकी सुध हो गई । समस्त वृत्तान्त कहने लगीं । इस प्रकार पचास रानियाँसत्य गुरुके देश पहुँचीं । राजा अपनी बौद्धियों सहित सत्यगुरुके शरण आकर सत्यगुरुके देश पहुँचा । जितने लोग सत्यगुरुके शरण आये नेहाल हो गये तथा जो आयेंगे वो निहाल हो जायेंगे ।
राजा भूपाल ।
कबीर सागर ५ में बोधसागर है। उसीमें भोपाल बोध भी है। उस ग्रन्थमें इस प्रकार लिखा है कि, धर्मदासने कबीर साहबसे पूछा कि, ऐ सत्यगुरु ! काल चोर जो जीवनको मारता है वो किस प्रकार मारता है ? आप उसका वृत्तान्त मुझसे कहिए। यह बात सुनकर सत्यगुरु बोले कि, ऐ धर्मदास ! मैं इसके मारनेका लक्षण बताता हूँ तुम सुनो। धर्मरायने यमको आज्ञा दी कि, ऐ यम ! तुम पृथ्वीपर जाओ वहाँ मनुष्योंकी अधिकता हो गई है, पृथ्वीसे बोझ सहन नहीं होता है। तुम मनुष्योंको मारकर मेरे पास लेआओ, सबके भीतर वायुस्वरूप होकर समाजाओ। सब मनुष्योंमें रोग उत्पन्न करो। खोसी ज्वर, कंपानेवाला ज्वर, तिजारी, काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा और भी अनेकों फौसी डालकर सब मनुष्योंको फँसाओ इसी फन्दमें सब फँसे हैं। सुकृतजीको कोई पहचानता नहीं है। इस कारण मैं तुमको भेजता हूँ। ऐ यम ! धर्मराजकी इतनी बात सुन; यम आकर सबको दुख देने लगा। सत्यलोकमें सत्यपुरुषका वचन हुआ कि, ए सत्य सुकृतजी ! तुम संसारमें जाओ सारशब्दका उपदेश करो, जिसमें कालपुरुष हंसको न पासके। ज्ञानी जी पुरुषकी आज्ञा स्वीकार कर सत्यपुरुषको प्रणाम करके जालन्धर देशमें आये। वहाँ का राजाका नाम राजा भूपाल था। इस राजाके द्वारपर ज्ञानीजी महाराज जिन्दारूप धरकर जा खड़े हुए। चोपदारसे कहा कि, राजाको हमारे पास बुला लाओ। वह हमारा दर्शन करे, हमारे दर्शनसे उसके सब पाप दूर हो जावेंगे, कर्मके बंधन कट जावेंगे। वहाँ द्वारपर ताला लगा हुआ था, भीतर जानेका कोई पथ नहीं था। बहुत चौकीदार बैठे थे। उनमेंसे देखकर कितने कहने लगे कि, यह ठग है। कोई कहता कि, यह बटमार है। कोई कहता है कि, इसको मारकर निकाल दो, यही चोर है, ब्रह्मकी बातें करता है, निर्गुणका भेद किसीको मालूम नहीं हुआ। इसी प्रकारकी बातें कहते सुनते सारी रात बीत गई, भोर हो गया। उस समय ज्ञानीजीने कुछ अपना कौतुक दिखलाया कि, द्वार फट गए महलोंके कँगूरे गिरने लगे, टूट टूट सब आकर पृथ्वीपर पड़े। ज्ञानी जी राजाके पास चले। यह कौतुक देखकर सब लोग आश्चर्यान्वित हुए, ज्ञानीजीके पीछे पीछे होलिये। जहाँ राजा बैठा था वहाँ चौबदार दौड़कर गया। पुकार की कि, महाराज ! यह जिन्दा बड़ा चोर है। उसने कहा था कि, द्वार खोलो। हमने उसका वचन न मानकर उसको रात को रोक रक्खा था। इस कारण जिन्देने एक मंत्र पढ़ा समस्त द्वार फट गए कँगूरे टूटकर गिर गये जिन्दा भीतर चला आया, उसके पीछे
हम सब चले आए हैं । महाराज ! इसको अभी मारो । हम सत्य बात कहते हैं, नहीं तो यह सबको मार देगा, हम मारे जायेंगे ।
राजाने कहा कि, प्रथम विचार देखें पीछे उसका रक्तपात करेंगे । ब्राह्मणोंको बुलाया विचार किया गवाही पूछी । इतनेमें ज्ञानीजीने एक ऐसा कौतुक दिखाया कि, समस्त महल सुवर्णका हो गया । जो राजाके द्वार थे वे सब सोनेके हो गये । वे हीरे, लाल, जवाहरात इत्यादि जड़े हुए हो गए । सब कँगूरें भी सुवर्णके हो गए । यह कौतुक देखकर राजा बड़ाही आश्चर्यान्वित हुआ । राजाके मनमें विवेक आया । उसको निश्चय हो गया कि, यह तो कोई महाश्रेष्ठ पुरुष है । राजाने पूछा कि, आप कौन पुरुष हो ? आपने मुझको दर्शन दे कृतकृत्य किया है । तब ज्ञानीजी बोले कि, हम सत्यपुरुषके अहंसी हैं, मनुष्योंके मुक्तिप्रदानार्थ संसारमें आये हैं । सत्यलोक सत्यपुरुषका है । उसको कोई नहीं जानता । हे राजा ! यमके जालको पहिचानो, हमारे शब्दको परखो नहीं तो तुमको काल खा जावेगा । राम राम जो जपते हो उस विधिसे जपो । यदि अपनी भलाई चाहते हो सत्यगुरुकी शरणमें आओ । भ्रम छोड़कर सेवा करो, सब अच्छे अच्छे गुण धारण करो । जब उस सत्यपुरुषके लोकमें जाओगे उसकी शरण प्राप्त करोगे तब तुम्हारा आवागमन छूट जावेगा । पुरुषकी आज्ञासे हमने तुमको दर्शन दिया है । हे राजा ! तुम अभिमान छोड़ो दूढ़ होकर भक्तिमें लीन हो । राजा, रानी, बेटा, बेटी, सब पान लो पुरुषके नामकी आरती करो । तिनका तोड़वाओ सुरति अङ्गका बीड़ा लो, जिससे तुमको काल न छुवे । जिसके घरमें सत्य गुरु पदार्पण करें वह बड़ा भाग्यवान् है । हे राजा ! विलम्ब न करो मन चित्त लगाकर भक्ति करो । तब राजाने बदनाका बाँह पकड़कर महलमें ले गया । तब कहा मैं बड़ाही भाग्यवान् हूँ, क्योंकि मैं महापापी था । परन्तु आपने मुझको बचा लिया । हे प्रभु ! अब मेरे तीनों ताप छूटे । रानीने भी सत्य-गुरुके चरण धोए, बड़ी स्तुति करके कहा कि, आपके वचन सूर्यसम अज्ञान तिमिरको नष्ट करनेवाले हैं । मुक्तिके देनेवाले तथा सबके तारनेवाले हैं । जो नम्र हैं उनके दुःखको दूर करनेवाले भवसागरकी अग्निको बुझानेवाले हैं । सुवर्णकी थाली और झारीसे राजा रानीने सत्यगुरुका चरण धोकर चरणामृत माथेसे लगाया, सारे घरके लोगोंने सत्यगुरुका चरणामृत लिया तथा दण्डवत्की ज्ञानीजीका वचन सुनकर राजाने भली भाँति निश्चय करके कहा कि, हम और पुरुषको नहीं जानते हैं । आपही पुरुषरूप हो । रानी बोली कि, साहब मेरे निमित्त ही आये हैं, मेरी मनकामना पूर्ण हुई है, शीघ्रही शरण लेकर कालसे बचना
चाहिये । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! तुम सब कुछ छोड़दो । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कार, सर्व संसार और माया, कालका पसारा है । इस हेतु संगांरको छोड़कर शब्दको ग्रहण करो । जिससे फिर जन्म मरण न होगा । स्वर्ग नरकको न भरमोगे, अजर अमर घर पाओगे, जो कोई शब्द न मानेगा उसको काल खा जावेगा । मोहकी नदी भारी है । इससे पार जाना कठिन है । पार उतारनेके निमित्त केवल सत्यगुरु भल्लाह है, उसीके साथ पार उतरना हैं । तब राजा बोला, हे सत्यगुरु ! आपके चरणकमलमें मन कैसे टिकाऊँ ? कैसे राज्यका मद उतरे ? कैसे पाखण्डको छोड़ूँ ? बड़प्पन और चतुराई कैसे दूर हो ? हँसी मसखरी नाना प्रकारके छूत, भोग विलास तथा मिथ्या भाषण, जाति, पांति कुल, परिवार, सुवर्ण-मन्दिर, सुख विहार किस प्रकार छोड़ दूँ ? सत्यगुरुने कहा कि, यह सब छोड़कर पुरुषके निकट चलो । राजा बोला कि, अपने शरणमें रखो मेरे माथे पर हाथ धरो, मुझे पापीको बचालो । मैंने सब छोड़ा, सर्व रोनियोंको पचास बेटोंको बीस सहस्र हाथी आदि सर्व सामग्रीको छोड़कर आपके साथ रहूँगा । मुझको तो भक्ति प्यारी लगी है । आपके अमृतवचन सुनकर मेरे सब दोष दूर हो गए । अब कृपा करके अमृतरूप नाम मुझको दीजिये, आपकी भक्ति बड़े भाग्यसे मिलती है, बारम्बार आपसे यह निवेदन है कि, आप मुझको पुरुषका दर्शन कराओ । ज्ञानीजी बोले, हे राजा ! हम तुमको सत्य नाम देंगे । तुमने मुझे पहचाना, इस कारण सत्यपुरुषके नामसे तुम एक यज्ञ करो । (जिस नामसे हंस बचते हैं) । जरीका चंदवा तानो, सुवर्णका सिंह्रासन बनवाओ, सुवर्णमय दीवारगीर तथा मोतियोंकी झालर बनाओ । गजमुक्तासे थाल भरकर धरो, सोनेका कलश धर उसपर पंचमुखी दीपक जलाओ । सरांश यह, सद्गुरुकी आज्ञानुसार राजाने दीक्षा लेनेका समस्त नियम किया । तब सत्यगुरुने राजा रानी इत्यादिको अपने शरणमें लिया, उन सबोंने सत्यगुरुको दण्डवत् करके उनकी स्तुति की । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! यहाँ का राजा कालपुरुष है, मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता, अब मेरा यहाँ कुछ काम नहीं है । मुझको अपने लोकमें ले लो, सत्यपुरुषका दर्शन कराओ । राजाकी नौ सौ रानियाँ तथा पचास बेटे सत्यगुरुके सामने हाथ बाँधकर खड़े विनती कर रहे थे । राजाकी एक पुत्री थी, वह भी सत्यगुरुके शरणमें आई सब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर कहनेलगे कि, हम कदापि आपका शरण न छोड़ेंगे । सत्यगुरुने सब जीवोंको सत्य पुरुषका दर्शन कराया । जितने जीवोंने पान पाया सब सत्य पुरुषके दरबारको चल दिये ।
राहमें जब चले जाते थे, कालके दूतने एक ऐसा कौतुक दिखाया कि, सुकृतजीके साथ जितने हंस थे उतनेही रूप धरकर यमके दूत आये । वैसेही छापा तिलक आदि सब कुछ बनाकर कहने लगे कि, हे हंसगणो ! हमारे साथ चलो । तब हंसोंने उत्तर दिया कि, हम तुमको भली प्रकार पहचानते हैं कि, तुम ठग बटमार हो हम तुम्हारी बातें नहीं सुनते। हम तो जिनके हंस हैं उन्हीं साहबके पास जावेंगे । हम तुम्हारी दगाबाजी भली प्रकार जानते हैं । तुम्हारे धोखेमें कदापि न आवेंगे । सत्यगुरुने समस्त हंसोंको लेकर सुकृतसागर पर पहुँच कहा कि, सब हंस अब इसमें स्नान करो, तब सभीोंने वहां स्नान किया । जिससे उनको सब द्वीपोंका ज्ञान होगया । लोकमें पहुँचकर सुकृतजीके चरणोंमें गिरकर नमस्कार किया, पश्चात् हंसोंका दर्शन किया, सुकृतजीने कहा कि, हे राजा ! अब तुम अपने राज स्थान को पलट चलो । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! अब हम यहाँ ही रहेंगे, पृथ्वी पर न जावेंगे, यहाँ चार दिन बीत जानेपर चौपदार राजमहलमें गये तो वहां क्या देखते हैं कि, महल शून्य पड़े हैं न राजा है न कोई रानी है, न राजाके पचास पुत्र हैं न राजाकी पुत्री है, समस्त महल शून्य देखकर रोता हुवा बाहर आया, लोगोंको समाचार दिया । राजाके आत्मसंबंधी, मंत्री तथा अन्यान्य कर्मचारी गण आये । देखा तो राजमहल शून्य पड़ा है । कहीं कोई नहीं यह देख कर सब रोने लगे कि, राजाको उनके संबंधियों सहित किसने मार गया, कहाँ गए, कौनसी आपत्ति उन पर आई ? चौबदारने मंत्रीसे कहने लगा कि, एक जिन्दा फकीर आया था । उसने राजाको ऐसा कौतुक दिखलाया । हमने कहा था कि, यह जिन्दा सत्यानाश करनेको आया है । सो राजाने, उस जिन्दा फकीर पर विश्वास करके अपना सर्वस्व अपहरण करवाया, उसीका विष बोया हुआ है । धर्म-दासजीसे कबीर, साहब कहते हैं कि, हे धर्मदास ! जैसा यह राजा सत्यवादी हुआ तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पन किया, वैसेही को नाम बताओ दूसरोंसे उपेक्षा करो, क्योंकि सच्चेही जीव सत्यलोकको जावेंगे । झूठोंके लिये सत्यलोक नहीं है ।
राजा अमरसिंह ।
कबीर सागर नं. ४ में बोधसागर है । उसमें एक प्रकरण अमरसिंहबोध भी है । उसमें जो लिखा है उसीका सार लिखते हैं । ज्ञानीजीसे सत्य पुरुषने कहा कि, बहुत दिन बीते । कोई भी जीव सत्यलोकको नहीं आया । कालपुरुषने सब जीवोंको रोक रक्खा है, विहंगम मार्ग बतलाकर सब मनुष्योंकी मुक्ति कराओ । जब पुरुषने ज्ञानीजीको आज्ञा दी थी उस युगका नाम कसोद था । ज्ञानीजी सत्य-
पुरुषको नमस्कार करके पृथ्वी पर आ सिंहलक्ष्मीपमें उतरे । वहाँके राजाका नाम अमरसिंह था, अमरावतीमें रहता था । उसकी रानीका नाम स्वरकला था । वहाँ पर ज्ञानीजी गये उसको यह कौतुक दिखाया कि, राजाने ज्ञानीजीको सोलह सूर्यके समान ज्योतिमान तथा प्रकाशित देखा । ऐसी सुगंधि उठने लगी कि, मस्तिष्क भर गया । राजा अमरसिंहने उस स्वरूपका दर्शन किया, परन्तु दर्शन देकर ज्ञानीजी अन्तर्धान होगये । राजा उन्हें दूढ़ने लगा, खोज करता करता थक गया, कहीं पत्ता नहीं लगा । राजा ढाढ़े मार मार कर रोने लगा । जैसे जल बिना मीनकी गति होती है वही अवस्था राजाकी हुई । सात दिन रात इसी अवस्थामें बीते राजाने माया मोह तथा राज्यभिमान सभी छोड़ दिया, केवल सत्यगुरुके चरणोंके ध्यानमें लगा रहा । ज्ञानीजी दयालु हुए, पुनः राजाको दर्शन दिया, राजाके सिरपर हाथ रक्खा, जब राजाके मनमें सन्तोष आया तब राजाने कहा कि, आपका दर्शन पाकर मैं सुखी हुआ । जैसे चन्द्रको देखकर चकोर हर्षित होता है; जैसे कि, स्वातीके जलसे पपीहा हर्षित होता है । इतना कहकर सत्यगुरुके चरणोंपर शिर धर दिया । कहने लगा कि, अब मेरा दुःख दूर हुआ । फिर पूछा कि, आप कहाँसे आये हो ? कहाँ रहते हो ? आपका क्या नाम है ? किस लोकमें स्थान है ! मुझसे सत्य कहो, हंसका उबार करी ज्ञानीजीने कहा कि, हम मृत्यु लोकसे आए हैं, वह अमर ठिकाना है वहाँ सत्य पुरुष रहता है हंसभी रहते हैं, हम उस पुरुषकी आज्ञा लेकर आये हैं, जो कोई हमको पहचाने उसको लोकमें भेज देंगे । इतना सुनकर राजा हाथ जोड़कर बोला कि, हमारी मुक्ति करो, हमारे बड़े भाग्य हैं जो पुरुष रूप आपने मुझको दर्शन दिये, अब हमें आप अपने कालसे बचा लीजिए जिससे हम पुरुषका दर्शन कर सकें । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! शुद्ध बुद्धि करके परवाना लेकर सत्य पुरुषका निःतत्व ध्यान करो । सत्यगुरुकी दयासे फिर तुमको काल न छेड़ेगा । राजाने रानीसे कहा कि, अब तुम सत्यगुरुके चरण पकड़ो । क्योंकि चार वेद जिसको नित्य गाते हैं इस सत्यगुरुका भेद वे भी नहीं जानते हैं । सत्य सत्यगुरु अखण्ड पुरीमें रहते हैं । उनकी गम्य काल नहीं पाता । हे रानी ! चित्त लगायके दर्शन करो तो तुम्हारे अनेक जन्मोंके पाप कटें, ऐसे सन्त कभी नहीं आये । हमारे बड़े भाग्य हैं कि, सत्यगुरु हमारे घर पधारें । रानीने कहा कि, हे महाराज ! समझ बूझकर गुरु करो, जिसमें फिर पीछे पछ्ताना न पड़े । तब राजा ने कहा कि, हे रानी ! ऐसे सत्यगुरु कहाँ हैं ? हम तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पण करेंगे । हे रानी ! समस्त लज्जाओंको छोड़कर सत्यगुरुके चरण जल्दी पकड़ो. नहीं तो कुत्ते बिल्लीका जन्म होगा । तब रानी अपनी दासियोंसहित
बाहर आई, जिससे उसके आभूषण तथा वस्त्रोंकी बड़ी ज्योति फैली । अर्थात् ऐसे ऐसे मणि तथा जवाहरात रानीके मस्तक पर तथा शरीरमें आभूषण थे कि, जिनकी ज्योतिसे मानों सूर्योदय हो आया । तब समस्त दरबारी देखकर आश्चर्यान्वित होकर उठ खड़े हुये । तब रानीने अपनी समस्त दासियोंसहित आकर सत्यगुरुको दण्डवत् प्रणाम किया, हाथबाँधकर सत्यगुरुके सामने खड़ी होकर कहने लगी कि, हम आपके आधीन हैं । राजानेभी बारम्बार दण्डवत् करके सत्यगुरुके चरण पकड़ लिये । जैसे कि, चन्द्र चकोरको देखता है वैसेही राजा सत्यगुरुकी ओर देखने लगा, समस्त दरबारी जो खड़े थे सत्यगुरुकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे कि, आपने बड़ी दया की जो दर्शन दिया । हे दीनदयाल ! आपका चरणरज ऐसा पवित्र है कि, इससे मोहतिमिरका नाश हो जाता है, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य उत्पन्न होकर मोक्ष फल मिलता है । हे साहब ! हम सब आपके गुलाम हैं । हमारे ऊपर ऐसी दया करो कि आपके चरणोंमें प्रीति रहे समस्त आशाएँ छूट जावें । आप ब्रह्मस्वरूप अचिन्त, आदि, अदली, अविगत, अजर, अजीत, अमर अकह और अविचल हो । अक्षय, अखिल, आदि ब्रह्म उद्धारण, अखिलपति अविनाशी पापोंको दूर करनेवाले हो । हंसराज हंसपति और हंस उबारनहार हो आप सर्व सुखके धाम हो । इस प्रकार बहुतेरी प्रशंसा तथा स्तुति करके सत्यगुरु को महलमें लेजाकर सिंहासन पर बैठाया । रानीने चरण धोये (राजाकी आँख से प्रेम के आँसू बह रहे थे ।) रानीने अपने अञ्चलसे चरण पोंछा, सबोंने चरणा-मृत लिया । ज्ञानीजीने सबके शिरपर हाथ रक्खा । राजाको बड़ा ज्ञान प्रगट हुआ. राजा बोला कि, हे साहब ! आपने अपना लिया, अब परवाना दीजिये । जो कुछ आप कहेंगे सो हम करेंगे । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! अब तुम सर्व सामग्री मँगवाओ । आज्ञा पातेही यथानियम सब मँगाया, हर्ष और उत्साहके साथ राजा रानी तथा अन्यान्य लोगोंने सत्यगुरुकी दीक्षा ली, सबोंने सत्यगुरुका दण्डवत् प्रणाम किया । सत्यगुरुकी कृपासे सबके शोक सन्ताप छूट गये, कालका जाल दूर होगया तथा उसी समय राजाके बेटे नातियोंसहित अनेकों जीव सत्यगुरु के शरण आये । राजा और रानी सहित सब हाथ जोड़कर खड़े होगये । उस समय राजा कहने लगा कि, हे सत्यगुरु ! आपने मुझपर दया करके वह शब्द बतलाया है जो कि, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवादिको भी दुर्लभ है । मुझे भक्तिदान दिया, अब मुझको अपने लोक लेचलो । सत्यगुरुने कहा कि, हे राजा (अमरसिंह) अभी सवा सौ वर्षका वयस तुम्हारा शेष है, सो तुम सवासौ वर्ष अभी पृथ्वीपर रहो । इसके पीछे मेरे लोकको चलना । राजा बहुत बिनती करने लगा कि, बन्दीछोर ! अब